संसद के इतिहास का सबसे ठप सत्र?

 सोमवार, 3 सितंबर, 2012 को 14:45 IST तक के समाचार

लोक सभा में आज शोर के बावजूद ध्वनिमत तीन विधेयक पारित किए गए.

कोयला आबंटन घोटाले में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के इस्तीफे की मांग को विपक्ष ने एक बार फिर संसद के दोनों सदनों में उठाया.

दोनों सदन की कार्यवाही पहले 12 बजे तक और बाद में पूरे दिन के लिए स्थगित कर दी गई.

लोक सभा में बहुत शोर और हंगामे के बावजूद सदन ने ध्वनिमत से तीन विधेयक पारित किए गए जिनमें कामकाज के स्थल पर यौन उत्पीड़न विरोधी विधेयक (प्रोटेक्शन ऑफ वुमेन अगेन्स्ट सेक्सुअल हैरेसमेंट ऐट वर्कप्लेस बिल 2010) शामिल है.

वहीं मैला ढोने पर पाबंदी लगाने और अब तक इस प्रथा के तहत काम कर रहे लोगों के पुनर्वास संबधित विधेयक (प्रोहिबिशन ऑफ इम्प्लॉयमेंट ऐस मैनुअल स्कैवेन्जर्स ऐंड देयर रीहैबिलिटेशन बिल 2011) को पेश किया गया.

मॉनसून सत्र का ये आखिरी हफ्ता है और सात सितंबर को सत्र खत्म हो जाएगा.

वर्ष 1952 के पहले आम चुनाव के बाद से अब 15वें संसद सत्र तक हुए कामकाज का विश्लेषण कर, संसदीय व्यवस्था पर शोध संस्था पीआरएस लेजिसलेटिव रिसर्च ने ये निष्कर्ष निकाला है कि इस सत्र में अब तक सबसे कम काम हुआ है.

पीआरएस के मुताबिक संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) के दूसरे कार्यकाल के दौरान 15 वीं लोकसभा में 27 फीसदी कम काम हुआ है जो राष्ट्रीय गणतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के 2004-09 और 1999-2004 के कार्यकाल से भी कम है.

अब तक का सबसे कम काम

लोक सभा में विपक्ष की नेता सुष्मा स्वराज ने प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग से पीछे हटने से इनकार किया है.

इस वर्ष मॉनसून सत्र में लोकसभा में 60 घंटे में से 23 घंटे काम हुआ और राज्य सभा में 50 घंटे में से 25 घंटे काम हुआ.

इससे पहले वर्ष 2010 के शीत सत्र में 2-जी घोटाले का मुद्दा उठा रहे विपक्ष ने अपनी मांगे मानी जाने तक संसद में कोई काम नहीं होने दिया था.

उसके बाद से कॉमनवेल्थ खेल, लोकपाल बिल, महंगाई और तेलंगाना जैसे मुद्दों पर संसद का काम अक्सर बाधित होता रहा है.

कई बार ऐसा भी हुआ की चर्चा के लिए संसद का सत्र चला भी तो विधेयक पारित करने या उनमें संशोधन करने के कार्य नहीं हो पाए.

मसलन सरकार ने 15वीं लोकसभा के पहले तीन सत्रों में 37,32 और 39 विधेयक पारित करने की योजना बनाई थी लेकिन 10, 15 और 12 ही आखिर पारित हो सके.

विपक्ष का कड़ा रुख बरकरार

लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने कहा है कि कोयला खदान घोटाला मामले में भारतीय जनता पार्टी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के इस्तीफ़े की मांग पर अडिग है और उससे पीछे हटने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता है.

रविवार को मुंबई में एक प्रेस कांफ़्रेस के दौरान सुषमा स्वराज ने कहा कि बीजेपी इस मामले पर कांग्रेस पार्टी पर दबाव बनाए रखेगी.

भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि कोयला आबंटन में नीलामी न होने से राजस्व को 1.86 हज़ार करोड़ रूपयों का नुक़सान हुआ है.

वर्ष 2005 से 2009 की इस अवधि के दौरान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कोयला मंत्री के पद पर थे, इसीलिए रिपोर्ट आने के बाद से बीजेपी उनके इस्तीफे की मांग कर रही है.

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