बीजेपी की नैया के पतवार बाबा रामदेव?

 मंगलवार, 14 अगस्त, 2012 को 17:20 IST तक के समाचार

चटख भगवा रंग की धोती लपेटे और उघाड़े बदन रहने वाले बाबा रामदेव भीड़ में अलग चमकते हैं.

दिल्ली पुलिस ने सोमवार को उन्हें रामलीला मैदान से गिरफ्तार करके डीटीसी की बस में बैठा लिया था और उनके हज़ारों समर्थक मधुमक्खियों की तरह उनके चारों ओर जुट आए थे.

योग में तपे हुए बाबा ने अपने धड़ का लगभग दो तिहाई हिस्सा, लगभग असंभव तरीके से, डीटीसी बस की सँकरी खिड़की से बाहर निकाल लिया था और हवा में हाथ लहराकर अपने समर्थकों का हौसला बढ़ाया.

समर्थकों से घिरे बाबा इस दृश्य के केंद्र में थे और फोटोग्राफरों के लिए ये एक अदभुत क्षण था.

कुछ ही देर पहले रामलीला मैदान के मंच पर जनता दल (युनाइटेड) के शरद यादव बमुश्किल अपने घुटने मोड़कर बाबा के बगल में बैठ पाए.

साथ में पैंट कमीज पहने दोहरे बदन वाले भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी उनके साथ थे.

सवाल दर सवाल

बाबा रामदेव ने इस बार खुल कर काँग्रेस सरकार पर हमला बोला.

मंच पर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के नेताओं का भगवा वस्त्रधारी बाबा रामदेव के साथ आना क्या कोई संयोग था?

या क्या शरद यादव और नितिन गडकरी वाकई भ्रष्टाचार से इतने आजिज आ गए हैं कि उन्होंने इस ‘मुद्दे’ पर निर्णायक लड़ाई लड़ने का फैसला कर लिया है और अब सड़कों पर उतरने को तैयार हैं?

क्या अण्णा हजारे की टीम के किरचे किरचे होकर बिखर जाने से अब इन राजनेताओं के पास अब बाबा रामदेव के पास जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा?

या फिर एनडीए को एक नाव की ज़रूरत है जो उसे 2014 के चुनावी भवसागर को पार करवा दे?

इन सवालों की लिस्ट और लंबी हो सकती है पर पहले रील थोड़ा पीछे घुमाएँ:

शरद यादव शायद उन चंद नेताओं में हैं जो खुली बात कहने से घबराते नहीं. कल उन्होंने रामलीला मैदान के मंच से इसी तेवर में काले धन के खिलाफ गरजदार भाषण दिया.

फिल्म को कुछ पीछे घुमाए तो आप पाएँगे कि यही वो शरद यादव थे जिनका नाम जैन हवाला कांड में आया था.

1995 में जैन हवाला कांड ने भारतीय सत्तातंत्र की चूलें हिला दी थीं क्योंकि उसमें लालकृष्ण आडवाणी और नारायणदत्त तिवारी से लेकर लगभग हर पार्टी के महत्वपूर्ण नेताओं के नाम थे.

इन नेताओं पर आरोप थे कि उन्होंने ऐसे हवाला कारोबारियों से पैसे लिए थे जो कश्मीरी चरमपंथियों की फंडिंग भी करते थे.

शरद यादव वो पहले नेता थे जिन्होंने टेलीविजन के कैमरे के सामने स्वीकार किया था कि “कोई आया था और मुझे तीन लाख रुपए दे गया”.

जाँच एजेंसियाँ इस केस को साबित नहीं कर पाईं और सभी अफसर और राजनेता बरी कर दिए गए. पर शरद यादव की साफगोई इतिहास में दर्ज हो गई.

उसी साफगोई से शरद यादव कल बाबा रामदेव के मंच से काले धन के खिलाफ गरज रहे थे.

'उम्मीद' का रास्ता

जनता दल (युनाइटेड) के नेता शरद यादव भी बाबा रामदेव के बगलगीर थे.

पर आखिर अचानक भारतीय जनता पार्टी, जनता दल (युनाइटेड), शिवसेना और अकाली दल का रामदेव प्रेम क्यों उमड़ आया? इन पार्टियों से पहले पुरानी एनडीए के तेलुगू देसम और बीजू जनता दल के नेता भी बाबा से मिल आए थे.

सवाल है कि नए एनडीए की पार्टियों को ये उम्मीद क्यों बँध रही है कि भ्रष्टाचार से तंग आए बाबा समर्थक जब 2014 में वोट मशीन का बटन दबाने जाएँगे को वोट उनके पक्ष में डालेंगे?

राजनीतिक विश्लेषक ऐन इसी वक्त डेढ़ साल बाद की तस्वीर बनाकर खतरा मोल नहीं लेना चाहते. वोट देने से पहले भारतीय मतदाता कब भावनाओं में बहता है और कब भावनाओं को दरकिनार करके फैसला करता है, ये कहना मुश्किल है.

दैनिक जागरण अखबार के संपादक प्रशांत मिश्र कहते हैं कि आज के हालात में भारतीय जनता पार्टी और उसकी सहयोगी पार्टियों के लिए बहुत उम्मीद नहीं दिखती.

प्रशांत कहते हैं, “भारतीय जनता पार्टी की भीतरी लड़ाई गहरी है जिससे ध्यान हटाने के लिए एकजुट दिखाई देना ज़रूरी है.”

भारतीय जनता पार्टी और उसकी विचारधारा के प्रतीक बन गए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी दिल्ली के तख्त तक पहुँचने को लालायित हैं. लेकिन उनकी राह में उन्ही की पार्टी के दिग्गज लालकृष्ण आडवाणी एक रोड़ा बन गए हैं.

गुजरात में बुजुर्ग नेता केशुभाई पटेल ने बीजेपी से किनारा कर लिया है और नई पार्टी बना ली है.

आडवाणी ने अपने ब्लॉग में गैर-काँग्रेसी और गैर-भाजपाई प्रधानमंत्री की संभावना जाहिर करके अपनी असुरक्षा को ही जाहिर किया है.

एनडीए का हिस्सा रही तेलुगू देसम पार्टी की स्थिति आँध्र प्रदेश में कोई बहुत अच्छी नहीं है.

प्रशांत मिश्र कहते हैं कि इन स्थितियों में बाबा रामदेव के नेटवर्क के साथ रहना भारतीय जनता पार्टी और उनके सहयोगी घटक दलों के लिए एक मॉरल बूस्टर की तरह काम कर सकता है.

वो कहते हैं कि जिस तरह सोनिया गाँधी और मनमोहन सिंह के नेतृत्व में काँग्रेस और यूपीए का ग्राफ नीचे जा रहा है, उसे देखते हुए बाबा रामदेव और उनके समर्थकों का साथ बीजेपी और यूपीए को अच्छी ‘फाइट’ की स्थिति में ला सकता है. मगर इससे उनकी नैया पार लगेगी ये कहना मुश्किल है.

ऐसे में एनडीए की पार्टियाँ भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को नाव और बाबा रामदेव को पतवार की तरह इस्तेमाल करने का सपना देखें तो देखे, पर सपने आखिरकार टूटते ही हैं.

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