मोदी चाहिए लेकिन नरेंद्र नहीं, सुशील

 गुरुवार, 7 जून, 2012 को 15:35 IST तक के समाचार

बिहार में जनता दल युनाईटेड (जदयू) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की लगभग सात साल की सत्ता-साझेदारी अब अपने ही कुछ सवालों से घिरने लगी है.

इनमें सबसे बड़ा सवाल भाजपाइयों के बीच से ही उभरा है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार उन्हें आखिरी झटका यानी राजनीतिक तलाक कब देंगे?

दूसरा बड़ा सवाल जदयू की आपसी चर्चा में बना हुआ है कि अगर भाजपा का नरेंद्र मोदी गुट सबल हो जायेगा तो फिर नीतीश जी किधर जायेंगे ?

इन दोनों सवालों का जवाब भले ही आने वाली परिस्थितियों में छिपा हो, लेकिन इस कारण दोनों दलों के गठबंधन में गांठें अब दिखने लगी हैं.

हालांकि इन गांठों से नीतीश कुमार के नेतृत्व में चल रही गठबंधन सरकार को फिलहाल कोई खतरा नहीं है. सत्ता-सुख-भोगने वाला बंधन इतनी जल्दी टूटता कहाँ है?

चुनाव से पहले ये नौबत तब आ सकती है जब किसी बेहतर सत्ता समीकरण का लोभ प्रबल हो जाय या फिर एक साथ बंधे रहने की गुंजाइश ही खत्म हो जाय.

प्रधानमंत्री की लालसा

"तल्खी स्वाभाविक है, क्योंकि दोनों में कुछ ऐसी वैचारिक भिन्नता है, जिसे लेकर समझौता संभव नहीं होता. लेकिन राज्य में कुछ कार्यक्रमों या विकास के मुद्दों पर इस गठबंधन सरकार में कोई आपसी तकरार नहीं है. पार्टी लाइन पर कुछ मतभेद या आपत्तियों की बात अलग है."

बिहार के जदयू अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह

प्रेक्षक मानते हैं कि प्रचारित सुशासन से अति उत्साहित नीतीश कुमार के संदर्भ में ये दोनों ही बातें संभव है क्योंकि प्रधानमंत्री पद की महत्वाकांक्षा उनमें भी हिलोरें ले रही है.

लेकिन ये तभी संभव है, जब उनकी छवि भाजपा के सहयोगी के रुप में नहीं, बल्कि उससे अलग एक 'सेक्यूलर इमेज' वाले नेता के रूप में स्वीकृत हो जाए.

सब जानते हैं कि इस कोशिश में वो तब से जुटे हैं, जब से गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से परहेज दिखाने की कोशिश में उन्होंने कुछ ज़्यादा ही तीखे तेवर अपनाने शुरू कर दिए थे.

बिहार में सत्ता के दूसरे दौर में उनकी रणनीति इस बाबत अब थोड़ा और खुलकर सामने आने लगी है. यहां राजनीतिक हलकों में तो यही माना जा रहा है कि वो भाजपा से अलग होने का मन बना चुके हैं.

बिहार दिवस में दूरी

" पार्टियाँ अलग-अलग हैं तो अपने-अपने फायदे की बात वो सोचेगीं ही. यहाँ सरकार चलाने में उनसे कोई दिक्कत ना हो, हम यही चाहते हैं. गठबंधन में टूट-फूट जैसी कोई आशंका अभी नहीं है."

भाजपा के वरिष्ठ नेता नन्द किशोर यादव

हाल ही में 'बिहार दिवस' के बहाने दिल्ली और मुंबई में नीतीश कुमार केन्द्रित आयोजनों से भाजपा को पूरी तरह अलग रखकर सिर्फ जदयू को आगे किया जाना इसका खुला संकेत भी है.

ये भी साफ हो चुका है कि बिहार की राजनीति में किसी तरह की उथल-पुथल मचाने जैसी ताक़त फिलहाल विपक्ष में नहीं, सत्ता पक्ष में ही है- खासकर जदयू में.

ऐसा इसलिए माना जा रहा है क्योंकि नीतीश कुमार के प्रति भाजपा का समर्पण-भाव, मजबूरी में ही सही, अभी बरक़रार है. जदयू तो अक्सर उसके सामने ताल ठोकने की मुद्रा में आ जाता है.

इस बात के सूत्र मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की उस राजनीतिक भाव-भंगिमा से भी जुड़े हैं, जिसमें भाजपा को धता बताने जैसा हाव-भाव अब जरूर दिखने लगा है.

वैसे ये हाव-भाव कितना असली है, इसका सही-सही अन्दाजा गुजरात विधानसभा चुनाव के बाद ही लग पाएगा. प्रेक्षक मानते हैं कि नरेंद्र मोदी के सफल या विफल होने पर ही तय होगी नीतीश की भावी रणनीति.

खट्टा-मीठा भाव

ये भी कम अचरज की बात नहीं है कि भाजपा के ही कुछ शीर्ष नेता नरेंद्र मोदी के प्रति खट्टा और नीतीश कुमार के प्रति मीठा भाव रखते हैं. शायद इसमें उनकी निजी महत्वाकांक्षा भी छिपी है.

आश्चर्यजनक तो ये भी है कि बिहार में सत्ता के मेल का खेल गुजरात से जुड़ गया है. नरेंद्र मोदी का जिक्र आते ही नीतीश कुमार का असहज होना या दिखना सचमुच एक दिलचस्प रणनीति है.

इसी सिलसिले में मैंने बिहार के जदयू अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह से पूछा कि उनके दल और भाजपा के बीच ऐसी तल्खी क्यों है?

उनका जवाब था, ''तल्खी स्वाभाविक है, क्योंकि दोनों में कुछ ऐसी वैचारिक भिन्नता है, जिसे लेकर समझौता संभव नहीं होता. हम तो चाहेंगे कि हमारी भूमिका राष्ट्रीय स्तर पर दिखाई पड़े और ऐसा प्रयास हम कर भी रहे हैं. लेकिन यहाँ राज्य में कुछ कार्यक्रमों या विकास के मुद्दों पर इस गठबंधन सरकार में कोई आपसी तकरार नहीं है. पार्टी लाइन पर कुछ मतभेद या आपत्तियों की बात अलग है.''

नीतीश को सबसे ज्यादा सहारा सुशील मोदी ही देते हैं

उधर भाजपा के वरिष्ठ नेता और राज्य के एक मंत्री नन्द किशोर यादव ने इस विषय पर खुलकर कुछ बोलने से बचते हुए सिर्फ कुछ दलगत मतान्तर वाली मुश्किलों की बात की.

उन्होंने कहा, ''पार्टियाँ अलग-अलग हैं तो अपने-अपने फायदे की बात वो सोचेगीं ही. यहाँ सरकार चलाने में उनसे कोई दिक्क़त ना हो, हम यही चाहते हैं. गठबंधन में टूट-फूट जैसी कोई आशंका अभी नहीं है.''

तरह-तरह की बातें

जाहिर है कि इस तरह के औपचारिक बयान देते रहने की विवशता तब तक बनी रहती है, जब तक सत्ता-संयोग बना रहता है. लेकिन सब कुछ देख-समझ रहे आम लोगों की ऐसी कोई मजबूरी नहीं होती.

कुछ धारदार प्रतिक्रियाएं मैंने सुनीं, '' जब गडकरी जी, नरेंद्र मोदी जी और आडवाणी जी में ही नहीं पट रही है तो फिर भाजपा क्या खा-के जदयू या नीतीश जी से साथ निभाने जैसा दावा करेगी ? देखिये, सत्ता के लिए कुछ भी कर गुजरने वालों का ये सब तमाशा है. कब कौन किसे गच्चा देगा, कोई नहीं जानता. जात-पात और हिन्दू-मुसलमान वाला इनका चश्मा कभी उतरेगा क्या ? ''

वैसे, जब कभी जदयू-भाजपा तकरार की बात ज़्यादा मुखर होने लगती है, तो उसे दबाने-छिपाने वालों में पहला नाम राज्य के वरिष्ठ भाजपा नेता और उप-मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी का होता है.

शायद इसलिए मज़ाक में उछाला गया एक जुमला जदयू वाले अक्सर दुहराते रहते हैं, “हमें नरेंद्र मोदी नहीं, सुशील मोदी चाहिए.”

मजे की बात है कि इस जुमले को सुनकर भाजपा के लोग अन्दर से भले ही चिढ़ते या लजाते होंगे, ऊपर से तो वो मुस्कुराते हुए ही दिखते हैं.

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