सोशल मीडिया पर भड़काऊ तस्वीरें

 मंगलवार, 21 अगस्त, 2012 को 13:44 IST तक के समाचार

असम में दंगे, रोहिंग्या मुस्लिम और बंगलौर से पूर्वोत्तर के लोगों का वापस लौटना-इन सभी में कहीं न कहीं सोशल मीडिया की झलक ज़रुर दिखती है.

अगर आप फेसबुक पर हैं तो आपने ज़रुर ऐसी तस्वीरें देखी होंगी जो भड़काऊ हैं या अत्यंत खराब कटाक्ष किया गया होता है. अचानक देखने पर लगता है कि ये तस्वीरें बिल्कुल सच्ची हैं सही हैं और आप इन तस्वीरों को शेयर करते हैं.

लेकिन कई बार ये देखने में आया है कि ये तस्वीरें कंप्यूटर के ज़रिए बदल दी गई होती हैं और सच्चाई से बहुत अलग भी होती हैं.

इन तस्वीरों से भावनाओं को भड़काने काम बकायदा होता है और संभवत ऐसा ही कुछ मुंबई में पूर्वोत्तर के लोगों के समर्थन में हो रहे प्रदर्शन के दौरान हुआ जहां फेसबुक पर कई ऐसी तस्वीरें शेयर की गईं.

लेकिन अगर इन तस्वीरों को ध्यान से देखा जाए और सोचा जाए तो आप शायद ही कभी इन तस्वीरों को शेयर करेंगे.

हम कुछ तस्वीरें भी आपके लिए लाए हैं जो आपत्तिजनक हैं और कोशिश कर रहे हैं आपको बताने की कि ये क्यों आपत्तिजनक है.

ये तस्वीर किसी अख़बार की कॉपी जैसा लगता है लेकिन ये अख़बार की कॉपी नहीं है. चूंकि ये अख़बार जैसा बना दिया गया है इसलिए इसकी विश्वसनीयता बढ़ जाती है. इस तरह की तस्वीरें आपत्तिजनक तो नहीं हैं लेकिन ये भ्रामक ज़रुर हैं.

ये तस्वीर जहां लगता है कि एक बड़ा व्यक्ति एक बच्ची के पैर पर चढ़ा हुआ है. ख़तरनाक लगता है और इसे देखते ही गुस्सा आता है लेकिन ये तस्वीर भी फोटोशॉप के ज़रिए बदली जा सकती है. हो सकता है कि बच्ची को दर्द हो और पैरों से इलाज़ हो रहा हो या हो सकता है रोती हुई बच्ची की फोटो अलग हो और पैरों को अलग से फोटोशॉप के ज़रिए लाया गया हो और दोनों तस्वीरें मिलाई गई हों.

अगर असम मामले की बात करें तो कुछ तस्वीरें जो सबसे अधिक शेयर हुईं उसमें ये तस्वीर भी थी..अगर आप देखेंगे तो पाएंगे कि इसमें भारत के तिरंगे को जलाया जा रहा है.

अगर आप इस तस्वीर में अलग अलग सात तस्वीरों को देखेंगे तो पाएंगे कि ये एक ही तिरंगे की अलग अलग एंगल से ली गई तस्वीर है और फिर इसे एक साथ कर दिया गया है. प्रभाव अधिक पैदा करने के लिए.

निश्चित रुप से किसी भी देश के राष्ट्र ध्वज का अपमान गलत है और अगर ये तस्वीर न आती सोशल मीडिया पर तो संभवत बात खत्म हो गई होती. लेकिन अब चूंकि इस तरह से मीडिया पर आई है तो लोगों की भावनाएं भडकाने में अधिक आसानी हो सकती है.

सोशल मीडिया कई बार खतरनाक हो सकता है और कई बार बेहतरीन भी.ऐसे मौकों पर जब सामाजिक तनाव का माहौल हो सोशल मीडिया दोधारी तलवार हो सकता है.

लंदन में पिछले साल दंगों के दौरान सोशल मीडिया, एसएमस आदि के ज़रिए ही हमलों की योजना बनाने की बात सामने आई थी वहीं उत्तर पूर्व के मामले में बडे पुलिस अधिकारियों ने अपने नंबर भी दिए ताकि लोग सीधे पुलिस से संपर्क कर सकें.

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