हाल के सबसे 'खराब' वित्त मंत्री

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Image caption प्रणब मुखर्जी के कार्यकाल में रुपया अपने सबसे निचले स्तर पर गिरा,

जब वह नई दिल्ली स्थित नॉर्थ बलॉक में वित्त मंत्रालय से बाहर आएंगे तो राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी को इसका आभास होगा कि वह हाल के सालों के सम्भवतः सबसे खराब वित्त मंत्री थे.

उनके कार्यकाल में भारत की 2011-12 की अंतिम तिमाही में 5.3 प्रतिशत की आर्थिक वृद्धि दर रही जो पिछले नौ सालों में सबसे कम थी.

रुपया अपने सबसे निचले स्तर पर रहा, रेटिंग करने वाली वैश्विक एजेंसियों ने रेटिंग घटाने की चेतावनी दी , राजकोषीय घाटा बेकाबू हो गया है और राजनीतिक सर्वसम्मति की कमी ने अहम सुधारों को पटरी से उतार दिया है.

जब मुखर्जी ने इस साल अपना बजट पेश किया तो लॉर्ड मेघनाथ देसाई ने कहा कि ''यह चौंकाने वाली बात है कि कोई वित्त मंत्री अपने सामने खड़ी सभी मुश्किलों को नजरअंदाज कर सकता है.''

अर्थशास्त्री और बड़े व्यापारी नीतियों में गतिहीनता के लिए वित्त मंत्री को जिम्मेदार ठहराते हैं जिसकी वजह से घरेलू और विदेशी निवेश में बड़ी कटौतियां हुई हैं.

नाखुश

मध्य वर्ग नाखुश है कि जहां एक तरफ अमीरों और गरीबों को भारी अनुदान दिए जा रहे हैं वहीं उन्हें बढ़े हुए कर और तेल के दाम चुकाने पड़ रहे हैं.

गरीब समाज भी गुस्से में है कि महंगाई दर निरंतर दोहरे अंकों में बनी हुई है.

ऐसी अपुष्ट खबरें भी आ रही हैं कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह मुखर्जी को वित्त मंत्रालय से बाहर करना चाहते थे.

लेकिन अपने आसपास आर्थिक निराशा और अंधकार के बावजूद वित्त मंत्री भविष्य को लेकर आशावादी रहे.

पुराने दिन

इसका कारण शायद पुराने दिनों में देखा जा सकता है; मुखर्जी 1982-84 के दौर में भी वित्त मंत्री थे जब भारतीय अर्थव्यवस्था मुश्किल दौर से गुजर रही थी.

साल 1979-80 में भारत को आईएमएफ से ऋण लेना पड़ा था जब वह विदेशी मुद्रा के संकट का सामना कर रहा था.

आईएमएफ को उम्मीद थी कि भारत की नीति बनाने वाले अनुदानों और बाकी सरकारी खर्च में कटौती जैसे कुछ कड़े कदम उठाएंगे, और साथ ही गरीबों के लिए स्कीमों में खर्च में भी कमी करेंगे.

संयोग से कुछ ही सालों में अर्थव्यवस्था वापस पटरी पर लौट आई.

अपने 1984 के बजट में मुखर्जी ने गर्व से ऐलान किया था कि सरकार ने खुद ही अपना बाकी का आईएमएफ कर्ज लेने से इंकार कर दिया है.

अपने भाषण में उन्होंने कहा था, ''कई भविष्यवाणियों को झुठलाते हुए हमारे प्रयासों के बाद अर्थव्यवस्था पहले से मजबूत हुई है...हमने अनुदानों को कम नहीं किया है. हमने वेतन कम नहीं किए हैं. हमने योजना पर समझौता नहीं किया है...गरीबी के खिलाफ योजनाओं में हमारी वचनवद्धता में हम चूके नहीं है...हम सम्मान के साथ इससे बाहर आए हैं.''

कड़े फैसले

इसलिए मुखर्जी को विश्वास था कि इस बार भी बिना कड़े फैसले लिए ही अर्थव्यवस्था खुद ही सुधर जाएगी.इसलिए वे उन्हीं नीतियों के साथ आगे बढ़ते गए जो 1980 के दशक में उनकी नीतियों से मिलती जुलती थी.

उदाहरण के तौर पर बजट 2012 में पुराने दिनों से लगाया गया कर बजट 1983 के दो प्रस्तावों के समान था.

साल 2012 में तंबाकू (सिग्रेट) पर कर बढ़ाए गए जैसा कि उन्होंने 1982-84 के तीन बजटों में किया था.

दुर्भाग्यवश मुखर्जी इस पद पर रहने वाले पुराने मंत्रियों के बोझ तले दबे हुए थे. जैसे कि ग्रामीन रोजगार योजना, मनरेगा के लिए उन्हें बजट में काफी पैसा रखना पड़ा जिसपर कांग्रेस के अध्यक्ष सोनिया गांधी और उनके पुत्र राहुल का आशीर्वाद था.

इसी तरीके से वे हाल के सरकार को हिलाने वाले स्कैंडलों (टूजी स्पैक्ट्रम, कोयला और राष्ट्रमंडल खेलों) के लिए जिम्मेदार नहीं थे.

लेकिन यह मुखर्जी और फैसले न लेने वाली सरकार दोनों का पीछा करते रहे.

इसका नतीजा यह हुआ कि वित्त मंत्री के पास ऐसे फैसले लेने के लिए कोई ताकत नहीं थी जिनसे नकारात्मक माहौल में सुधार हो सकता था.

इसलिए साल 1991 में जब भारत ने सुधारों का रास्ता पकड़ा से लेकर अब तक का उन्हें सबसे खराब वित्त मंत्री माना जाता है.

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