क्या राहुल, गाँधी परिवार का भाग्य चमकाएगे?

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Image caption उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के खराब प्रदर्शन के बाद राहुल गांधी के नेतृत्व क्षमता पर काफी सवाल उठे थे.

गुरूवार को राष्ट्रपति चुनाव में मतदान करके बाहर आ रहे कांग्रेस महासचिव राहूल गांधी ने अंग्रेजी टेलीवीजन चैनेल एनडीटीवी को बयान दिया, "मैं पार्टी और सरकार में अधिक सक्रिय भूमिका निभाऊंगा. इस मामले पर निर्णय हो चुका है, इसके लिए उचित वक्त कब है ये नेतृत्व को तय करना होगा."

उनके ताजा बयान के बाद कांग्रेस पार्टी और देश की राजनीति में राहुल गांधी की भूमिका पर फिर से बहस शुरू हो गई है.

पार्टी में उनके बयान का स्वागत होना जाहिर है और कांग्रेस प्रवक्ता ने 'इसे सकारात्मक कदम' बताया. वहीं मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी का कहना था कि 'राहुल की काबिलियत उत्तर प्रदेश में जाहिर हो चुकी है.'

पिछले साल के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को देश के सबसे बड़े राज्य की कुल 403 सीटों में से 28 सीटें हासिल हुई थीं, जबकि चुनाव की पूरी कमान राहुल गांधी और उनकी टीम के हाथ में थी.

'देर-सवेर होना ही था'

राजनीतिक विश्लेषक भारत भूषण कहते हैं कहना है, "आप एक बार उपयोगी साबित नहीं हुए तो कभी नहीं होंगे, बिल्कुल गलत है."

उनका कहना है कि भारतीय चुनाव में हार ज्यादा सीख देती है और उम्मीद की जाती है कि राहुल गांधी को भी अपनी हार से सीख मिली होगी.

कांग्रेस पर पैनी नजर रखने वाले पत्रकार और लेखक रशीद किदवई का मानना है कि ये कांग्रेस पार्टी की ओर से 2014 के आम चुनाव की तैयारी है.

लेखक-पत्रकार रशीद किदवई का कहना है, "राष्ट्रपति के पद पर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के उम्मीदवार प्रणव मुखर्जी की जीत तय है, दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी की तरफ से लगता है गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी आम चुनाव में प्रधानमंत्री पद की तौर पर उम्मीदवार हो सकते हैं, मनमोहन सिंह आम चुनाव के समय 81 या 82 साल के होंगे, कांग्रेस राहुल गांधी को अपने उम्मीदवार के तौर पर सामने लाएगी."

रशीद किदवई कहते हैं कि पार्टी में इस बात पर बहस चल रही है कि उन्हें कौन सा पद दिया जाए. "सरकार का एक धड़ा उन्हें राजनीतिक या सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति में लाने की पक्ष में है, कुछ चाहते हैं कि उन्हें किसी अहम मंत्रालय की कमान सौंपी जानी चाहिए."

चर्चा ये भी है कि उन्हें पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया जा सकता है.

भारत भूषण ने बीबीसी से कहा कि राहुल गांधी पर कांग्रेस के भीतर से दबाव है कि वो सरकार और पार्टी में ज्यादा बड़ा रोल अदा करें, "वैसे भी कांग्रेस राहुल गांधी के घर की पार्टी है, उन्हें देर-सवेर इसका चार्ज लेना ही था, वो वही करने की बात कर रहे हैं."

'कहलवाया गया'

Image caption राहुल गांधी के बयान ने अपनी राजनीतिक भूमिका पर फिर से बहस छेड़ दी है.

केंद्रीय कानून मंत्री और कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद ने हाल में ही एक साक्षात्कार में कहा था कि अगर राहुल गांधी पार्टी या सरकार में ज्यादा सक्रिय होंगे तो दल को खुशी होगी, क्योंकि अभी तक तो वो कभी कभार दिखकर गायब हो गए हैं.

सलमान खुर्शीद के इस बयान को मीडिया के एक समूह ने इस तरह पेश किया जैसे राहुल गांधी की शान में उन्होंने कोई गुस्ताखी के तौर पर कर दी हो लेकिन भारत भूषण का कहना है, "बयान पूर्वनियोजित था क्योंकि भारतीय राजनीति में पद के लिए दावेदारी या अहम रोल पाने की बात खुद से नहीं की जाती बल्कि किसी से कहलवाई जाती है."

अगले आम चुनाव में पार्टी के प्रधानमंत्री पद के दावेदार को लेकर कांग्रेस पार्टी में काफी हलचल है और सोच ये है कि नरेन्द्र मोदी की काट राहुल गांधी से बेहतर कौन हो सकता है.

गुजरात में होने वाले विधान सभा चुनाव में तो बीजेपी के सुत्रों के मुताबिक ये नारा लग सकता है, 'आपका वोट सिर्फ सीएम के लिए नहीं, पीएम के लिए भी है.'

पोल

लेकिन कांग्रेस का ये दांव फेल भी तो हो सकता है? क्या इसमें ये खतरा नहीं होगा कि राहुल गांधी, जो पहले भी पार्टी को कोई बड़ी कामयाबी हासिल करवाने में नाकाम रहे हैं, के जलवे की पोल पूरी तरह से खूल जाए?

भारत भूषण मानते हैं कि ये खतरा तो है लेकिन अगर राहूल गांधी को कामयाब होना है तो उन्हें खतरा मोलना पड़ेगा और पार्टी को अपनी छवि में तैयार करना होगा.

वो कहते हैं, "कांग्रेस पार्टी में 1969 और फिर 1977 के विभाजन के बाद पार्टी नई नेता, यानी इंदिरा गांधी की छवि में तैयार हुई थी. राहुल गांधी को भी पार्टी में अपने लोगों को स्थापित करना होगा, एक नई व्यवस्था कायम करनी होगी. भारतीय राजनीति आश्रय-पश्रय़ के बल पर चलती है, वो तभी बनेगी जब आप अधिक सक्रिय होंगे."

उनका कहना है कि पार्टी के एक धड़े में ये सोच भी काम कर रही है कि कांग्रेस पर सोनिया गांधी के खासम-खास लोगों की पकड़ ढीली हो और उसकी जगह राहुल गांधी के करीबी लोग लें.

अंग्रेजी साप्ताहिक ओपन के राजनीतिक संपादक हरतोश बल कहते हैं कि राहुल के लिए राजनीति में अधिक सक्रिय होने के लिए इससे बेहतर वक्त नहीं हो सकता था.

'अपेक्षा कम है'

हरतोश बल कहते हैं, "उत्तर प्रदेश के चुनाव के बाद राहुल गांधी से जो बड़ी-बड़ी उम्मीदें लगाई गई थीं, वो कम हो गई हैं, ये साबित हो गया है कि राहुल गांधी या कोई भी व्यक्ति आज के दौर में सिर्फ अपने बल-बूते किसी दल को बड़ी कामयाबी हासिल नहीं करवा सकता. दूसरी तरफ पिछले तीन सालों में सरकार भी कुछ बड़ा नहीं कर पाई है, बल्कि वो भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों से घिरी है. राहुल गांधी अगर अभी कमान संभालते हैं तो उन्हें काम करने के लिए लंबा समय मिल सकता है. अगर 2014 में पार्टी हार भी गई तो वो 2019 की तरफ ध्यान केंद्रित कर सकते हैं."

उनका कहना है कि उनसे किसी भारी बदलाव की अपेक्षा ही गलत है. ये किसी एक सख्श के बस में नहीं है.

लेकिन भारत भूषण कहते हैं कि राहुल गांधी को याद रखना होगी कि राजनीति कोई पिकनिक नहीं कि एक रात गांव में गुजार ली और फिर दोस्तों के साथ पार्टी करने चले गए. उन्हें समझना होगा कि राजनीति एक फुल-टाइम प्रोफेशन है और वो जबतक इसमें पूरी तरह नहीं डूबेंगे तबतक कुछ हासिल नहीं होगा.

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