ठाकरे बंधुओं का मिलन राजनीतिक दोस्ती में बदल सकेगा?

Image caption राज ठाकरे ने छह साल पहले शिवसेना से अलग होकर नई पार्टी बना ली थी

इन दिनों महाराष्ट्र में शिव सेना और साल 2006 में इससे अलग हुई महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के ज़मीनी कार्यकर्ताओं के हलकों में ख़ुशी की एक लहर दौड़ गई है.

कारण है उद्धव ठाकरे और उनके रूठे हुए चचेरे भाई राज ठाकरे के बीच पिछले कुछ दिनों में कई मुलाकातें.

पिछले दिनों जब उद्धव ठाकरे सीने में दर्द के कारण अस्पताल में भर्ती हुए तो राज उनसे मिलने गए और उन्हें अपनी महँगी गाड़ी में उनके घर मातोश्री छोड़ने गए.

उसके बाद से ये अटकलें लगाई जा रही हैं कि अब दोनों भाइयों में सुलह सफाई हो गई है और शायद अब वो दिन दूर नहीं जब महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना शिव सेना में वापस लौट जाए.

कम से कम दोनों पार्टियों के ज़मीनी कार्यकर्ताओं के बीच उम्मीद की किरण जाग उठी है.

विश्वास

पार्टी में फूट के बाद मैं जब भी राज्य के दूर दराज़ इलाकों में गया मुझे दोनों पार्टियों के लोगों ने ये संकेत दिए की उनका आपसी मतभेद कभी दुश्मनी में नहीं बदल सकता और ये कि वो चाहते हैं कि दोनों पार्टियाँ फिर से एक हो जाएँ.

लेकिन अब, जबकि छः साल में पहली बार ठाकरे परिवार में मेल-मिलाप होता दिखाई देता है क्या ये मुमकिन है कि दोनों पार्टियाँ भी आपस में मिल जाएँ. दूसरे शब्दों में नव निर्माण सेना शिव सेना में फिर से वापस चली जाए.

इसका जवाब शायद अभी न मिले लेकिन दोनों पार्टियों का फिर से मिल जाना इतना आसान नहीं होगा.

वैसे भी अटकलों पर टिप्पणी करते हुए शिव सेना के प्रवक्ता संजय राउत ने बीबीसी को बताया कि ठाकरे भाइयों की आपसी मुलाकातें निजी स्तर की हैं.

अगर एक भाई बीमार हो तो दूसरा भाई उसे देखने ज़रूर आएगा. इसका मतलब ये नहीं कि दोनों पार्टियों का आपसी मिलाप भी हो जाएगा.

शिव सेना में फूट से पहले राज ठाकरे उद्धव से अधिक लोकप्रिय और शक्तिशाली नेता थे और उन्हें उम्मीद थी कि बाल ठाकरे उन्हें अपना जानशीन चुनेंगे.

लेकिन जब 2006 में उन्होंने अपने भतीजे को नज़रअंदाज़ करके पार्टी का नेतृत्व अपने बेटे उद्धव के हवाले किया तो वो पार्टी से अलग हो गए और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना पार्टी की स्थापना की.

पिछले छः सालों में राज ठाकरे ने अपनी पार्टी को राज्य भर में स्थापित कर दिया है.

चुनावी सफलताओं के कारण अब राज्य में उनकी पार्टी को संजीदगी से लिया जाता है. दूसरी तरफ शिव सेना के समर्थकों को अपनी तरफ खींच कर उन्होंने अपने भाई और चाचा की पार्टी को कमज़ोर करने का भी काम किया है.

समझौते की उम्मीद

अगर राज ठाकरे शिव सेना में वापस लौटेंगे तो इसकी कीमत भी चाहेंगे. क्या भाई उद्धव ठाकरे और चाचा बाल ठाकरे उन्हें वो पद देने के लिए तैयार होंगे जिसके न मिलने पर वो पार्टी से अलग हुए थे.

या फिर उन्हें उद्धव की बराबरी का कोई दर्जा दिया जाएगा. अगर ऐसा हुआ तो राज उद्धव को लोकप्रियता में काफी पीछे छोड़ देंगे. क्या उद्धव ये सियासी ख़ुदकुशी करने को तैयार होंगे.

दूसरी तरफ शिव सेना के नेतागण इस बात को जानते हैं कि राज ठाकरे की वापसी से 2014 के आम चुनाव और उसी साल होने वाले विधान सभा के चुनाव में पार्टी को ज़बरदस्त फायदा होगा.

इस से भी ज्यादा शिव सेना और नवनिर्माण सेना के ज़मीनी कार्यकर्ताओं की सबसे बड़ी इच्छा पूरी हो जाएगी.

अब देखना है दोनों भाइयों की दोबारा दोस्ती का सफ़र ठाकरे परिवार तक ही सीमित रहता है या फिर राजनीति में अपना रंग लाता है.

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