मोबाइल देकर सरकार गलत नंबर तो नहीं डायल कर रही?

मोबाइल
Image caption इंदू कहती हैं कि मोबाइल तो कहीं से भी सस्ता मिल जाता है

केंद्र सरकार गरीबों को मुफ्त मोबाइल देने की तैयारी कर रही है. यही नहीं महीने में 200 रुपये के मुफ्त टॉक टाइम का तोहफा भी दिया जाएगा.

इस स्कीम से लगभग 70 अरब रुपए का खर्च आएगा और ऐसा माना जा रहा है कि यह शुरु में 60 लाख बीपीएल परिवारों के लिए होगा जिनकी महीने की आय 5,500 रुपए से कम है.

लेकिन क्या गरीब भी मोबाइल फोन चाहते हैं? और क्या फायदा होगा उन्हें मोबाइल फोन का? यह जानने के लिए बीबीसी ने दौरा किया एक झुग्गी बस्ती का.

दिल्ली शहर के बीचो बीच स्थित हैं अन्ना नगर नाम की झुग्गी बस्ती. जैसे ही लोगों से इस स्कीम का ज़िक्र छेड़ा तो पता लगा कि लोगों को पहले से इसकी जानकारी थी.

यह भी पता चला कि पूरी बस्ती में ऐसा कोई परिवार ही नहीं है जिसके पास मोबाइल फोन न हो.

32 वर्षीय महिला इंदु ने कहा, ''मोबाइल का क्या है. दो-तीन सौ मे पुराना फोन कहीं से मिल जाता है और दस रुपए के रीचार्ज से कई दिन चल जाता है...सरकार को चाहिए कि मोबाइल देने की बजाय महंगाई पर काबू पाए ताकि रसोई की चीजों पर खर्च कम हो.''

अपना बीपीएल कार्ड दिखाते हुए इंदु ने कहा कि यह बात अलग है कि सरकार अगर मुफ्त में कुछ देगी तो सभी ले ही लेंगे.

उसने कहा कि मोबाइल पर वो अपने मजदूरी करने वाले पति से संपर्क साध पाती है और साथ ही बिहार में रहने वाले अपने रिश्तेदारों से भी.

पास बैठी एक और महिला मिथिलेश के सात बच्चे हैं--छह लड़कियां और एक बेटा.

कहती हैं, ''घर में बहुत तंगी रहती है, पति को कभी काम मिलता है और कभी नहीं. लेकिन हमारे पास तो पहले ही मोबाइल है. क्या सरकार कुछ और नहीं दे सकती?''

दरअसल पूरी बस्ती में ही ऐसा ही माहौल दिखा. लोग यह मानते हैं कि मोबाइल फोन जरूरी और फायदेमंद तो है लेकिन चूंकि इसे हासिल करने या इस्तेमाल करने में 'ज्यादा पैसे नहीं लगते' इसलिए सरकार से नहीं लेना चाहते.

लोकलुभावन योजना

Image caption मिथिलेश पूछती हैं कि क्या सरकार कुछ बेहतर चीज़ नहीं दे सकती

वैसे सरकार के इस कदम को साल 2014 के आम चुनाव से पहले एक लोकलुभावन योजना के तौर पर देखा जा रहा है.

बीते सालों में चुनावों में 'फ्रीबीज़' या मुफ्त चीजों के प्रलोभन दे कर मत हासिल करना काफी आम बात होता जा रहा है.

तमिल नाडु शायद इन राज्यों की सूची में सबसे उपर है. जयललिता सरकार ने पिछले साल चुनावों से पहले वादा किया था कि लोगों को पंखे, मिक्सी और ग्राइंडर जबकि छात्रों को लैपटॉप दिए जाएंगे. इसके अलावा किसानों को मुफ्त भेड़ और गाय देने का वादा था. आजकल इन सब वादों को पूरा किया जा रहा है.

चेन्नई में बीबीसी संवाददाता टीएन गोपालन ने कहा कि इन सारी चीजों का कुछ असर हुआ होगा लेकिन यह कहना गलत होगा कि जयललिता इन्हीं की वजह से सत्ता में आईं.

साल 2006 में भी चौंकाने वाले वादे किए गए थे. जैसे कि दो रुपए किलो चावल, उन सभी को मुफ्त रंगीन टीवी जिनके पास नहीं है, मुफ्त गैस के चूल्हे और गैस कनेक्शन. हैरत की बात यह है कि इन वादों को पूरा किया गया था.

पंजाब से लेकर तमिल नाडु तक

पिछले साल पंजाब में भी अकाली दल ने मुफ्त छात्रों को लैपटॉप और दसवीं से आगे पढ़ने वाली छात्राओं को साइकिल देने का वादा किया गया था. इन्हें पूरा करने के लिए इस साल के बजट में पैसा रखा गया है. किसानों को मुफ्त बिजली तो पहले ही कई सालों से जारी है.

आंध्र प्रदेश में भी किसानों को मुफ्त बिजली दी जाती है. इसके अलावा गरीब लोगों को मुफ्त शिक्षा भी दी जाती है.

राजस्थान में पिछले साल के बजट में सभी लड़कियों को स्कूटी देने के लिए पैसा रखा गया था.

बिहार सरकार ने राज्य के महादलित परिवारों को मुफ़्त में रेडियो-सेट बांटने का सिलसिला एक साल पहले शुरू किया था. लेकिन अब इस योजना को और आगे बढाने में नीतीश सरकार की दिलचस्पी काफ़ी घट गई है. कारण है कि कई महादलित परिवारों ने अपने लिए रेडियो-सेट को अनुपयोगी मानते हुए उन्हें बेच दिया.

उत्तर प्रदेश में मार्च के महीने में अखिलेश यादव की सरकार ने चुनावी वादे पूरी करते हुए छात्रों को लैपटॉप और बेरोज़गारी भत्ता देने का फैसला किया.

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