आंध्र प्रदेश नहीं 'अंधेर प्रदेश'

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Image caption आंध्र प्रदेश में बिजली का गंभीर संकट पैदा हो गया है.

आंध्र प्रदेश बिजली के एक ऐसे गंभीर संकट में घिरा हुआ है कि लोग अब इसे "अंधेर प्रदेश" कहने लगे हैं.

प्रदेश में जहाँ घरेल उपभोक्ताओं को कई-कई घंटों की बिजली कटौती का सामना करना पड़ रहा है, वहीं सबसे बुरी मार औद्योगिक क्षेत्र पर पड़ी है जिसे मांग की तुलना में केवल आधी बिजली ही मिल रही है.

उद्योग जगत का कहना है कि बिजली की कटौती के चलते कारखानों में महीने में केवल पंद्रह दिन काम हो पा रहा है और रोजाना 260 करोड़ रुपए का नुकसान हो रहा है.

30 लाख कामगारों वाले छोटे उद्योगों का हाल इतना बुरा है कि उन्होंने कारखाने बंद करने तक की धमकी दे डाली है.

कमज़ोर मॉनसून

आंध्र प्रदेश पॉवर ट्रांसमिशन कॉरपोरेशन (ट्रास्को) के एक वरिष्ठ अधिकारी के रघु का कहना है कि बिजली की मांग और आपूर्ति में लगभग 3000 मेगावॉट का अंतर है.

इसकी वजह बताते हुए रघु कहते हैं , "एक तो बारिश की कमी से बांधों में पानी नहीं है और पनबिजली का उत्पादन बिल्कुल बंद है और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति भी बहुत घट गई है जिससे गैस से बिजली का उत्पादन भी कम हो गया है. कृष्णा-गोदावरी बेसिन में रिलायंस के कुओं से गैस का उत्पादन बहुत कम हो गया है. केवल पनबिजली और गैस आधारित बिजली के क्षेत्र में ही 5000 मेगावॉट बिजली का उत्पादन कम हो गया है." खुशकिस्मती से बारिश के मौसम में गर्मी कम है और इससे घरेलू उपभोक्ताओं को उतनी ज्यादा परेशानी का सामना नहीं करना पड़ रहा है, लेकिन ये संकट उद्योग जगत के लिए बड़ा है.

फेडरेशन ऑफ आंध्र प्रदेश चेम्बर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के महासचिव राजेश्वर राव का कहना है,"बड़े उद्योगों से कहा गया है कि वो महीने में सोलह दिन काम बंद रखें जबकि छोटे उद्योगों को हर महीने दस दिन छुट्टी देनी पड़ रही है. इससे उद्योग जगत दम तोड़ रहा है. राज्य में नया पूँजी निवेश बंद हो गया है. मौजूदा उद्योगों का विस्तार बंद हो गया है. एक वर्ष से भी कम समय में उद्योग जगत को पचास हज़ार करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा है".

उनका कहना है कि यह संकट रातों रात नहीं पैदा हुआ है बल्कि लंबे समय से सरकार की गलत नीतियों और अनेक कारणों से हालात इतने ख़राब हुए हैं.

बिजली कंपनियां

विशेषज्ञों का कहना है कि इस संकट का एक बड़ा कारण सार्वजनिक क्षेत्र की बिजली कंपनियों की खस्ता आर्थिक हालत भी है.

ऊर्जा क्षेत्र के विश्लेषक एम वेणु गोपाल राव का कहना है,"राज्य में बिजली सप्लाई करने वाली चार सरकारी कंपनियों को सरकार से 22000 करोड़ रुपए आने बाक़ी हैं. इन्होंने ये पैसा पिछले कुछ वर्षों में बाहर से बिजली की खरीददारी पर खर्च किया था लेकिन सरकार ने यह उधार नहीं चुकाया है. इस के अलावा कई सरकारी विभागों ने भी इन कंपनियों को बिजली का बिल अदा नहीं किया है और अब उनकी आर्थिक हालत इतनी ख़राब है कि वो बाहर से बिजली खरीद ही नहीं सकतीं." अब मुख्यमंत्री किरण कुमार रेड्डी को उम्मीद हैं कि नेशनल थर्मल पॉवर कॉरपोरेशन से राज्य को जल्द ही 800 मेगावॉट बिजली मिलनी शुरू हो जाएगी जिससे इस संकट को कम किया जा सकेगा. लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि देश के दूसरे हिस्सों से बिजली लाने के लिए ज़रूरी बुनयादी ढांचा भी मौजूद नहीं है. के रघु कहते हैं, "दक्षिण के चारों राज्यों के लिए केवल 1000 मेगावाट का कॉरीडोर मौजूद है जो कि बहुत कम है. उत्तरी राज्यों में अतिरिक्त बिजली मौजूद है लेकिन उसे वहां से लाने के लिए कॉरीडोर नहीं है."

निजी क्षेत्र पर निर्भरता

विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि आंध्र प्रदेश पॉवर जेनरेशन कॉरपोरेशन (जेंको) जैसी सार्वजनिक कंपनियों को अनदेखा कर निजी क्षेत्र पर हद से ज्यादा निर्भरता की नीति भी असफल सिद्ध हुई है.

Image caption बिजली संकट का कारखानों में उत्पादन पर बुरा असर पड़ा है.

के रघु का कहना था,"राज्य में निजी क्षेत्र की कई बिजली परियोजनाओं पर काम ही शुरू नहीं हुआ या उन्हें पूरा नहीं किया गया. 1990 में जो उदारवादी नीति शुरू हुई थी उस के अंतर्गत सरकार ने निजी क्षेत्र को ही प्राथमिकता दी थी लेकिन उससे कोई फ़ायदा नहीं हो सका. इनकी तुलना में सार्वजनिक क्षेत्र में जेंको और एनटीपीसी के पास ज़रूरी क्षमता और काम करने की योग्यता है लेकिन सरकार उन्हें पूँजी ही नहीं दे रही है." जहाँ तक गैस की कमी का सवाल है, उसके लिए आम तौर पर रिलायंस इंडस्ट्री को जिम्मेवार बताया जा रहा है.

खुद मुख्यमंत्री किरण कुमार रेड्डी ने सवाल उठाया है कि बिजली की सचमुच कमी है या जान-बूझकर पैदा की जा रही है.

गैस का उत्पादन

वेणुगोपाल राव का कहना है,"पूर्वानुमान के हिसाब से अब तक रिलायंस के कुओं से गैस का उत्पादन बढ़ कर 80 मिलियन क्यूबिक मीटर प्रतिदिन हो जाना चाहिए था, लेकिन वो 60 मिलियन से घाट कर 27 मिलियन हो गया है और आने वाले समय में उसमें और भी कमी के आसार है. इसका मतलब यह है कि ये संकट और भी बढ़ने वाला है. रिलायंस ने वहां गैस के भण्डार के जो दावे किए थे वो गलत थे और उसने वहां पर्याप्त कुएं भी नहीं खोदे हैं." विशेषज्ञों का कहना है कि अगर केवल गैस से बिजली के उत्पादन की पूरी क्षमता का अच्छी तरह उपयोग होता है तो इस संकट को समाप्त किया जा सकता है. और अगर अच्छी बारिश होती है तो पनबिजली का उत्पादन शुरु हो सकता है और इससे चार हज़ार मेगावॉट बिजली का उत्पादन हो सकता है. कोयले से बिजली का उत्पादन करने वाले संयंत्र में भी क्षमता के अनुरुप उत्पादन नहीं हो रहा है क्योंकि कोयले की आपूर्ति भी अवश्यकता से 30 फीसदी कम है.

विशेषज्ञों का कहना है कि कोयला कंपनियां नीलामी के ज़रिए उसकी कीमत बढ़ा रही हैं और सरकार कोयले के उत्पादन को निजी क्षेत्र के हवाले करने के लिए उसके आयात को भी प्रोत्साहन दे रही है. उद्योग क्षेत्र की सरकार से मांग है कि वो विदेश से गैस का आयात करे ताकि बिजली का उत्पादन बढ़ सके और उद्योगों को पूरी तरह अँधेरे में डूबने से बचाया जा सके.

दूसरी और राज्य सरकार केंद्र की ओर उम्मीद से देख रही है कि वो इस संकट से उबारने के लिए कुछ कदम उठाएगा.

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