क्या है किस्सा नोवार्टिस का?

 बुधवार, 22 अगस्त, 2012 को 16:28 IST तक के समाचार

फर्ज़ कीजिए कि भारत में कोई कैंसर रोगी हर महीने 8,000 रुपए अपने इलाज पर खर्च करता हो और अचानक भारतीय कानून में ऐसा बदलाव आए जिससे इस इलाज की कीमत 2 लाख प्रति माह हो जाए!

अविश्वसनीय लगता है. लेकिन ये वास्तविक हो सकता है अगर दवा बनाने वाली कंपनी नोवार्टिस सुप्रीम कोर्ट में भारत के पेटेंट कानून के खिलाफ मामला जीत जाती है.

फिलहाल ये मामला 11 सितंबर तक के लिए स्थगित हो गया है लेकिन भारत में सबकी नज़र इस विवाद पर बनी हुई है क्योंकि भारत के लिए इसके परिणाम दूरदर्शी हो सकते हैं.

पेटेंट यानि किसी भी चीज़ पर बौद्धिक संपत्ति का अधिकार होना. किसी अविष्कार, नई तकनीक या बिज़नेस के तरीकों पर सरकारों द्वारा कंपनियों को पेटेंट दिया जाता है.

आमतौर पर पेटेंट कम से कम 20 साल के लिए दिया जाता है और इस अवधि के समाप्त होने के बाद दूसरी कंपनियों को अधिकार मिल जाता है कि वो उसी तकनीक का इस्तेमाल कर वही चीज़ बना सके.

जहां तक दवाईयां बनाने की बात है, तो ज़्यादातर विकसित देशों में दवाई बनाने वाली कंपनियों को उनकी दवाईयों की तकनीक पर पेटेंट दिया जाता है.

लेकिन भारत में 2005 तक ऐसा नहीं था. यहां दवाईयों पर कोई पेटेंट नहीं दिया जाता था, जिसकी वजह से दवाईयों का उत्पादन सस्ता था.

2005 में विश्व व्यापार संगठन ने भारत से कहा कि वो दवाओं पर पेटेंट देना शुरू करे, जिसके बाद भारत ने अपने पेटेंट कानून में बदलाव किए.

और तभी से दवा बनाने वाली कंपनियों के बीच छीना-झपटी शुरू हुई.

किस्सा नोवार्टिस का

"अगर नोवार्टिस ये मामला जीत जाता है तो उसका प्रतिकूल असर भारत के औषध उद्योग के साथ-साथ सरकार और रोगियों पर भी पड़ेगा. ये केस जीतने के बाद नोवार्टिस का अगला कदम होगा दूसरी कंपनियों को कैंसर दवा बनाने से रोकना, जिसका मतलब ये होगा कि कैंसर का इलाज महंगा हो जाएगा"

लीना मेघनानी, मेडिसीन्स सैन्स फ्रन्टियर्स

2005 में अचानक कैंसर बनाने वाली दवाओं की बाज़ार में कमी होने लगी और जब मामले में छानबीन की गई तो पता चला कि नोवार्टिस ने दूसरी दवा बनाने वाली कंपनियों को कोर्ट में घसीट लिया है क्योंकि कंपनी का दावा था कि भारत में इस दवाई को बेचने का अधिकार केवल उसके पास है.

स्विट्ज़रलैंड की कंपनी नोवार्टिस ने 2005 में ग्लीवॉक नाम की कैंसर-निरोधी दवाई पर पेटेंट का आवेदन डाला जिसे भारत के पेटेंट कार्यालय ने खारिज कर दिया था.

आज उसी फैसले के खिलाफ नोवार्टिस सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंचा है. अब नोवार्टिस ने न केवल इस फ़ैसले को अदालत में चुनौती दी है बल्कि ये भी दावा किया है कि भारत का पेटेंट कानून अंतरराष्ट्रीय समझौतों के अनुकूल नहीं है

दरअसल ग्लीवॉक पर पेटेंट की मांग इसलिए स्वीकार नहीं की गई क्योंकि निचली अदालत ने ये माना कि कंपनी ने बाज़ार में उपलब्ध दवा के फॉर्म्यूले में छोटा-मोटा बदलाव कर उस पर अधिकार जमाना चाहा.

आगे क्या होगा?

"अगर दूसरी कंपनियां भी अपनी दवाईयों पर पेटेंट मांगने लगीं, तो एड्स और टीबी जैसी जानलेवा बीमारियों का इलाज लोगों की पहुंच से दूर हो जाएगा. हम भारत से सस्ती दवा खरीद कर दूसरे देशों में दान भी नहीं कर पाएंगें"

लीना मेघनानी, मेडिसीन्स सैन्स फ्रन्टियर्स

ग्लीवॉक नाम की ये दवा भारत में आम कंपनियां करीब 13,000 रुपए प्रति माह के दाम पर बनाती है, जबकि नोवार्टिस की दवा की कीमत करीब एक लाख 30 हज़ार रुपए प्रति महीना है.

ज़ाहिर है कि अगर नोवार्टिस इस दवा पर बौद्धिक संपत्ति का अधिकार या पेटेंट जीतने में कामयाब होता है, तो ये दवा आम लोगों की पहुंच से बाहर हो जाएगी.

लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि फिलहाल चिंता की कोई बात नहीं है क्योंकि भारत का पेटेंट कानून रोगियों के हित में है और एक ही दवा के फॉर्म्यूले में थोड़े-बहुत बदलाव कर कोई भी कंपनी नए पेटेंट का दावा नहीं कर सकती.

युद्ध-प्रभावित देशों में पीड़ितों को दवा मुहैया करवाने वाली गैर-सरकारी संस्था मेडिसीन्स सैन्स फ्रन्टियर्स यानि एमएसएफ का कहना है कि यदि नोवार्टिस को सफलता मिल जाती है तो दवा कंपनियां प्रचलित दवाओं पर आधारित एड्स के नए उपचारों को भी भारत में पेटेंट सुरक्षा के दायरे में ला पाएँगी.

भारत में एक्सेस कैंपेन की एमएसएफ मैनेजर लीना मेघनानी ने बीबीसी से बातचीत में कहा, “अगर नोवार्टिस ये मामला जीत जाता है तो उसका प्रतिकूल असर भारत के औषध उद्योग के साथ-साथ सरकार और रोगियों पर भी पड़ेगा. ये केस जीतने के बाद नोवार्टिस का अगला कदम होगा दूसरी कंपनियों को कैंसर दवा बनाने से रोकना, जिसका मतलब ये होगा कि कैंसर का इलाज महंगा हो जाएगा.”

‘गरीबों की फार्मेसी’

लीना मेघनानी का कहना है कि खतरा सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है. डर इस बात का भी है कि दूसरी दवा बनाने वाली कंपनियां इस मामले से प्रेरित हो कर अपनी दवाईयों पर पेटेंट मांगने लगेंगी.

उन्होंने कहा, “अगर दूसरी कंपनियां भी अपनी दवाईयों पर पेटेंट मांगने लगीं, तो एड्स और टीबी जैसी जानलेवा बीमारियों का इलाज लोगों की पहुंच से दूर हो जाएगा. हम भारत से सस्ती दवा खरीद कर दूसरे देशों में दान भी नहीं कर पाएंगें.”

दरअसल भारत को 'गरीब देशों की फार्मेसी' कहा जाता है क्योंकि यहां दवाईयां सस्ती होने की वजह से गरीब देशों को बड़ी तादाद में दवाईयां यहां से भेजी जाती हैं.

पेटेंट कानून न होने की वजह से 1970 के बाद दवा बनाने वाली कंपनियों ने यहां हर उस दवा की नकल की जो दूसरे देशों में पेटेंट की वजह से महंगी थी.

2005 के बाद पेटेंट कानून में बदलाव किए गए, लेकिन इसके बावजूद ज़्यादातर ज़रूरी दवाईयां सस्ते दामों में ही उपलब्ध हैं क्योंकि उनका उत्पाद 2005 के पहले से ही होता आ रहा था.

फिलहाल हज़ारों कंपनियां अपनी दवाईयों पर पेटेंटे के लिए आवेदन डाल रही हैं, लेकिन अभी तक चिंता की कोई बात नहीं है.

लेकिन हां पासा ज़रूर पलट सकता है अगर सुप्रीम कोर्ट का फैसला नोवार्टिस के हक में आता है.

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