स्नातक नहीं पैदल सिपाहियों की फौज होगी: शिक्षाविद

 गुरुवार, 12 जुलाई, 2012 को 05:28 IST तक के समाचार
छात्र (फाइल फोटो)

विशेषज्ञों का कहना है कि स्नातकों की संख्या बढ़ने से बात नहीं बनेगी

एक रिपोर्ट में कहा गया है कि अगले आठ वर्षों में भारत में स्नातकों की संख्या अमरीकी स्नातकों से ज्यादा होगी. ये बात उत्साहवर्धक लगती है लेकिन शिक्षाविद इस रुझान से इत्तेफाक नहीं रखते हैं.

ऑर्गेनाइजेशन फॉर इकॉनोमिक को-ऑपरेशन एंड डेवेलपमेंट यानी ओईसीडी का कहना है कि साल 2020 तक स्नातकों की संख्या के हिसाब से चीन पहले, भारत दूसरे और अमरीका तीसरे स्थान पर होगा.

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लेकिन भारत के मामले में विशेषज्ञ इसे महज संख्या बताते हैं जिसमें उनके मुताबिक गुणवत्ता नहीं होगी.

आबादी का पहलू

जानेमाने शिक्षाविद अनिल सदगोपाल कहते हैं कि पूरी दुनिया की आबादी में अमरीका की आबादी का प्रतिशत लगभग साढ़े चार है जबकि भारत की आबादी सत्रह फीसद है, इसलिए जाहिर है कि भारत में शिक्षा की स्थिति बेहतर होती है तो वो अमरीका से आगे निकल जाएगा.

वे कहते हैं इस रिपोर्ट में संख्या की बात की गई है लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता पर कुछ नहीं कहा गया है.

अनिल सदगोपाल सवाल उठाते हैं, ''उच्च शिक्षा का मकसद क्या बेहतर समाज का निर्माण करना है या आप केवल वैश्विक बाजार और पूंजी के लिए पैदल सिपाहियों की फौज खड़ी कर रहे हैं. पश्चिम के मुकाबले हम फिर पिछड़ेंगे, संख्या हमारी ज्यादा हो सकती है लेकिन पश्चिम में जो शोध होगा, वो हमसे कहीं आगे होगा.''

संख्या बढ़ने की वजह

"उच्च शिक्षा का मकसद क्या बेहतर समाज का निर्माण करना है या आप केवल वैश्विक बाजार और पूंजी के लिए पैदल सिपाहियों की फौज खड़ी कर रहे हैं. पश्चिम के मुकाबले हम फिर पिछड़ेंगे, संख्या हमारी ज्यादा हो सकती है लेकिन पश्चिम में जो शोध होगा, वो हमसे कहीं आगे होगा"

अनिल सदगोपाल, शिक्षाविद

भारत में स्नातकों की संख्या बढ़ने की वजह के बारे में पूछे जाने पर अनिल सदगोपाल कहते हैं, ''गांव में खेती आधारित रोजगार को बड़ी तेजी से खत्म किया गया है. वहां की आबादी लाचार होकर शहरों की ओर आई तो उनके बच्चों को भी कुछ करना होगा.''

वे कहते हैं, ''यही वजह है कि वो कैसी भी घटिया डिग्री क्यों न हो, लेने की कोशिश करेंगे. इंजीनियरिंग और मेडिकल के क्षेत्र में भी यही हाल है. इन लोगों के लिए तो नौकरी भी नहीं है.''

निजी कॉलेजों की दशा बताते हुए अनिल सदगोपाल कहते हैं कि यहां अब कोई कंपनी प्लेसमेंट के लिए भी नहीं आती है, बच्चों से प्लेसमेंट के नाम पर फीस ली जाती है और कंपनियों से कहा जाता है कि वे आकर प्लेसमेंट का नाटक करें.

शिक्षा और शोध की गुणवत्ता

"मेरे लिए इस बात का कोई महत्व नहीं होगा कि हम नंबर एक पर होंगे या नंबर दो पर, हमें ये देखना होगा कि हमारे शोध की गुणवत्ता कैसी है, हमारे कॉलेज और यूनिवर्सिटी में पढ़ाई का स्तर कैसा है"

डॉक्टर जगमोहन सिंह राजपूत, शिक्षाविद

वहीं एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक डॉक्टर जगमोहन सिंह राजपूत का कहना है कि भारत में सिर्फ स्नातकों की संख्या बढ़ने से बात नहीं बनने वाली है.

वे कहते हैं, ''मेरे लिए इस बात का कोई महत्व नहीं होगा कि हम नंबर एक पर होंगे या नंबर दो पर, हमें ये देखना होगा कि हमारे शोध की गुणवत्ता कैसी है, हमारे कॉलेज और यूनिवर्सिटी में पढ़ाई का स्तर कैसा है.''

वे कहते हैं कि भारत में अब सब अपने लड़के-लड़कियों को पढ़ा रहे हैं, लेकिन बहुत से बच्चे थोड़ा-बहुत पढ़-लिखकर बैठ जाते हैं क्योंकि इस शिक्षा के साथ कौशल नहीं जुड़ा होता है, जब तक शिक्षा के साथ कौशल नहीं होगा, तब तक स्थिति सुधरने वाली नहीं है.

शिक्षा-संबंधी नीति और इस नीति को बनाने वालों पर सवालिया निशान लगाते हुए वे कहते हैं, ''जो लोग शिक्षा नीति बनाते हैं, उनके बच्चे तो सरकारी स्कूल में कभी गए नहीं होते, इन लोगों के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़े होते तो सरकारी स्कूलों की हालत इतनी खराब नहीं होती.''

वे कहते हैं कि भारत के 70 प्रतिशत बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं जिन्हें अपेक्षित शिक्षा नहीं मिलती है, अभी सिर्फ 30 प्रतिशत बच्चों को अच्छी शिक्षा मिल रही है और यही बच्चे दुनियाभर में भारत का नाम रौशन कर रहे हैं.

वे कहते हैं, ''यदि भारत के 80 प्रतिशत बच्चों को अच्छी शिक्षा दे पाते तो देश की ज्ञान-सम्पदा दुनिया में सबसे ज्यादा होती.''

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