'गड्ढे में छिपकर देखा था बेटियों का क़त्ल'

सोन नदी के रास्ते मैं फिर लौट आया बथानी टोला की तरफ़, जहाँ मैंने कई लोगों से बातें कीं. पीड़ित और अभियुक्त - दोनों पक्ष सतर्क और सशंकित दिखे.

उस दिन कभी तेज बारिश, तो कभी बूँदा-बाँदी के चलते वहाँ गाँव की कच्ची सड़कों और गलियों तक फैली किच-पिच से पुरानी यादें ताजा हो उठीं.

बिहार में क्या ख़त्म हो पाई है जनसंहार की दहशत

ठीक सोलह साल पहले, 11 जुलाई को ऐसा ही मौसम था, जब इस बथानी टोला पर दोपहर के समय रणवीर सेना का हमला हुआ था.

अगले दिन जब इस ख़बर के कवरेज के सिलसिले में वहाँ गया था तो बारिश और कीचड़ से लथपथ हो रहे इस टोले में आगजनी से अधजली फूस-मिटटी की झोपड़ियों के इर्द-गिर्द भीड़ की रेल-पेल मची हुई थी.

यहाँ भूमिहीन दलित-पिछड़े, हिन्दू-मुस्लिम परिवारों के 21 लोगों को बेरहमी के साथ गोलियों और धारदार हथियारों से मारा-काटा गया था.

इस मामले में लोअर कोर्ट ने तीन अभियुक्तों को फांसी और 20 अभियुक्तों को आजीवन कारावास की सजा दी थी.

लेकिन पटना हाई कोर्ट ने ठोस साक्ष्य का अभाव बताकर सभी 23 अभियुक्तों को बरी कर दिया है. उधर बिहार सरकार ने हाई कोर्ट के इस निर्णय के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में अपील की है और सुप्रीम कोर्ट ने विचार के लिय अर्जी मंजूर कर ली है.

फैसले पर सवाल

पटना हाई कोर्ट के फैसले से असंतुष्ट भाकपा- माले ने मुहिम छेड़ दी है. बथानी टोला जनसंहार की सोलहवीं बरसी के मौक़े पर आरा शहर में भाकपा-माले की ओर से एक बड़ी रैली आयोजित की गई, जिसे न्याय रैली नाम दिया गया था.

इस जनसंहार में अपने परिवार के तीन सदस्यों को खो चुके नईम अंसारी के शब्दों में रैली के दिन फिर से दर्द उभर आया था, ''ये जो नीतीश बाबू सुप्रीम कोर्ट गये हैं, तो सुन लीजिये कि वो हम लोगों के आंसू पोंछने नहीं गये हैं, हम लोगों को फिर धोखा देने गये हैं. लेकिन हम न्याय लेकर ही रहेंगे. हमारी आँखों के सामने क़त्ल हुआ है, हाई- कोर्ट कैसे कहती है कि इसमें एविडेंस नहीं है? एविडेंस है, लेकिन उसे पढ़ा नहीं गया."

बथानी टोला की एकमात्र सड़क अभी भी टूटी-फूटी है, जबकि कई पीड़ित परिवारों ने मुआवज़े के पैसे से ईंट के मकान बना लिए हैं. पर जो विस्थापित हुए, उन्हें अब तक कोई मुआवजा नहीं मिला है.

घूस दो सुरक्षा लो

एक झोपड़ी में खाट पर बैठे सिरी किसन चौधरी ने बताया कि उनकी पत्नी और दो बेटियों का जब क़त्ल हो रहा था तो एक गड्ढे में छिपकर वो ये खून-खराबा देख रहे थे.

Image caption हालांकि हिंसा से लोगों की जिंदगी में कोई परिवर्तन नहीं आया है

अब हाल ये है कि सीरी किसन को सरकार से मिली चपरासी की नौकरी छोडनी पड़ी है, क्योंकि वहाँ उनको रोज़ धमकी दी जा रही थी.

सिरी किसन बोले,''हमरा बबुआन लोग धमकी दिये कि नौकरी छोड़ के भाग जाओ, नहीं तो मार देंगे. हमने जब अपने ऑफिस के साहेब से शिकायत किया कि यहाँ मेरी जान को ख़तरा है हमें सुरक्षा दीजिये, तो साहेब ने कहा कि 30- 40 हज़ार रुपैया ख़र्च करो तो सब ठीक हो जायेगा. मतलब हमसे घूस माँगा गया, इसलिए नौकरी छोड़कर घर आ गये.''

बथानी टोला के हीरालाल का कहना था,'' बबुआन (भूमिहार) लोग डर-भय पैदा करते रहते है. हाल में कह रहे थे कि माले पार्टी वाला अगर मुखिया जी को मारा रहता तो तुम लोगों का गाँव फिर जल जाता. बताइए, कोई सरकार है यहाँ? जिस तरह लालूजी गाल बजाते थे, उसी तरह नीतीश जी भी हैं.''

हीरालाल ने ये भी बताया कि 11 जुलाई से पहले इस बथानी टोला पर यहाँ के दबंगों ने सात बार छोटा-बड़ा हमला किया था.

बीस साल का छात्र मुकेश तब चार साल का था, जब उसके परिजनों पर हमला हुआ था. वह कहीं छिपकर ज़िंदा बच गया था.

आज उस घटना को याद करके उसे ग़ुस्सा तो आता है लेकिन वह मन मसोस कर रह जाता है. कहने लगा, ''जब-तब सोचने लगते हैं तो बहुत गुस्सा आता है और मन करता है कि जिस तरह हमारे परिवार को काटा, हम भी उसके परिवार को काट पाते. लेकिन मजबूरी है कि हम वैसा नहीं कर पाएंगे."

'बड़की खराँव' नाम का भूमिहार बहुल गाँव बथानी टोला से बिलकुल सटा हुआ है. इसी गाँव के कई लोगों को जनसंहार के इस मामले में अभियुक्त बनाया गया था.

संयोग से दो अभियुक्त उस दिन मुझे इस गाँव में मिल गये. इनमें से एक अजय सिंह को लोअर कोर्ट ने मृत्यदंड दिया था और दूसरे अभियुक्त कन्हैया सिंह को उम्रकैद की सज़ा मिली थी.

लेकिन पटना हाई कोर्ट ने हाल ही एक फ़ैसले में इनके अलावा अन्य सभी अभियुक्तों को सज़ा से मुक्त कर दिया है.

अजय सिंह ख़ुद को बिलकुल निर्दोष बताते हुए कहने लगे,''भाकपा-माले और रणवीर सेना के बीच वर्चस्व की लड़ाई में हम झूठ-मूठ में फंसा दिये गये. हमारा भविष्य चौपट हो गया. हम ग़रीब हैं लेकिन एक ऊंची जाति में जन्म लेने की वजह से प्रताड़ित हो रहे हैं. आपलोगों से बात करने में भी हमें डर लगता है. गरीबों की मौत पर राजनीति करते हैं लोग''.

इसी तरह कन्हैया सिंह ने भी कहा कि भूमिहार होना गुनाह हो गया, '' हमारा दोष सिर्फ इतना है कि हमलोग फॉरवर्ड जाति के हैं. यहाँ सब बाहर के हथियार पार्टी ने आकर क्राइम किया. मजदूरी को लेकर उस समय विवाद चल रहा था, इसलिए उसी बहाने हमारे गाँव वालों को अभियुक्त बना दिया गया. घटना हुआ 11 जुलाई को, एफआईआर 12 जुलाई को भी हुआ और तीन महीने तक बदल-बदल कर एफआइआर दर्ज होता रहा. ऊपर नेता के दबाव और माले वालों की साजिश से चुन-चुनकर हम लोगों को फंसाया गया."

इस गाँव के बहुत से लोगों को मीडिया से भी काफी शिकायत है. उनलोगों का कहना था कि मीडिया भी बंटा हुआ है और झूठ-सांच लिखता रहता है.

( इस श्रृखला की तीसरी कड़ी में ' बेलाउर ' समेत अन्य भूमिहार बहुल इलाक़े का जायज़ा )

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