मुंबई में पुलिस सतर्क, राजनीति गर्म

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Image caption मुंबई में शनिवार को मुसलमानों ने असम और बर्मा की घटनाओं का विरोध किया.

असम के कोकराझाड़ जिले में पिछले दिनों फैले दंगों का साया मुंबई और दूसरे शहरों तक फैल रहा है. विपक्ष ने महाराष्ट्र सरकार को बर्खास्त किए जाने की माँग की है.

शनिवार को मुंबई में मुसलमानों का एक विरोध प्रदर्शन हिंसक हो गया और इसमें दो लोग मारे गए. पचास से ज़्यादा पुलिस वाले जख्मी हो गए.

उधर झारखंड की राजधानी रांची से भी बलवे की खबर है लेकिन फिलहाल वहाँ शांति है.

मुंबई में पुलिस ने 23 लोगों को गिरफ्तार किया है और दक्षिण मुंबई में पुलिस की गश्त बढ़ा दी गई है. मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच इस पूरे मामले की छान बीन कर रही है.

शनिवार को कुछ मुस्लिम संगठनो के नेतृत्व में हज़ारों मुसलमान असम और बर्मा में 'मुस्लिम विरोधी' दंगों के खिलाफ प्रदर्शन करने दक्षिण मुंबई के आज़ाद मैदान में जमा हुए थे.

लेकिन भीड़ में से कुछ लोग हिंसा पर उतारू हो गए. उन्होंने पुलिस और मीडिया वालों पर हमला कर दिया. पुलिस की दो राइफलें और दर्जनों कारतूस छीन लिए और वहां मौजूद कई वाहनों को आग लगा दी.

आलोचना

पुलिस ने गोलियाँ चलाईं जिससे एक व्यक्ति मारा गया जबकि दूसरा व्यक्ति भगदड़ में कुचल कर मर गया.

विपक्षी दल शिव सेना ने महाराष्ट्र सरकार को बर्खास्त करने की मांग की.

विपक्ष की पार्टियों ने कहा कि पुलिस के पास हिंसा की खुफिया जानकारी थी और इसलिए हिंसा वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की काहिली के कारण हुई.

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Image caption असम के कोकराझाड़ जिले में भड़के दंगों के बाद लाखों लोग शरणार्थी शिविरों में रह रहे हैं.

भारतीय जनता पार्टी ने कहा इस पूरे मामले की जांच जल्द से जल्द होनी चाहिए. पार्टी के कई वरिष्ठ नेता घायल हुए पुलिस वालों से मिलने अस्पताल गए और हिंसा की निंदा की.

क्राइम ब्रांच अपनी जांच में इस बात की जानकारी हासिल करने की कोशिश कर रही है की क्या हिंसा की योजना पहले से थी या फिर भड़काने वाले भाषण के कारण यह हुआ. जांच में इस बात का भी पता लगाया जा रहा है की पुलिस को पहले से हिंसा भड़काने की ठोस जानकारी थी या नहीं.

शिवसेना ने अपनी पत्रिका 'सामना' में लिखा है कि ये दंगा देशद्रोहियों ने किया. पत्रिका में मुंबई के मुसलमानों से सवाल किए गए हैं की बर्मा के मुसलमानों और असम में अवैध 'बांग्लादेशी' नागरिकों से हमदर्दी क्यों? सामना ने कहा इसी कारण भारत के मुसलमान बदनाम हैं.

मुख्यमंत्री पृथ्वी राज चौहान ने कहा यह एक बड़ी साजिश का नतीजा हो सकता है . उन्होंने यह भी कहा की इस में विदेशी तत्वों का हाथ होने से इनकार नहीं किया जा सकता.

शरणार्थियों की जाँच

इस बीच असम सरकार के एक मंत्री ने कहा है कि पिछले महीने हुए दंगों में विस्थापित हुए लोगों की जाँच के बाद ही उन्हें उनके गाँवों में वापस भेजा जाएगा.

सरकार में मंत्री प्रद्युत बारदोलोई ने बीबीसी से एक बातचीत में कहा, “इस बात की जाँच की जाएगी कि ये लोग उस इलाके के रहने वाले हैं या नहीं.”

असम के बोडो संगठन भी माँग कर रहे हैं कि विस्थापितों की जाँच के बाद ही उन्हें उनके गाँवों में जाने की इजाजत दी जाए.

उनका कहना है कि सिर्फ ऐसे ही लोगों को अपने गाँवों में लौटने दिया जाए जिनके पास राष्ट्रीयता साबित करने के लिए जमीन के पट्टे जैसे दस्तावेज मौजूद हैं.

बोडो क्षेत्रीय परिषद के उप-प्रमुख काम्पा बोरगुहारी ने बीबीसी हिंदी सेवा से एक बातचीत में कहा है कि सिर्फ ऐसे लोगों को ही वापस उनके गाँवों में भेजा जाना चाहिए जिनके पास जमीन का पट्टा है.

गैरकानूनी बाशिंदे?

उन्होंने कहा कि मुसलमान संगठन दावा कर रहे हैं कि शरणार्थी कैम्पों में चार लाख पचास हज़ार मुसलमान हैं. लेकिन 2011 की जनगणना के मुताबिक असम में मुसलमानों की जनसंख्या दो लाख छत्तीस हज़ार है. तो फिर बाकी लोग कहाँ से आए?

बोरगुहारी कहते हैं, “जो लोग धीरे-धीरे बांग्लादेश से आकर सरकारी जमीन और जंगलात की जमीन पर काबिज हो गए हैं उनके बारे में बोडो क्षेत्रीय परिषद ने सरकार से कहा है कि उन्हें गाँवों में वापस नहीं भेजा जा सकता.”

“वो लोग असम को ब्रीडिंग ग्राउंड के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं. कई औरतों से विवाह करके वो 25 या 30 बच्चे पैदा करते हैं और उन्हें मेनलैंड इंडिया में भेजते हैं. लोग इसे क्यों नहीं समझते? आखिर क्यों ये कहा जा रहा है कि दिल्ली शहर में 36 लाख बांग्लादेशी रहते हैं?”

लेकिन मुसलमानों के संगठनों ने इस माँग का कड़ा विरोध किया है.

ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमॉक्रेटिक फ्रंट के हफीज राशिद चौधरी ने बीबीसी से कहा, "ये तो ठीक वैसा ही हुआ कि आपने मुझे घर से बाहर निकाल दिया और जब मैं घर जाना चाह रहा हूँ तो आप मुझसे शिनाख्त माँग रहे हैं."

राज्य में एक और मंत्री हिमंतो बिस्वास शर्मा ने बीबीसी को बताया कि इस समय विभिन्न शरणार्थी शिविरों में लगभग साढ़े तीन लाख शरणार्थी वहाँ मौजूद हैं.

उन्होंने कहा है कि इन कैम्पों में इलाज की कमी के कारण कोई मौत नहीं हुई है. सिर्फ एक घटना ऐसी हुई है जिसमें हम समय पर मेडिकल सहायता नहीं पहुँचा पाए. क्योंकि उस वक्त झगड़ा चल रहा था और कर्फ्यू लगा हुआ था.

उन्होंने कहा कि बाकी मौतें प्राकृतिक कारणों से हुईं. उनमें ऐसे लोग थे जो पहले से बीमार थे और उन्हें चिकित्सा सुविधा दी गई थी.

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