क्या कोई नौकरी कर रही है आपका इंतजार?

Image caption गिरते विकास दर से नौकरियां कम हुई हैं

भारत में पिछले दिनों अर्थव्यवस्था में गिरावट को लेकर काफी चर्चा हो रही है. औधौगिक विकास में कमी और सकल घरेलू विकास में आई कमी की वजह से रोजगार के क्षेत्र में भी असर पड़ा है.

रोजगार के लिए लोकप्रिय वेबसाइट नौकरी डॉट कॉम के संस्थापक संजीब बिखचंदानी मानते हैं कि भारत में रोजगार का बाजार ठंडा है और कई क्षेत्रों में नई नौकरियां आनी लगभग बंद हो गई है.

बिखचंदानी कहते हैं, "भारत में नौकरियां तभी बढ़ती हैं जब सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में बढ़िय़ा विकास होता है. हाल ही में जो विकास का आंकड़ा आया है तिमाही में 5.3 फीसदी विकास का वो निराशाजनक है. पांच प्रतिशत पर नौकरियां नहीं बढ़ेगी, छह प्रतिशत पर भी नहीं बढेंगी, भारत में अगर रोजगार बढ़ने हैं तो सात, आठ, नौ प्रतिशत पर विकास करना होगा तभी नई नौकरिय़ां बनेगी."

बिखचंदानी का मानना है कि अगर ये गिरावट अगले दो-तीन तिमाही तक बनी रही तो इस साल रोजगार नहीं बढ़ेंगे.

दोहरी मार

लेकिन नौकरियों की खस्ता हालत का एक दूसरा कारण भी है.

बिखचंदानी कहते हैं कि कुछ क्षेत्र जो निर्यात पर निर्भर हैं जैसे की आईटी-बीपीओ, वहां भी अमरीका जैसे देशों से मांग की कमी की वजह से दबाव आया है.

साथ ही अमरीका में चुनाव का साल है तो उससे भी आउटसोर्सिंग को लेकर थोड़ी हिचकिचाहट है जिससे आईटी जैसे सेक्टर पर दोहरी मार पड़ी है.

नौकरी डॉट काम के संस्थापक कहते हैं कि आईटी ने पिछले 20 साल में कई नौकरियां दी इसलिए जब इस क्षेत्र पर दबाव आता है तो वो पूरे रोजगार पर असर डालता है.

इसके अलावा दूसरे प्रमुख क्षेत्र भी सुस्ती की मार झेल रहे हैं.

"टेलकॉम में काफी नए जॉब बने थे, लेकिन 2जी मामले के बाद वहां भी कंपनियों की खराब हालत है. बीमा क्षेत्र भी नौकरी के लिहाज से बड़ा क्षेत्र बनकर उभरा है लेकिन वहां भी आईआरडीए के नए नियमों के बाद विकास की धारा उलटी हो गई है. इसके अलावा रिटेल में भी विदेशी निवेश की मंजूरी न मिलने से नई नौकरियों की जो उम्मीद थी वो थम गई है."

बेहतर शिक्षा की जरूरत

रोजगार का बाजार जब इतना मंदा है तो क्या ऐसे में कोई क्षेत्र है जो इस मार से बच पाया है, ये पूछे जाने पर विखचंदनी का दो टूक जवाब है, "नहीं."

"हालांकि कंज्यूमर सेक्टर ने थोड़ी ज्यादा सहनशीलता दिखाई है लेकिन वो भी ज्यादा दिनों तक नहीं चल पाएगी."

इस स्थिति से निकलने के लिए सरकार को अपनी नीतियों में परिवर्तन लाना होगा और शिक्षा पर ध्यान देना होगा.

बिखचंदानी कहते हैं कि कुछ अनुसंधानों को छोड़कर भारत में उच्च शिक्षा बेहद साधारण है और सरकारी स्कूलों में भी बहुत सुधार की जरूरत है.

इस वजह से देश में प्रतिभा की कमी भी देखी जा रही है. जनसंख्या के हिसाब से जितनी प्रतिभा सामने आनी चाहिए थी वो साधारण शिक्षा व्यवस्था के वजह से नहीं आ पा रही है.

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