भोपाल पर फैसले से निराशा, पर उम्मीद कायम

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Image caption भोपाल गैस कांड के पीड़ितों को लगता है कि उनके साथ अभी तक न्याय नहीं हुआ है.

भोपाल में यूनियन कार्बाइड के संयंत्र के रिसाव से दूषित हुए पानी और मलबे को हटाने की जिम्मेदारी से इस कंपनी और उसके प्रमुख वॉरेन एंडरसन को बरी किए जाने पर गैस पीड़ित आंदोलन से जुड़े लोग निराशा हैं जबकि कई लोग इसे अपेक्षित फैसला मान रहे हैं.

ये मामला यूनियन कार्बाइड के पीछे रहने वाले उन चालीस हजार से ज्यादा लोगों का है, जिनका पानी और मिट्टी प्रदूषित हुआ है. इससे उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ा है. इसलिए उनके लिए मुआवजे और आसपास के इलाके की सफाई की मांग की जा रही है.

मैनहटन की संघीय अदालत के जज जॉन कीनन ने अपने फैसले में कहा कि चूंकि यूनियन कार्बाइड कंपनी ने भारत में स्थित यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड नामक कंपनी में अपना हिस्सा बेच दिया था इसलिए अब उस पर भोपाल में गैस-रिसाव से प्रभावित इलाकों में सफाई कराने की कोई जिम्मेदारी लागू नहीं होती है.

जिम्मेदारी किसकी

यूनियन कार्बाइड कंपनी ने 1994 में यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड में अपना हिस्सा बेच दिया था.

लेकिन भोपाल गैस पीड़ितों के आंदोलन से जुड़ी सामाजिक कार्यकर्ता रचना ढींगरा ने बीबीसी को बताया, “अगर आप यहां पर मजदूरों से बात करेंगे तो पता चलेगा कि एक छोटा सा वाल्व बदलने की मंजूरी भी अमरीका में यूनियन कार्बाइड से लेनी पड़ती थी. इसलिए ये नहीं कहा जा सकता कि संयंत्र यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड का था इसलिए उनकी जिम्मेदारी है. पूरा कंट्रोल अमरीका का था इसलिए जिम्मेदारी उनकी बनती है.”

अमरीकी अदालत में याचिकाकर्ता जानकीबाई साहू और अन्य ने यूनियन कार्बाइड कंपनी के खिलाफ मुकदमा दायर किया था जिसमें कहा गया था कि भोपाल में 1984 में जहरीली गैस के रिसाव के बाद से पड़े हुए मलबे के कारण इलाके का पानी दूषित हो गया है.

भोपाल गैस पीड़ित महिला उद्योग संगठन से जुड़े अब्दुल जब्बार बीबीसी से बातचीत में कहते हैं, “वो कंपनी और सन 1992 से फरार उसका सीईओ वॉरेन अंडरसन अगर जवाबदेह नही हैं तो वे अब तक खामोश क्यों हैं. उन्होंने 47 करोड़ डॉलर क्यों दिए. वे लोग बहुत से कानूनी मामलों में क्यों फंसे रहे.”

रचना ढींगरा कहती हैं, "संयंत्र से निकलने वाले कचरे और दूषित पानी का प्रबंधन, संचालन और डिजाइन यूनियन कार्बाइड कंपनी, अमरीका ने किया है. उन्हें मालूम था कि इसकी वजह से प्रदूषण होगा, और आज प्रदूषण हो गया है और लोग उसकी वजह से पीड़ित हैं. इसलिए ये नहीं कहा जा सकता कि कंपनी की जिम्मेदारी नहीं बनती और सारी जिम्मेदारी सरकार की बनती है."

जज पर सवाल

जब्बार अमरीकी अदालत के फैसले को लंदन ओलंपिक के प्रायोजन से जोड़कर देखते हैं. उन्होंने कहा, “ये फैसला लंदन ओलंपिक को ध्यान में रख कर दिया गया है जिसमें अब पंद्रह दिन का समय बचा है. चूंकि अतंरराष्ट्रीय समुदाय में ये बात उठने लगी है कि जो कंपनी भोपाल के नरसंहार या रासायनिक मिलावट के लिए जिम्मेदार है, वो कैसे लंदन ओलंपिक जैसे सामाजिक कामों में प्रायोजक बन सकती है.”

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Image caption कई सामाजिक कार्यकर्ता इस मामले के लिए यूनियन कार्बाइड के प्रमुख रहे वॉरेन एंडरसन को मुख्य रूप से जिम्मेदार मानते हैं.

यूनियन कार्बाइड को 2001 में डाउ केमिकल्स ने खरीद लिया, जो लंदन ओलंपिक के मुख्य प्रायोजकों में से एक है. भारत आधिकारिक तौर पर इसका विरोध कर रहा है.

जब्बार का कहना है कि लंदन ओलंपिक को ध्यान में रखकर ही यूनियन कार्बाइड को क्लीन चिट दी गई है. हालांकि ये मामला अमरीकी अदालत के अलावा भारत में जबलपुर हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में लंबित है.

इस मामले में फैसला देने वाले जज जॉन कीनन पर भी सवाल उठ रहे हैं. रचना ढींगरा ने कहा, “ये फैसला भोपाल के लोगों के लिए दुखद है, लेकिन इस मामले में फैसला देने वहां जज जॉन कीनन का रवैया पिछले 28 साल से इस मामले में पीड़ित विरोधी रहा है, इसलिए ये फैसला अपेक्षित भी था. ये चौथी बार जब उन्होंने इसे खारिज किया है. इस बार भी हम अपील करेंगे और अगर जीत जाते हैं तो ये मामला फिर जॉन कीनन की अदालत में नहीं जाएगा और ज्यूरी ट्रायल में तब्दील हो जाएगा.”

अब इस अपील में करीब एक साल तक लग सकता है.

भोपाल में 3 दिसंबर 1984 में यूनियन कार्बाइड कंपनी के संयंत्र से रिसने वाली जहरीली गैस की त्रासदी में भारत सरकार के आंकड़ों के मुताबिक पांच हजार से अधिक लोगों की मौत हुई थी, जबकि अमरीकी मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल के अनुसार इस त्रासदी में 20 हज़ार से अधिक लोग मारे गए थे.

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