संकटों से जूझता चाँदी के वर्क का उद्योग

हैदराबाद में चाँदी के वर्क का उद्योग
Image caption चाँदी का वर्क बनाने का उद्योग हैदराबाद के इतिहास का हिस्सा रहा है

हैदराबाद में ऐतिहासिक चारमीनार की सड़क से अगर गुजरें तो आपको लगातार खट-खट की आवाजें सुनाई देगीं.

ये हथौड़ों और औजारों के टकराने की आवाज़ है जो चाँदी का वर्क बनाने के कारखानों से आ रही है.

कुछ वर्ष पहले तक ये आवाजें कहीं ज्यादा तेज थीं क्योंकि यहाँ ऐसी कई दुकानें थीं, लेकिन वक्त के साथ इस उद्योग पर संकट घिरता जा रहा है.

पहले इस इलाके में ऐसी लगभग एक दर्जन दुकानें थीं. अब ये घटकर तीन या चार ही रह गई हैं.

चाँदी का वर्क बनाने का उद्योग हैदराबाद के इतिहास और शानदार परंपराओं का हिस्सा रहा है. ये वर्क ना केवल दवाइयाँ बनाने में काम आता है, बल्कि हैदराबाद के नवाबी पकवानों, मज़ेदार मिठाइयों, यहाँ तक कि पान को भी आकर्षक बनाने में भी काम आता है.

मक्का मस्जिद से लगी एक दुकान के मालिक मोहम्मद अकबर का परिवार कई दशकों से यही काम कर रहा है. वो कहते हैं कि इस उद्योग में संकट का सब से बड़ा कारण चाँदी की कीमत में आई ज़बरदस्त बढ़ोत्तरी है.

मोहम्मद अकबर का कहना है, "कीमत बढ़ने से वर्क का इस्तेमाल कम हो गया है. पहले अगर कोई व्यक्ति 10 वर्क इस्तेमाल करता था तो अब वो केवल दो वर्क इस्तेमाल करता है."

अकबर के पडोसी दुकानदार नूर मोहम्मद का परिवार भी लम्बे समय से इसी उद्योग से जुड़ा है.

वो कहते हैं, "पहले हमारे अब्बा के पास 20 कारीगर थे. आज केवल तीन ही लोग रह गए हैं. पहले हमारी केवल चांदी के वर्क की दुकान थी. आज हमें इस के साथ नकली आभूषणों का व्यापार करना पड रहा है."

चांदी का वर्क बेचने वाले लोग आज कपड़े और चप्पल बेच रहे हैं.

मेहनत का काम

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Image caption मोहम्मद वलीउद्दीन के मुताबिक मशीनों से वर्क बनाना हाथ से वर्क बनाने के लिए चुनौती बन गया है

वर्क बनाने का काम कड़ी मेहनत का है. पहले चाँदी की सलाख को एक इंच के पतले टुकड़ों में बदला जाता है. आधे तोले चांदी के 160 टुकड़े बनाए जाते हैं और हर टुकड़े को जर्मन काग़ज़ के बीच रखा जाता है. उस के बाद 160 पन्नों के फोल्डर में रखे सभी टुकड़ों को लगातार हथौड़े से कूटा जाता है. तब कहीं जाकर महीन और पतला चाँदी का वर्क तैयार होता है.

यूसुफ पिछले 30 सालों से यही काम कर रहे हैं. यूसुफ को हर दिन के लगभग 250 रुपए मिलते हैं जिसके लिए उन्हें 160 पन्नों के एक फोल्डर को लगातार दो घंटे तक कूटना पड़ता है जो काफी थका देने वाला होता है.

मोहम्मद वलीउद्दीन चारमीनार के इलाके में इसी उद्योग की एक जानी-मानी हस्ती हैं. उनका कहना है कि चांदी की कीमत में वृद्धि कोई समस्या नहीं है क्योंकि हर चीज़ का मूल्य बढा है.

उनका कहना है कि मशीनों से वर्क बनाने का तरीका हाथ से वर्क बनाने के 400 साल पुराने उद्योग के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है.

इंसान और मशीन के बीच इस मुकाबले में कुछ झूठा प्रचार भी हाथ के उद्योग के लिए समस्याएँ बढाने का करण बन गया है.

जैन व्यपारियों ने हाथ से बने चाँदी के वर्क खरीदना बंद कर दिया है क्योंकि उन्हें संदेह है कि जिस फोल्डर में चाँदी को रख कर कूटा जाता है वो चमड़े से बना है.

वलीउद्दीन इसका खंडन करते हैं. वो कहते हैं की इस काम में केवल जर्मन पेपर का इस्तेमाल होता है. उसे भी बार-बार बदला जाता है ताकि इसमें तैयार होने वाला चाँदी का वर्क स्वास्थ्य के लिए अच्छा रहे.

इन व्यापारियों की शिकायत है कि सांप्रदायिक और राजनीतिक कारणों से झूठा प्रचार किया जा रहा है क्योंकि हाथ से चाँदी का वर्क बनाने का काम मुसलमान कारीगर करते हैं.

वलीउद्दीन कहते हैं, "झूठे प्रचार के लिए वो लोग भी जिम्मेदार हैं जो मशीनों से चाँदी का वर्क बना रहे हैं, हालाँकि मशीनों में ऐसे रसायन और पदार्थों का इस्तेमाल होता है जो इंसान के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं. इस की तुलना में हाथ से बना वर्क अच्छा होता है. केवल मशीनों को बढ़ावा देने के लिए इस 400 वर्ष पुराने उद्योग को बदनाम किया जा रहा है.”

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