हाथियों के इलाज के 200 साल पुराने नुस्खे सहेजते मालिक

 गुरुवार, 23 अगस्त, 2012 को 09:29 IST तक के समाचार
हाथी

हाथी मालिको के पास फारसी,उर्दू और नागरी में लिखी सदियों पुरानी किताबे है.

राजस्थान के आमेर में महावत और हाथी मालिको ने हाथियों के इलाज के लिए लगभग 200 साल पुराने पुरखों के नुस्खों को सहेजने का काम हाथ में लिया है.

हाथी मालिको के पास फ़ारसी, उर्दू और देवनागरी में लिखी सदियों पुरानी किताबे हैं. इनमे भीमकाय हाथी के इलाज के नुस्खे दर्ज हैं.

हाथी मालिको ने उपेक्षित और हाशिए में पड़ी इस सामग्री से धूल झाडी और उनके संग्रह का काम शुरु कर दिया है. वे इसका सरल भाषा में अनुवाद करा रहे हैं. आमेर में अभी कोई 100 से ज्यादा हाथी हैं.

इंसान और हाथी साथ-साथ रहे हैं. इंसान अपना सुख-दुख ज़बान से बयांन करता है, हाथी के पास जिस्म तो बहुत बड़ा है, लेकिन वैसी ज़बान नहीं है.

इसीलिए हाथी मालिक और महावत अपने पुरखो के हाथों सैंकड़ो साल पहले लिखी पोथी-पुस्तको में हाथियों के बीमार और असहज होने का वर्णन बहुत अधीर होकर सुनते हैं.

इस सामग्री के अनुवाद में लगे आमेर के सुरेश शर्मा, महावत और हाथी मालिको को बारीकी से बताते हैं कि इन किताबो में बीमारी का लक्षण, उपचार और हाथी के मनोभावों का कैसा उपयोगी बयान किया गया है.

वे कहते हैं, ''इनमे नुस्खो का उपयोग करने के बारे में बताया गया है. साथ ही सावचेती भी गिनाई गई है. हम पढ़ कर लक्ष्ण ब्यान करते है. पर ये महावत या हाथी मालिक ही बताएगा कि क्या ये लक्ष्ण उनके हाथी पर लागु होते है. इसके बाद आयुर्वेद के बताए देशी जड़ी बूटियों से इलाज की दिशा तय होती है.''

आमेर के शाहिद खान को हाथी और उनका रख रखाव विरासत में मिला है. वो सात हाथियो के मालिक है. शाहिद ने सुरेश शर्मा को इन पुस्तको के अनुवाद का काम सौंपा है.शाहिद के घर ऐसी कोई दस पुस्तके है.

फीलखाना

सुरेश शर्मा

"इनमे नुस्खो का उपयोग करने के बारे में बताया गया है.साथ ही सावचेती भी गिनाई गई है. हम पढ़ कर लक्ष्ण ब्यान करते है. पर ये महावत या हाथी मालिक ही बताएगा कि क्या ये लक्ष्ण उनके हाथी पर लागु होते है. इसके बाद आयुर्वेद के बताए देशी जड़ी बूटियों से इलाज की दिशा तय होती है."

सुरेश शर्मा अब तक सैंकड़ो पन्नों का अनुवाद कर चुके हैं. पर वे कहते हैं अभी कई हजार पृष्ठों का अनुवाद और करना है. महावत इन पुस्तको को फीलखाना कहते हैं, क्योंकि फारसी में हाथी को 'फील' कहते हैं.

जयपुर रियासत में हथियो़ के लिए अलग से महकमा था जिसे फीलखाना कहा जाता था.

इन किताबों में महज चिकित्सा ही नहीं, हाथी की शरीर रचना, उसकी सजावट में काम आने वाले गहने और नियंत्रित करने वाले उपकरणों का विस्तार से जिक्र है.

सुरेश शर्मा कहते हैं, ''इनमें हाथी के उदगम की कहानी है. इसके मुताबिक पहला हाथी कत्तईनुस सफ़ेद रंग का था और वो दरिया ये नील के किनारे पैदा हुआ था. साथ ही पहले हकीम जालिषानोशे से लेकर लुकमान तक का उल्लेख है.''

उस दौर के हाथी मालिको और महावतो ने अपने पारम्परिक ज्ञान को कागज़ पर उतारा,रेखाओ और रंगीन तस्वीरों जरिए इलाज के तरीके भी बताए.

शाहिद खान कहते हैं, ''अगर इसे नहीं सहेजा गया तो इस ज्ञान से आने वाली पीढ़िया वंचित रह जायेगी. ये महावतो के बड़ी काम की है. इसमें बताया गया है कि हाथी मस्त हो तो कैसे उसे काबू में रखे क्योंकि हाथी जब मस्त होता है तो ऐसे विचलित होता है गोया उसे हजार बिछुओ ने काट लिया हो.''

कई पुस्तकें

आमेर में हाथी मालिकों के संघ के अध्यक्ष अब्दुल रशीद कहते है, ''कम से कम ऐसे दस महावत परिवार है जिनके पास ऐसा ज्ञान पुस्तको और बिखरे कागजों में संचित है.''

वे कहते हैं, ''हमारी इच्छा है पहले सरल जबान में इसका तर्जुमा हो. ये ज्ञान अन्य लोगों और इलाकों तक पहुंचे, हाथी को लाभ होगा तो वो भी दुआ देगा. हम इसे सहेजने का प्रयास कर रहे हैं. पर हमारी एक सीमा है.सरकार को कुछ करना चाहिए.''

जयपुर जन्तुआलय के चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर अरविन्द माथुर आमेर का हाथियो का उपचार करते रहे है. डॉक्टर माथुर कहते हैं, ''ये इन महावतो के अजमाए हुए ज्ञान का हिस्सा है. ये पारम्परिक विद्या है. जब आधुनिक विज्ञानं नहीं था,तो महावत जड़ी बूटियों से उपचार करते थे. इसका इन्हें लाभ भी मिला है. ये जो संचित ज्ञान है,इसके बारे में और अध्ययन अनुसन्धान की दरकार है.''

हाथी मालिक और महावत पुरखों से मिली इस विरासत के जरिये गजराज के सेहत सुधरने में लगे है. मगर अब वे इन मैली कुचेली,फटी पुरानी पुस्तको की सेहत को लेकर भी चिंतित है.क्योंकि जब वो इन किताबो के आईने में झांकते है ,गुजरे ज़माने का इतिहास जीवंत हो उठता है.

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