बिहार: क्या है विशेष राज्य की माँग का सच

Image caption नीतिश सकार बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने की माँग कर रही है

बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने की बहुप्रचारित मांग केंद्र सरकार की तरफ़ से एक बार फिर नामंज़ूर हो गई है. फिर भी राज्य की नीतीश सरकार इस मांग पर अड़ी हुई है.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के निर्देश पर उनकी पार्टी जनता दल यूनाइटेड (जदयू) ने इस बारे में पटना और दिल्ली में बड़ी रैली आयोजित करने की तैयारी शुरू कर दी है. इसे ' अधिकार रैली ' नाम दिया गया है.

लीड लेने के अंदाज़ में इस मुद्दे को जदयू ने ऐसे लपका है, जैसे इस पर बाक़ी दलों का नहीं, सिर्फ उसी का अधिकार है.

उसने अपनी सत्ता-सहयोगी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को भी इसमें अपने साथ नहीं जोड़ा है.

मुख्यमंत्री के एक हालिया भाषण का यह अंश गौरतलब है, '' दस करोड़ बिहार वासियों की हकमारी आख़िर कब तक बर्दाश्त की जायेगी ? विशेष राज्य का दर्जा हासिल करने के निर्णायक संघर्ष में अब बिहारी ज़रूर उतरेंगे और पटना ही नहीं,दिल्ली के मैदान से भी हुंकार भरेंगे. ''

विशेष दर्जा क्यों

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लेकिन अब ये सवाल पूछा जा रहा है कि केंद्र सरकार के स्पष्ट इंकार के बावजूद नीतीश कुमार इसे ज्वलंत मुद्दा बनाए रखने की व्यग्रता क्यों दिखा रहे हैं ?

क्या उनकी नज़र में यह मुद्दा ऐसी पतवार है, जो शासन की विफलताओं के सैलाब में फंसती दिख रही उनकी सियासी नैया को पार लगा सकता है ?

अर्थशास्त्री प्रोफ़ेसर नवल किशोर चौधरी इस पर बेबाक टिप्पणी करते हैं, '' मेरी राय में विशेष राज्य का मुद्दा सत्ता पक्ष की तरफ़ से इसलिए उछाला जा रहा है क्योंकि एक-एक कर सामने आती जा रही उसकी विफलताओं पर से लोगों का ध्यान हट जाए.. दूसरी बात ये कि संदेहास्पद ग्रोथ रेट का ढोल मीडिया के ज़रिए पिटवाने वाली ये सरकार अपने शासनकाल में बढ़ती ग़रीबी, भ्रष्टाचार और बिगड़ती क़ानून-व्यवस्था को छिपाने और केंद्र की बेइंसाफी पर शोर मचाने का बहाना ढूंढती रही है. अब ये विशेष राज्य वाला बहाना नीतीश जी को सबसे कारगर लगता है. ''

और ये विशेष राज्य का दर्जा आख़िर है क्या ? संक्षेप में कहें, तो देश के आर्थिक रूप से पिछड़े और जनजाति बहुल आबादी वाले पहाड़ी इलाक़े या पड़ोसी देश की सीमा से लगे हुए राज्य इसके अंतर्गत आते हैं.

ऐसे राज्यों को केंद्र सरकार की तरफ़ से विशेष प्रावधान के ज़रिए उत्पाद शुल्क में छूट और योजना सहायता में बड़ी सहूलियतें मिलती हैं. देश के ग्यारह राज्यों को ये दर्जा हासिल है.

इनमें उत्तर-पूर्व के सातों राज्य समेत सिक्किम, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश शामिल हैं. बिहार को अगर किसी आधार पर इस श्रेणी में रखा जायेगा, तो कई अन्य राज्य भी इसके दावेदार हो जाएँगे.

अधिकार रैली

योजना आयोग ही इसका निर्णय लेता है और योजना आयोग के सदस्य अभिजीत सेन ने बीबीसी से बातचीत में खुलकर कह दिया था कि बिहार को यह विशेष दर्जा मिलना बिलकुल असंभव है.

जब जदयू ने राज्य के सवा करोड़ लोगों के हस्ताक्षर वाला ज्ञापन सौंप कर इस मांग का दबाव बनाया था, उस समय केंद्र सरकार ने इस पर विचार के लिए एक अंतर मंत्रालयीय समूह का गठन किया था.

हाल ही में उस की जो रिपोर्ट आई है, उसमें स्पष्ट कर दिया गया है कि निर्धारित मानदंडों के आधार पर बिहार को विशेष राज्य की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है.

इस निर्णय से नाराज़ नीतीश कुमार ने प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर पुनर्विचार का अनुरोध किया है. साथ ही मांग की है कि विशेषज्ञों की समिति बनाकर इस बाबत तर्कसंगत आधार वाले मानदंड फिर से तय किये जाए.

वादा और इरादा

मुहिम में काफ़ी सक्रिय दिख रहे प्रदेश जदयू अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह मानते हैं कि आगामी छह नवम्बर की ' अधिकार रैली ' के बाद माहौल बदलेगा.

उन्होंने कहा, '' ये मुद्दा है और रहेगा. बिहार के हक़ में दिए गए तमाम तर्कों या सबूतों को नकार देना सरासर बेइंसाफी है.सालाना बाढ़ का कहर, बिजली का संकट. उद्योग का अभाव और सबसे बढकर केंद्र की घोर उपेक्षाओं का मारा हुआ यह राज्य इस विशेष उपाय के बिना दशकों तक पिछड़ापन झेलता रहेगा. ''

उधर राष्ट्रीय जनता दल समेत अन्य विपक्षी दलों ने इस मांग को जायज़ और ज़रूरी मानते हुए भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और जदयू की नीयत में खोट का आरोप लगाया है.

वामपंथी ' भाकपा माले ' के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने इसे जनहित के मूलभूत सवालों को टालने वाला सियासी ढकोसला क़रार दिया है.

उनका कहना है, '' नीतीश जी के लिए तो यह एक राजनीतिक सौदेबाजी का मुद्दा है, या कहें कि उनकी सोची-समझी राजनीतिक चाल है. जब वह केंद्र में मंत्री थे, उसी समय भाकपा माले ने बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग लेकर संसद के सामने बड़ा प्रदर्शन किया था. उस समय उनकी ख़ामोशी और अब उनका शोर एक ढोंग नहीं तो और क्या है ? ''

इन तमाम बिन्दुओं पर गौर करने से क्या यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि एक मरी हुई उम्मीद पर अड़ी हुई सत्ता- राजनीति का वादा कुछ और है और इरादा कुछ और ?

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