कुर्बानी के लिए तैयार अन्ना की टीम: किरन

किरन बेदी और अन्ना हज़ारे
Image caption अन्ना के अलावा इस बार अरविंद केज़रीवाल, गोपाल राय और मनीष सिसोदिया भी अनशन कर रहे हैं.

जंतर मंतर कई बार गया हूं लेकिन अन्ना आंदोलन कवर करने दूसरी बार गया.

पहली बार मंच के नीचे था इस बार मंच से आंदोलन को देखने सुनने और जानने का मौका मिला.

मौका था अन्ना टीम की सदस्य किरन बेदी से बीबीसी हिंदी के लिए फेसबुक चैट का.

स्टेज के कोने में जगह मिली और सवालों का सिलसिला शुरु हुआ. किरन की आवाज़ बैठ चुकी थी और उन्हें बोलने में तकलीफ़ हो रही थी.

मंच से नीचे गोपाल राय लेटे हुए थे. हालत कोई बहुत अच्छी नहीं लग रही थी. मंच के आसपास भीड़ थी लेकिन इस भीड़ को बहुत बड़ी भीड़ नहीं कहा जा सकता. छोटी जगह में कम लोग और कई कैमरे हों तो टीवी स्क्रीन पर भीड़ बड़ी भी लग जाती है.

जो आए थे उनमें जोशोखरोश था. नौजवानों की बड़ी संख्या लेकिन रामलीला मैदान जैसा जोश नहीं दिखा.

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सवाल कई थे और किरन के जवाब नपे तुले सुलझे हुए. शायद दो दिन पहले मीडिया से अनबन कारण रहा हो.

स्नेहर अंजुम के एक सवाल के जवाब में किरन ने कहा कि भीड़ कितनी है इस पर मत जाइए. गिनती मायने नहीं रखती..मुद्दे का समर्थन कीजिए.

और मीडिया पर पूछा सवाल पंकज राणा ने तो किरन ने कहा- मीडिया पर दबाव की बात मीडिया के लोगों ने ही कही थी. यूट्यूब पर ऐसे कुछ वीडियो भी हैं जिनमें पत्रकार ही कह रहे हैं कि दबाव होता है. मीडिया अपना काम कर रही है हम अपना काम करेंगे.

एक सवाल यह भी था कि विकास कुमार का कि क्या कुमार विश्वास के सस्ते चुटकुले उचित हैं. यह सवाल कुछ और लोगों ने पूछा तो किरन बेदी ने कहा कि कुमार ने ऐसा कुछ नहीं कहा लेकिन बाद में उन्होंने कहा कि अगर कुमार की बात बुरी लग रही है तो वो शब्दों के लिए क्षमा चाहती हैं. मुद्दे पर रहना चाहिए.

किरन का कहना था कि सरकार ने अभी तक कोई बातचीत नहीं की है लेकिन वो भी पीछे नहीं हटेंगी और आंदोलन जारी रहेगा.

उनका कहना था, ‘‘ सरकार ने हमसे कोई बात नहीं की है. हमारी रणनीति कुछ नहीं है. हम कुर्बानी देने के लिए तैयार हैं. कुर्बानी देना ही हमारी रणनीति है.’’

एक सवाल दलितों पर भी राम पाल ने पूछा जिस पर किरन ने कहा कि हम जाति में यकीन नहीं रखते और हमें ये भी नहीं पता कि टीम में कौन व्यक्ति किस जाति का है. हम मुद्दे पर ध्यान दे रहे हैं.

चैट के दौरान लगातार भाषण चलते रहे और गाने भी. करीब 45 मिनट के चैट के बाद शोर इतना था कि चैट को जारी रखना मुश्किल होता जा रहा था. चैट खत्म हुई और हम मंच से नीचे उतर आए थे.

बाहर निकले तो फुटपाथ पर की दुकानें लग गई थीं. कोई झंडा तो कोई बैनर तो कोई टोपी बेच रहा था मैं अन्ना हूं. पांच रुपए...दस रुपए जो मिल जाए. दो रुपए में चेहरे पर तिरंगा बना लीजिए.

कैमरा निकालो तो फुटपाथ का भिखारी भी मैं अन्ना हूं की टोपी लगा लेता है.

अच्छा है. जंतर मंतर पर ऐसी रौनक कम ही होती है. आंदोलन तो वहां चलते ही रहते हैं. कम से कम इस आंदोलन ने फुटपाथ के गरीबों को कुछ दिनों के लिए रोज़गार ज़रुर दे दिया है.

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