भारत में खनन उद्योग हुआ बेलगाम: रिपोर्ट

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Image caption ह्यूमन राइट्स वॉच ने भारत में खनन उद्योग पर गंभीर सवाल उठाए हैं

मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच ने गुरुवार को जारी एक रिपोर्ट में कहा है कि भारत के खनन उद्योगों में मानवाधिकारों और पर्यावरण संबंधी सुरक्षा-मानकों को लागू करने में भारत सरकार विफल रही है.

सत्तर पन्नों की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि खनन संबंधी प्रमुख नीतियां सही तरीके से नहीं बनाई गईं हैं और उन्हें प्रभावी ढंग से लागू भी नहीं किया गया है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि इसकी वजह से खनन गतिविधियां मनमाने ढंग से जारी हैं. इसमें कहा गया है कि भारत का खनन उद्योग घोटालों से भरा पड़ा है जिसकी वजह से उन लोगों के लिए गंभीर खतरा पैदा हो गया है जो खनन गतिविधियों से प्रभावित हैं.

'पूरी व्यवस्था विफल'

ह्यूमन राइट्स वॉच ने सीधे-सीधे ये भी कहा है कि गैर-जिम्मेदाराना तरीकों से हो रहे खनन की वजह से पर्यावरण को नुकसान पहुंच रहा है, साथ ही खनन कार्य में लगे श्रमिकों के स्वास्थ्य और जीवन पर बुरा असर पड़ा रहा है.

ह्यूमन राइट्स वॉच की दक्षिण एशिया निदेशक मीनाक्षी गांगुली कहती हैं, ''सरकार यदि ठीक तरीके से निगरानी नहीं करती है तो खनन की वजह से अक्सर विनाश होता है. खनन प्रभावित होने वाले लोगों को बचाने के लिए भारत में कानून किताबों में तो हैं, लेकिन उन्हें लागू नहीं किया जाता है.''

ह्यूमन राइट्स वॉच ने अपनी पड़ताल में पाया है कि देश में अधिकृत 2600 खनन गतिविधियों में मानवाधिकार और पर्यावरण सुरक्षा को भारतीय कानूनों के अनुरूप सुनिश्चित करने में भारत सरकार की पूरी व्यवस्था ही विफल हो गई है.

गंभीर भ्रष्टाचार

रिपोर्ट में कहा गया है कि इन सभी समस्याओं की वजह से उच्च स्तर पर भी भ्रष्टाचार के गंभीर मामले सामने आए हैं. ह्यूमन राइट्स वॉच का कहना है कि खनन क्षेत्र में अवैध गतिविधियों की वजह से राज्य सरकारों को राजस्व का बड़ा नुकसान हो रहा है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि इसकी वजह से पूरे खनन उद्योग के लिए ही खतरा पैदा हो गया है, साथ ही राजनीतिक उथल-पुथल मच रही है.

ह्यूमन राइट्स वॉच की ये रिपोर्ट गोवा, कर्नाटक और दिल्ली के 80 से ज्यादा लोगों के साथ साक्षात्कार पर आधारित है. इनमें खनन गतिविधियों से प्रभावित लोग, कार्यकर्ता और खनन कंपनियों के साथ ही सरकारी अधिकारी भी शामिल हैं.

मीनाक्षी गांगुली कहती हैं, ''खनन घोटाले सुर्खियों में छा सकते हैं लेकिन भारत में खनन की जो समस्याएं हैं, वो कहीं ज्यादा बुनियादी हैं. सरकार कानूनों को लागू नहीं करती और खनन गतिविधियों की निगरानी भी नहीं करती. इस तरह सरकार अराजकता को बढ़ावा देती है.''

वे कहती हैं, ''खनन भारत की अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख हिस्सा है, लेकिन इसका ये मतलब नहीं है कि इस उद्योग को अपने कायदे-कानून खुद तय करने दिए जाएं. सरकार नियामकों को ज्यादा सशक्त बना सकती है और उसे करना ही चाहिए ताकि वे अपना कार्य अधिक प्रभावी तरीके से कर सकें.''

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