अर्थव्यवस्था पर मनमोहन का राजनीतिक इम्तिहान

 गुरुवार, 28 जून, 2012 को 15:04 IST तक के समाचार
मनमोहन सिंह

सुधारों की प्रक्रिया धीमी पड़ने पर मनमोहन सरकार को आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है.

लगातार मुश्किलों का सामना कर रही भारतीय अर्थव्यवस्ता को पटरी पर लाना इस वक्त सरकार की सबसे बड़ी चिंता और प्राथमिकता है, लेकिन तंगहाल वैश्विक हालात और घरेलू राजनीतिक मजबूरियों के बीच ये काम आसान नहीं दिखता.

प्रणब मुखर्जी से वित्त मंत्रालय का जिम्मा संभालने के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकने की जरूरत पर जोर दिया है. बुधवार को उन्होंने कहा, “अर्थव्यवस्था की रफ्तार को बनाए रखना होगा और भारतीय वृद्धि की कहानी को दोबारा शुरू करना होगा.”

मुखर्जी ने ऐसे समय में वित्त मंत्रालय छोड़ा है जब भारतीय अर्थव्यवस्था लगातार गिरावट का शिकार है. पहली तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था 5.3 प्रतिशत की सालाना दर से आगे बढ़ी, जो पिछले नौ साल में सबसे कम है.

रातों नहीं होगा बदलाव

उद्योग जगत ने प्रधानमंत्री के बयान का स्वागत किया है. भारतीय उद्योग परिसंघ यानी सीआईआई के महानिदेशक चंद्रजीत बनर्जी ने बीबीसी से बातचीत में कहा, “प्रधानमंत्री ने वही कहा है जो हम काफी समय से कहते आ रहे हैं कि हमें तुरंत कदम उठाने होंगे और अपनी अर्थव्यवस्था में मौजूद संभावनाओं का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करना होगा. हम इस बात को लेकर खुश है कि प्रधानमंत्री ने भी ये बात कही है.”

"ये मानना व्यवहारिक नहीं है कि प्रणव मुखर्जी के जाने के बाद वही लोग एक नई टीम के तौर पर काम करेंगे और सब कुछ रातों रात ठीक हो जाएगा जो डेढ़ साल से बिगड़ रहा है. इसमें समय लगेगा. बहुत मेहनत करनी होगी."

एमके वेणु, अर्थशास्त्री

जानकार मानते हैं कि सरकार अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की बात पहले भी करती रही है. इसलिए उम्मीदों को बहुत ज्यादा बढ़ाए बिना जरूरत इस बात की है कि धीरे धीरे काम किया जाए.

जाने माने अर्थशास्त्री एमके वेणु ने बीबीसी को बताया, “ये मानना व्यावहारिक नहीं है कि प्रणव मुखर्जी के जाने के बाद वही लोग एक नई टीम के तौर पर काम करेंगे और सब कुछ रातों रात ठीक हो जाएगा जो डेढ़ साल से बिगड़ रहा है. इसमें समय लगेगा. बहुत मेहनत करनी होगी.”

सुधारों की दरकार

मनमोहन सिंह खुद एक अर्थशास्त्री हैं, लेकिन पिछले एक-दो साल में उनकी इस छवि को खासी ठेस पहुंची है. दरअसल मुद्रास्फीति नियंत्रण में नहीं है और आर्थिक वृद्धि में लगातार गिरावट आई है.

वैश्विक अर्थव्यवस्था भी खस्ताहाल दौर से गुजर रही है जिसके असर से भारत भी अछूता नहीं है. लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था को हाल के वर्षों में सुधारों की प्रक्रिया रुक जाने का भी खमियाजा उठाना पड़ रहा है.

भारतीय मुद्रा

बढ़ती महंगाई के कारण सरकार पर दबाव बढ़ रहा है.

जानी मानी अर्थशास्त्री और आर्थिक मामलों की पत्रकार इला पटनायक का कहना है, “आर्थिक सुधार जरूरी हैं. उसी से अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाया जा सकता है. अगर हमें वित्तीय घाटा कम करना है तो उसके लिए भी सब्सिडी सुधार करने होंगे. सुधार एक क्षेत्र में नहीं, कई क्षेत्रों में करने होंगे.”

राजनीतिक इम्तिहान

प्रधानमंत्री ने कहा कि टैक्स के मोर्चे पर बहुत समस्याएं हैं और बीमा क्षेत्र भी धीमा पड़ रहा है जो भारत जैसे देश में सामान्य नहीं है जहां बहुत सी बीमा जरूरतों को पूरा किया जाना है.

चंद्रजीत बनर्जी कहते हैं, “उद्योग जगत के नजरिए से देखें तो जो सबसे बड़ा आर्थिक सुधार रुका पड़ा है वो है वस्तु और सेवा कर यानी जीएसटी. इसके लिए बहुत अधिक तालमेल और विचार विमर्श की जरूरत है. खास कर विभिन्न राजनीतिक पार्टियों से चर्चा करनी होगी. दूसरे सुधारों की रफ्तार भी तेज करनी होगी ताकि अर्थव्यवस्था पटरी पर लौटे.”

केंद्र में सत्ताधारी यूपीए गठबंधन सरकार को सुधारों के मुद्दे पर अपने तमाम सहयोगियों को भरोसे में लेना होगा. एमके वेणु कहते हैं, “मनमोहन सिंह के लिए राजनीति मोर्चे पर इम्तिहान बाकी है. इस मामले में राजनीति बहुत अहमियत रखती है. मेरे ख्याल से मनमोहन सिंह के लिए अब अर्थशास्त्र की दक्षताओं की उतनी जरूरत नहीं है, जितना राजनीतिक दक्षताओं की है.”

वही उद्योग जगत का कहना है कि ये बात सभी राजनीतिक दलों को समझनी होगी कि विकास और आर्थिक वृद्धि के नजरिए से आर्थिक सुधार बेहद जरूरी हैं.

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