सेतुसमुद्रम: 'वैकल्पिक रास्ता व्यावहारिक नहीं'

अदालत
Image caption अदालत ने सरकार को परियोजना के बारे में आगे की कार्रवाई की जानकारी देने के लिए आठ सप्ताह का समय दिया

भारत सरकार ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि एक उच्चस्तरीय समिति की रिपोर्ट से संकेत मिले हैं कि सेतुसमुद्रम परियोजना पर वैकल्पिक रास्ता पर्यावरण के मुताबिक और आर्थिक रूप से व्यावहारिक नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए सॉलिसिटर जनरल रोहिनटन नरिमन ने कहा कि सरकार ने अभी पर्यावरणविद आरके पचौरी के नेतृत्व में बनी समिति की रिपोर्ट पर गौर नहीं किया है और न ही कोई फैसला लिया है.

समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार अदालत ने सरकार को परियोजना के बारे में आगे की कार्रवाई के बारे में जानकारी देने के लिए आठ सप्ताह का समय दिया है.

नरिमन ने कहा कि पचौरी समिति ने वैकल्पिक रास्ते के बारे में गौर किया लेकिन यह 'आर्थिक और पर्यावरण के हिसाव से' संभव नहीं है.

अपनी रिपोर्ट में समिति ने इससे पैदा होने वाले सभी जोखिमों को भी समझा और इस निष्कर्ष पर पहुंची कि तेल के रिसाव से परितंत्र को नुकसान पहुंच सकता है.

याचिका

सुप्रीम कोर्ट उन याचिकाओं की सुनवाई कर रहा है जिसमें सेतुसमुद्रम परियोजना को चुनौती दी गई है जिसके बनने से कथित तौर पर 'रामसेतु' को नुकसान हो सकता है.

सेतुसमुद्रम परियोजना का उद्देश्य उस रामसेतु के बीच से एक छोटा रास्ता बनाना है जिसके बारे में अनेक हिंदुओं का मानना है कि "इसे भगवान राम ने अपनी वानर सेना की मदद से बनाया था.'

सेतुसमुद्रम परियोजना में 30 मीटर चौड़े, 12 मीटर गहरे और 167 मीटर लंबे चैनल के निर्माण का प्रस्ताव है.

क्या है मामला

इससे पहले अप्रैल में कोर्ट ने सरकार को रामसेतु को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने या न करने के बारे में जवाब मांगा था. केंद्र ने रामसेतु पर कोई कदम उठाने से इंकार कर दिया था और कहा था कि उच्चतम न्यायालय इस पर फैसला करे.

सरकार ने कहा था कि वह 2008 में दायर अपने पहले हलफनामे पर कायम रहेगी जिसे राजनीतिक मामलों की मंत्रिमंडल समिति ने मंजूरी दी थी. इसमें कहा गया था कि सरकार सभी धर्मों का सम्मान करती है.

केंद्र द्वारा पहले दो हलफनामे वापस लिए जाने के बाद संशोधित हलफनामा दायर किया गया जिनमें भगवान राम और रामसेतु के अस्तित्व पर सवाल उठाए गए थे.

भगवान राम और राम सेतु के अस्तित्व पर सवाल उठाए जाने पर संघ परिवार के रोष के बाद शीर्ष अदालत ने सितंबर 2007 में केंद्र को 2,087 करोड़ रुपए की परियोजना की नए सिरे से समीक्षा करने के लिए समूची सामग्री के फिर से निरीक्षण की अनुमति दे दी थी.

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