एक उत्तरपूर्वी और मुसलमान होने का मतलब...

 सोमवार, 3 सितंबर, 2012 को 08:25 IST तक के समाचार

क्लिक करें असम में पिछले कई दिनों से लगातार बढ़ती हिंसा, लगभग सौ लोगों की मौत जिनमें ज़्यादातर बांग्लादेश से आए मुसलमान हैं और हज़ारों लाखों लोगों का विस्थापन एक ऐसी त्रासदी है जो अचानक नहीं घटी बल्कि लंबे समय से अपने आने की दस्तक दे रही थी.

आज जिस तरह असम में हिंसा भड़की है, उसमें विरोधाभास दिखता है.

पहला विरोधाभास ये है कि जो लोग मार रहे हैं उनका कहना है कि वे घुसपैठियों पर निशाना साध रहे हैं. साथ ही उनकी शिकायत ये रही है कि राज्य सरकार मूल निवासियों और बांग्लादेशियों की पहचान करने में नाकाम रही हैं.

तो, सवाल ये है कि असम में रहने वाले मुसलमानों और बांग्लादेश से आए कथित घुसपैठियों के बीच क्लिक करें पहचान आखिर कैसे की जा रही है.

मुसलमान होने का मतलब

दूसरा विरोधाभास ये है कि किस तरह देशभर के मुसलमानों ने असम में हुई क्लिक करें हिंसा को पड़ोसी देश से हो रही 'घुसपैठ' की समस्या के तौर पर नहीं बल्कि अपनी बिरादरी और मुसलमानों के खिलाफ़ हो रहे षडयंत्र की तरह देखा.

जहां एक ओर असम का बोडो समुदाय कोकराझाड़ ज़िले में बांग्लादेश से आए कथित घुसपैठियों से ज़मीन और रोज़ी-रोटी के मुद्दे पर लड़ रहा है वहीं असम से कई सौ किलोमीटर दूर मुंबई में 11 अगस्त को हुआ प्रदर्शन असम हिंसा में मारे गए मुसलमान भाईयों के समर्थन में था.

असम

बंगलौर, चेन्नई और देश के बाकी हिस्सों से उत्तरपबर्वी लोगों के पलायन के बाद से असम का समाज बंटा हुआ है.

अब जबकि यह साफ हो चुका है कि ये पूरी बहस असम के मूल निवासियों बनाम बांग्लादेशियों के बजाय मुसलाम बनाम उत्तरपूर्व का रुप ले चुकी है सवाल ये उठता है कि ऐसे में असम के 90 लाख मुसलमानों के लिए आगे की रास्ता क्या होगा.

सवाल ये भी कि इस घमासान के बीच उत्तरपूर्व में रह रहे एक आम मुसलमान को इस वक्त कैसा महसूस होता होगा.

शिलॉग में रहने वाले टबरिस अहमद से मैंने ये सवाल पूछा. टबरिस मेघालय के उस शहर शिलॉग में रहते हैं जहां हर धर्म और भारत के हर शहर से लोग आकर बसे हैं.

40 वर्षीय टबरिस इलाके के एक प्रतिष्ठित वकील हैं और मुसलमान हैं. मणिपुर में बसा एक छोटा मुसलमानों का समुदाय जिसे पंगन कहते हैं.

उत्तरपूर्व बनाम भारत

टबरिस अहमद से उनके घर पर मुलाकात के दौरान मुझे ये एहसास हुआ कि उत्तर-पूर्व में एक मुसलमान के तौर पर रहने का अनुभव कैसा है

असम से कई सौ किलोमीटर दूर मुंबई में 11 अगस्त को असम हिंसा में मारे गए मुसलमानों के समर्थन में हुआ प्रदर्शन भी हिंसक हो गया.

टबरिस अहमद के माता-पिता असम और मणिपुर की सीमा पर मौजूद बांसकांडी गांव के रहने वाले हैं. उनके पिता इमामों के परिवार से जुड़े हैं और देवबंद स्थित दारुल उलूम से इस्लाम की पढ़ाई करके 1961 में मणिपुर आए थे. 2003 में अपनी मृत्यु से पहले तक वो शिलॉंग की एक मस्जिद में मौलवी के तौर पर रहे.

उन्होंने अपने बेटों के शिलॉग के अंग्रेज़ी माध्यम मिशनरी स्कूलों में पढ़ने भेजा और किसी ने भी धार्मिक शिक्षा का रास्ता नहीं अपनाया. लेकिन उनका परिवार आज भी उसी मस्जिद के नज़दीक रहता है जहां उनके पिता कभी मौलवी हुआ करते थे. टिबरिस अब इस मस्जिद के उपाध्यक्ष हैं और मानते हैं कि नमाज़ियों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी एक तरह से उनपर भी है.

असम हिंसा की बात छिड़ती है तो वो उस फ़र्क को साफ तौर पर सामने रखते हैं जो 1947 से पहले असम में रह रहे बंगाली मुसलमानों या फिर 1971 में बंगाल के विभाजन के दौरान असम आए मुसलमानों और काम की तलाश में बांग्लादेश से भागकर क्लिक करें भारत आने वाले मुसलमानों के बीच है.

टिबरिस इस बात से पूरी तरह सहमत हैं कि बांग्लादेश से जिस तरह बड़ी संख्या में लोग भारत में दाखिल हो रहे हैं उस पर रोक लगनी चाहिए. इन विचारों के पीछे एक प्रगतिशील क्लिक करें मुसलमान के रुप में उनकी परवरिश और उस भारतीय नागरिक की चिंता छिपी है जो भारत-पाकिस्तान मैच में हर दम भारतीय टीम के लिए दुआ करता है.

टिबरिस अहमद देशभर में घूमते हैं लेकिन भारत के लिए उनकी फिक्र और देशभक्ती का जज़्बा यह देखकर भी कम नहीं होता कि लोगों में उत्तर-पूर्व और उसके नक्शे के बारे में सतही जानकारी भी नहीं है.

भारत के दूसरे हिस्सों में लोगों को उत्तर-पूर्वी राज्यों के बारे कोई जानकारी नहीं जबकि हमने स्कूलों में पढ़ाई के दौरान पूरे भारत के बारे में पढ़ा है.

बहु-सांस्कृतिक पहचान

जब मैं टिबरिस अहमद से उनके पुरखों के बारे में पूछती हूं तो वो खुद को मणिपुर या असम का नहीं बल्कि शिलॉंग का मानते हैं. उन्हें शिलॉंग में बोली जाने वाली लगभग सभी भाषाएं खासी, हिंदी, अंग्रेज़ी, बंगाली, असमी और उनकी अपनी पैतृक भाषा मितिलॉन भी आती है. वो शिलॉंग को अपना घर मानते हैं, वो जह जहां लौटकर उन्हें सुकून मिलता है.

असम

राज्य और केंद्र सरकार पर लगातार ये आरोप लग रहे हैं कि भारत गैर कानूनी तरीके से देश में दाखिल होने वाले प्रवासियों को रोक नहीं पाता.

टिबरिस हर धर्म हर संस्कृति के बारे में जानते हैं और उसकी अच्छाईयों के पुरोधा हैं लेकिन साथ ही उन्हें खुद के मुसलमान होने पर खुशी है और वो अपने घर अपने राज्य में सुकून से रहने का हक़ चाहते हैं.

लेकिन मुंबई में जिन लोगों ने असम में हुई हिंसा के विरोध में हंगामा और हिंसा की वो उन लोगों की तरह अंतररष्ट्रीय स्तर पर मुसलमानों में होने वाले भाईचारे के समर्थक नहीं.

वो कहते हैं कि एक मुसलमान के तौर पर वो राज्य सरकार की इस मामले में हर संभव मदद करना चाहते हैं जिसके ज़रिए बांग्लादेश से आने वाले कथित घुसपैठियों और असम में लंबे समय से रह रहे मुसलमानों के बीच फर्क किया जा सके.

टिबरिस अहमद की एक साथ कई पहचान हैं. वो शिलॉंग के रहने वाले हैं, असमी हैं मणिपुरी हैं, मुसलमान हैं और भारतीय भी. उनकी ये अलग-अलग पहचान दिखाती हैं कि असम के मसले को काले और सफेद के जिस चश्मे से देखा जा रहा है वो कितनी झूठा और सतही है.

एक मध्यमवर्गी मुसलमान के रुप में उनकी संवेदनाएं सबसे अधिक उस तबके के साथ हैं जिसे इस हिंसा के चलते, मज़दूर, सुरक्षा गार्ड, नाई की दुकान, होटल, या कारखाने की अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा. यही वजह है कि असम में जारी संघर्ष को सामुदायिक हिंसा के नज़रिए से देखना उन लोगों को पूरी से अनदेखा करना है जिनके लिए ज़िंदगी की असली लड़ाई दो वक्त का खाना है, वो लोग जो भूख और गराबी से होने वाली इस लड़ाई में हर दिन बेमौत मारे जाते हैं.

बदले की भावना से भड़कने वाली इस तरह की हिंसा में अक्सर सबसे बड़ा नुकसान इन्ही लोगों का होता है.

ऐसे में ज़रूरी है कि समस्या के अलग-अलग पक्षों से जुड़े लोग अपना ध्यान एक दूसरे को खत्म करने पर नहीं बल्कि उस सरकार पर केंद्रित करें जो पहले तो गैर कानूनी तरीके से प्रवासियों को अपने देश में दाखिल होने देती है और फिर उनके क़त्लेआम को लेकर अंधी हो जाती है.

(अंजुम हसन एक उपन्यासकार और कारवां मैगज़ीन की बुक एडिटर हैं.)

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