नक्सल-समर्पण नीति को लेकर समर्पण की कमी

Image caption छत्तीसगढ़ में किसी भी बड़े नक्सलवादी नेता ने आत्मसमर्पण नहीं किया है

छत्तीसगढ़ के दक्षिणी छोर पर फैले बस्तर का इलाका एक रणभूमि में तब्दील हो गया है. यहाँ माओवादियों की जनमुक्ति छापामार सेना और अर्धसैनिक बलों के बीच ज़ोरदार संघर्ष चल रहा है.

यहाँ लकीरें साफ़ खिंचीं हुईं हैं. इस इलाके के लोग इस संघर्ष में पिसते चले जा रहे हैं. खास तौर पर यहाँ के आदिवासियों के साथ मजबूरी यह है कि उन्हें किसी एक तरफ होना पड़ेगा.

अगर वह ऐसा नहीं करते तो उनका वहाँ रहना मुश्किल है. यही वजह है कि इस इलाके से बड़े पैमाने पर पलायन हो रहा है. गाँव के गाँव खाली हो रहे हैं. कोई पुलिस के डर से भग रहा है तो कोई इस संघर्ष के बीच पिसने के डर से.

पिछले महीने छत्तीसगढ़ के गृह मंत्री के सामने तीन नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया था. कुछ और ने आत्मसमर्पण की पेशकश की थी और जंगल से बाहर आए थे.

मगर इससे पहले कि वह आत्मसमर्पण करते, पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया और जेल भेज दिया.

छत्तीसगढ़ के गृह मंत्री ननकीराम कँवर ने बीबीसी के साथ एक बातचीत में इस घटना को दुर्भाग्यपूर्ण बताया और कहा कि यही कुछ एक कारण हैं जिसकी वजह से सरकार द्वारा माओवादियों के लिए घोषित की गई आत्मसमर्पण नीति सुचारू ढंग से अमल में नहीं आ पा रही है.

वह कहते हैं,"देखिए इस नीति का रेस्पॉन्स भी आ रहा है और कुछ कारण से माओवादी धोखा भी खा रहे हैं. अभी मैं सुकमा गया था वहां पता चला कि नक्सली आत्मसमर्पण करना चाहते थे. मगर उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया. यह निश्चित रूप से दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति थी. अब मुश्किल यह है कि हर बात की जांच कैसे की जा सकती है."

आत्मसमर्पण की नीति

नक्सल प्रभावित अन्य राज्यों की तरह ही छत्तीसगढ़ सरकार ने भी माओवादी छापामार दस्ते से अलग होकर मुख्य धारा में लौटने के इच्छुक नौजवानों के लिए भी आत्मसमर्पण की नीति बनाई जिसमें उनके पद और हथियार के हिसाब से उनके पुनर्वास की व्यवस्था की बात कही गई है.

मसलन अगर कोई माओवादी छापामार लाईट मशीनगन के साथ आत्मसमर्पण करता है तो उसे तीन लाख रूपए देने का प्रावधान किया गया है. उसी तरह अगर कोई एके-47 के साथ आत्मसमर्पण करता है तो उसे दो लाख रूपए देने की बात कही गयी है. इसके अलावा पुनर्वास की बात भी कही गई है.

मगर इस नीति को लागू हुए कई साल बीत गए हैं और आज तक किसी बड़े नक्सली कमांडर नें आगे आकर आत्मसमर्पण नहीं किया है. जानकार मानते हैं कि ऐसा इसलिए है क्योंकि अंदर जंगलों में या फिर नक्सल प्रभावित इलाकों में सरकार इस आत्मसमर्पण की नीति का प्रचार सरकार उस ढंग से नहीं कर पाई जैसा होना चाहिए था.

सामाजिक कार्यकर्ता बी के मनीष कहते हैं, "यह व्यावहारिक बात नहीं है क्योंकि इसमें राजनीतिक इच्छा शक्ति की कमी है. सरकार चाहती ही नहीं है कि लोग हिंसा का रास्ता छोडें. एक प्रशासनिक आवश्यकता के तहत नीति बनाई गई है और बनाने के बाद इसे फाईलों में बंद कर रख दिया गया है."

मनीष के अनुसार वर्ष 2004 से अब तक लगभग 2600 लोगों ने आत्मसमर्पण किया है. मगर ग़ौर करने वाली बात यह है कि इनमें से ज़्यादातर लोग गाँव के स्तर पर कार्य करने वाले - संघम सदस्य - ही थे ना कि लड़ने वाले - दलम सदस्य.

Image caption सरकार की योजना में हथियार के साथ समर्पण करने पर धनराशि देने का प्रस्ताव रखा गया है

वहीं प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस का आरोप है कि राज्य सरकार की नक्सल नीति ही कुछ स्पष्ट नहीं है. संगठन के भुजित दोषी कहते हैं कि सिर्फ फाइलों में आत्मसमर्पण की नीति बनाने से समस्या का समाधान नहीं हो सकता है.

वह कहते हैं, "जिस तरह सरकार ने सुकमा के कलक्टर एलेक्स पॉल मेनन को माओवादियों के कब्जे से छुडवाने के लिए पहल की थी, उसी तरह उसे माओवादी संगठन में शामिल नौजवानों और स्थानीय आदिवासियों से बात करनी चाहिए. उन्हें भरोसा दिलाना चाहिए."

पूछे जाने पर छत्तीसगढ़ के गृह मंत्री भी स्वीकार करते हैं कि इस नीति का जिस पैमाने पर प्रचार प्रसार होने चाहिए थे वह नहीं हो पाया है.

छत्तीसगढ़ में एक लंबे अरसे से नक्सली गतिविधियों पर नज़र रख रहे पत्रकार रीतेश साहू कहते हैं कि आत्मसमर्पण की नीति कितनी कारगर या आकर्षक है वह इस बात से साबित होती है कि आज तक कोई भी ऐसे बड़े नक्सली कमांडर ने आत्मसमर्पण नहीं किया है जिससे यह कहा जा सके कि माओवादियों को इससे एक बड़ा झटका लगा है.

साहू कहते हैं, "अब जिसके मन में आत्मसमर्पण की बात कहीं से आई भी तो वह सरकार के रवैये को देख कर पीछे हट जाता होगा क्योंकि जो आत्मसमर्पण करना चाहता भी होगा तो उसे भरोसा ही नहीं है कि जंगल से निकलने के बाद उसकी ज़िन्दगी बेहतर हो सकती है. इसमें सरकार की इच्छाशक्ति कहीं से नहीं झलकती."

आदिवासियों का शोषण

माओवादी चिंतक मानते हैं कि नीति हो या न हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि ज़्यादातर जंगली इलाकों में जहाँ आदिवासी रहते हैं, बड़ी बड़ी कंपनियाँ, वहाँ की संपदा का दोहन करने के लिए प्रशासन और सरकार को अपने साथ मिलाकर आदिवासियों का शोषण कर रहे हैं.

उनका कहना है कि सरकार की इतनी आकर्षक नीति के बाद भारत के किसी कोने में किसी नक्सली ने आत्मसमर्पण नहीं किया तो यह इस बात का संकेत है कि लोग विचारधारा की लड़ाई लड़ रहे हैं जो किसी प्रलोभन में नहीं आ सकते.

वहीं माओवादियों और सुरक्षा बलों के बीच चल रहे संघर्ष पर नज़र रख रहे विशेषज्ञों का कहना है कि आत्मसमर्पण की नीति तो एक तरफ, सरकार यह भी सुनिश्चित नहीं कर पायी है कि जो लोग छापामार सेना को छोड़ कर आएंगे उनकी सुरक्षा किस प्रकार की जाए.

वैसे गृह मंत्री ननकी राम कँवर ने संकेत दिए हैं कि सरकार इस बात पर विचार कर रही है कि आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों की अलग से एक बटालियन का गठन करने पर विचार किया जा रहा है.

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