राजस्थान: 40 हज़ार में माँ-बाप ने बच्चा बेचा

 शुक्रवार, 10 अगस्त, 2012 को 12:06 IST तक के समाचार
माँ-बाप

नवजात बच्चा माँ-बाप को लौटा दिया गया है

जिगर के एक टुकड़े के लिए एक माँ ने अपने आँचल के दूसरे जिगर को 40 हज़ार रुपए में बेच दिया.

राजस्थान में पुलिस ने एक महिला- संध्या और उसके पति अशोक सहित पाँच लोगों को आठ दिन का नवजात बच्चा बेच देने के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया है.

गिरफ़्तार किए गए लोगों में संध्या के आठ दिन के नवजात बच्चे को खरीदने वाले दम्पती विनोद और उनकी पत्नी शकुन्तला भी शामिल हैं. संध्या एक ऐसी अभागी माँ है जिसने अपने नवजात बेटे को सिर्फ इसलिए बेच दिया क्योंकि उनके पास अपने साढ़े तीन साल के बेटे रौनक के इलाज के लिए पैसे नहीं थे.

नवजात का मोल लगा तो बात चालीस हजार रुपए में पक्की हुई.

ये घटना राज्य के सरहदी जिले श्रीगंगानगर में तब सामने आई जब संध्या और उसके पति अशोक ने पुलिस में शिकायत की कि उन्हें वादे के मुताबिक पैसे नहीं मिले.

पुलिस के मुताबिक ये पूरा सौदा चालीस हजार में हुआ क्योंकि संध्या का दूसरा बेटा जन्म से ही बीमार है और उसके इलाज के लिए चालीस हजार रुपए का खर्च बताया गया था.

गोदनामे के बहाने

सरकारी इलाज

"मुफ्त दवा कार्यक्रम का हम स्वागत करते हैं मगर अब भी इलाज बहुत महंगा है. हम चाहते है सरकार एक विहंगम स्वास्थ्य कार्यक्रम शुरू करे क्योंकि विकलांग और अपाहिज बच्चों के लिए कुछ भी नहीं है"

कविता श्रीवास्तव, सामाजिक कार्यकर्ता

श्रीगंगानगर में पुलिस की मानव तस्करी विरोधी शाखा के प्रमुख श्रवण दास ने बताया कि पुलिस ने सौदे की पहली किश्त में भुगतान हुए बीस हजार रुपए में से चौदह हजार संध्या के परिवार से बरामद कर लिए जबकि छह हजार रुपए संध्या के प्रसव में इलाज पर खर्च हो गए.

पुलिस ने इस मामले में एक सब रजिस्ट्रार सहित 11 लोगों का नाम प्राथमिकी में दर्ज किया है क्योंकि ये सारी कार्यवाही गोदनामे के बहाने हुई और बाकायदा उसका पंजीयन भी हुआ.

श्रवण दास के अनुसार, "इसमें गवाह, वकील और इस दस्तावेज का पंजीयन करने वाले सरकारी अधिकारी से पूछताछ हो रही है. अगर आरोप साबित हुआ तो और भी गिरफ्तारियाँ की जा सकती हैं."

आँचल की छाँव

ये सब तब हुआ जब संध्या ने गत 31 जुलाई को एक बच्चे को श्रीगंगानगर शहर में जन्म दिया और तीन अगस्त को करार के मुताबिक, संध्या ने अपने आँखों के तारे को दूसरे दम्पती को दे दिया. फिर पुलिस हरकत में आई तो ये नन्हीं जान फिर से अपनी माँ के आँचल की छाँव में आ गई.

राजस्थान में सरकार ने बीते साल ही अपने चौदह हजार स्वाथ्य केंद्रों और अस्पतालों पर सभी के लिए मुफ्त दवा का उपलब्ध करने का काम शुरू किया है.

फिर आखिर कोई माँ सिर्फ दवा-इलाज के लिए अपने बेटे को क्यों बेच रही है? सामाजिक कार्यकर्ता कविता श्रीवास्तव कहती हैं, "मुफ्त दवा कार्यक्रम का हम स्वागत करते हैं मगर अब भी इलाज बहुत महंगा है. हम चाहते है सरकार एक विहंगम स्वास्थ्य कार्यक्रम शुरू करे क्योंकि विकलांग और अपाहिज बच्चों के लिए कुछ भी नहीं है."

वो नवजात इस दुनिया के लिए बहुत नया है और उसने माँ का आँचल बस छुआ ही है. मगर अभी उसके नन्हें पाँव जमीन पर दर्ज भी नहीं हुए हैं कि लगता है उसे आते ही ग़रीबी, माँ की लाचारी और बेदर्द दुनिया के दस्तूर से रूबरू करा दिया गया हो.

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