क्या आप उनके साथ पढ़ना चाहेंगे?

 सोमवार, 27 अगस्त, 2012 को 09:30 IST तक के समाचार

कितना सहज हो पाता है एक विकलांग बच्चे के लिए किसी मुख्यधारा के स्कूल में आम बच्चों के साथ बैठकर पढ़ाई कर पाना?

चार साल के अभिषेक का स्कूल में पहला दिन है. उसे उसकी व्हीलचेयर से निकाल कर बाकि बच्चों के साथ लकड़ी की कुर्सी पर बैठाया जाता है.

आंखों में डर और झरने की तरह बहते आंसू तो कई बच्चों में देखे हैं, लेकिन इस बच्चे की घबराहट तो मानो लहर बनकर इसके पूरे शरीर में दौड़ रही है, उसकी टांगें ऐसे कांप रही हैं जैसे ठंड से दांत किटकटाते हैं.

हर वक्त ख्याल रखे जाने और परिवार के सुरक्षित कुटुम्ब के अनुभव से अलग इस नई जगह में, जहां वे अपनी उम्र के बहुत से बच्चों के बीच भी अपनी विकलांगता के कारण खुद को काफी अलग महसूस कर रहा है.

और फिर सुबह की प्रार्थना शुरू होती है, मधुर बोलों पर धीमे-धीमे झूमते छोटे-छोटे सिर, अभिषेक का ध्यान खुद से उनकी ओर खींचकर उसके मन में चलते कोलाहल को शांत कर देते हैं.

'एकीकृत' स्कूल

बाकि बच्चों के साथ गति बनाए रखने के लिए विकलांग बच्चों को अलग समय दिया जाता है.

स्कूल की यही कोशिश है, एकीकृत शिक्षा, बच्चे पूर्णत: स्वस्थ हों या शारीरिक अथवा मानसिक विकलांगता से पीड़ित, एक ही छत के नीचे उन्हें एक साथ शिक्षा देना.

दिल्ली के राजकुमारी अमृत कौर चाइल्ड स्टडी सेंटर की संयोजक इंदु कौरा के मुताबिक ये अनोखा अनुभव आम लोगों के लिए भी उतना ही खास होता है जितना विकलांग बच्चों के लिए.

इंदु कहती हैं कि, “अक्सर मां-बाप खुद ही मुझे बताते हैं कि विकलांग बच्चों के साथ पढ़ने की वजह से उनके सामान्य बच्चों के पिछड़ने की उनकी शंका कितनी बेबुनियाद थी. क्योंकि इस अनुभव ने ना सिर्फ उनके बच्चों को संवेदनशील बनाया है बल्कि उन्हें विवधता का आदर करना भी सिखाया है.”

ये एक प्री-स्कूल है. 20 बच्चों की एक कक्षा में तीन अध्यापक और एक सहायक होते हैं ताकि विकलांग बच्चों पर खास ध्यान दिया जा सके.

"शिक्षा नीति तो बच्चों को अलग करती है क्योंकि वो सफलता को अंकों, पदकों और सर्टिफिकेट के तराज़ू पर तोलती है, ऐसे में मध्यवर्ती बच्चे पिछड़ जाते हैं, और उस परिवेश में विकलांग बच्चे तो आगे आ ही नहीं पाते."

जी स्यामला, मानवाधिकार कार्यकर्ता

यहां सेरिब्रल पॉल्सी, ऑटिज़म और डाउन्स सिन्ड्रोम से पीड़ित बच्चे पढ़ रहे हैं. लेकिन अगर इनमें किसी तरह की शारीरिक विकलांगता ना हो तो इन्हें आम बच्चों से अलग कर पाना मुश्किल है.

तेरह वर्ष से यहां पढ़ा रहीं ज्योति सेठी बताती हैं कि सभी बच्चों को खेल या किसी भी और कार्य में एक साथ रखना बहुत मुश्किल होता है.

ज्योति कहती हैं, “हम बहुत योजना बनाते हैं, रणनीति सोचते हैं, लेकिन अक्सर ये कम रह जाता है, फिर बच्चे ही हमें रास्ता दिखाते हैं, बस आप सहजता से उनकी बात समझ जाएं.”

वो मुझे उस कमरे में ले जाती हैं जहां बच्चे खाना खाने के लिए इकट्ठा हुए हैं. पांच वर्षीय गौतम, सब बच्चों के बैग से टिफिन बॉक्स निकालकर एक टेबल पर रखता है.

सहज भाव से वो मुझे समझाता है कि उसके दोस्त अपनी कुर्सी से उठकर ऐसा करने में दिक्कत महसूस करते हैं, इसलिए वो उनकी मदद कर देता है.

सबके समान

दोपहर हो चली है और छुट्टी की घंटी बजने वाली है, तभी कुछ नए चेहरे दिखाई देते हैं.

अपने बच्चे की विकलांगता के बारे में जानकर मां-बाप घबरा जाते हैं और उन्हें सलाह और जानकारी की ज़रूरत होती है.

ये वो मां-बाप हैं जिन्हें अपने बच्चों की विकलांगता के बारे में हाल ही में पता चला है. वो यहां आ रहे हैं ताकि बच्चों की परवरिश के बारे में कुछ सीख सकें.

अनुज अहूजा अपनी दो साल की बच्ची के साथ आए हैं, “यहां सबकी सोच बहुत सकारात्मक है, हमारे बच्चों को ऐसे ही माहौल की ज़रुरत है जिसमें उन्हें सबके साथ समान माना जाए.”

लेकिन ऐसे स्कूलों की तादाद बहुत कम है, और जो हैं वे भी ज़्यादातर बड़े शहरों तक ही सीमित हैं.

अलग करती है शिक्षा नीति

विकलांग बच्चों और वयस्कों के साथ म कर रही संस्था, ‘ऐक्शन फॉर अबिलिटी, डेवलपमेंट ऐन्ड ऐक्शन’, के साथ जुड़ीं जी श्यामला के मुताबिक एकीकृत शिक्षा के सरकार की शिक्षा नीति का हिस्सा होने के बावजूद ज़मीनी हकीकत बहुत अलग है.

श्यामला कहती है, “शिक्षा नीति तो बच्चों को अलग करती है क्योंकि वो सफलता को अंकों, पदकों और सर्टिफिकेट के तराज़ू पर तोलती है, ऐसे में मध्यवर्ती बच्चे पिछड़ जाते हैं, और उस परिवेश में विकलांग बच्चे तो मुख्यधारा के स्कूल में प्रमुखता में आ ही नहीं पाते.”

उनका मानना है कि विकलांग बच्चों को आम बच्चों के साथ पढ़ाने के लिए की जा रही कोशिशें स्कूल के ढांचे में बदलाव तक समझी जाती रही हैं, पर ये नाकाफी है और दरअसल शिक्षा नीति की पूरी मानसिकता को बदलने की ज़रूरत है.

(कुछ बच्चों के नाम पहचान ज़ाहिर होने से बचने के लिए बदल दिए गए हैं.)

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