ख़ुद को जीवित साबित करने की जंग

 मंगलवार, 4 सितंबर, 2012 को 08:02 IST तक के समाचार

ये कहानी एक ऐसी महिला की है जिसकी शादी 12 साल में हो गई, जो 19 साल में माँ बन गई, 23 की उम्र में जिसे उसके पति ने छोड़ दिया और जिसे 40 की उम्र में मृत घोषित कर दिया गया.

64 वर्षीया अशर्फ़ी देवी को ये साबित करने में 24 साल लग गए कि वो जीवित हैं.

उनका विवाह 1960 में बिहार के रोहतास ज़िले के बरून गाँव के एक स्थानीय किसान राम जनम सिंह के साथ हुआ.

उनके पास उनकी शादी का कोई सबूत नहीं है, लेकिन उन्हें कुछ-कुछ याद पड़ता है कि जब उनकी शादी हुई तब वो 12 साल की थीं.

उन्हें इतना याद आता है कि तब उन्हें शादी की लाल रंग की दुल्हन वाली साड़ी पहनकर बड़ा मज़ा आया था और तब तेज़ आवाज़ में फ़िल्मी गानों की आवाज़ें आ रही थीं, उन लाउडस्पीकरों से जो उसके छप्पर वाले घर के पास एक पेड़ से बँधे थे.

आघात

"40 साल की उम्र में मुझे मृत घोषित कर दिया गया था, सरकारी तौर प"

उनको पहला झटका तब लगा, जब उन्हें पता चला कि वो अपने पति की दूसरी बीवी हैं. राम जनम सिंह की पहली पत्नी झलकिया देवी अशर्फ़ी देवी की शादी से कुछ दिन पहले चल बसी थीं.

अशर्फ़ी देवी ने शादी के सात साल बाद 19 साल की उम्र में बेटी को जन्म दिया.

लेकिन वो कहती हैं कि इस वक्त तक उनके पति ने उनको शारीरिक और मानसिक तौर पर प्रताड़ित करना शुरू कर दिया था.

"मैंने पुलिस से लेकर न्यायपालिका तक, हर दरवाज़ा खटखटाया, मगर कोई भी मुझे जीवित साबित नहीं कर सका, ये स्वीकार करते हुए भी कि मैं जीवित हूँ."

अपनी बेटी और दामाद के साथ अशर्फ़ी देवी

वो कहती हैं,”बेटी के जन्म के चार साल बाद मेरे पति ने मुझे और मेरी बेटी को छोड़ दिया और मैं अपने पिता के घर चली गई.“

फिर समय बीता और अशर्फ़ी देवी ने अपनी बिटिया बिमला देवी की शादी सब्ज़ी बेचनेवाले अनिल कुमार से कर दी. शादी का ख़र्च उनेक पिता और भाई ने उठाया.

लेकिन वो उस दिन हिल उठीं जब उन्हें पता चला कि उनके पति ने सासाराम की नगरपालिका से उनका नकली मृत्यु प्रमाणपत्र प्राप्त कर लिया है. ये सर्टिफ़िकेट 30 दिसंबर 1988 को जारी किया गया था.

अशर्फ़ी बताती हैं, "चालीस साल की उम्र में मुझे मृत घोषित कर दिया गया था, सरकारी तौर पर."

मगर बात यहीं नहीं ख़त्म हुई.

उन्होंने कहा कि उन्हें पता चला कि उनके पति ने अपने दिवंगत भाई की पत्नी सुभागो देवी से शादी कर ली है. ये राम जनम सिंह की तीसरी शादी थी.

अकेली लड़ाई

इसके बाद अशर्फ़ी देवी की अपने आप को ज़िंदा साबित करने की लंबी लड़ाई शुरू हुई.

वो पुलिस के पास गईं, राजनेताओं से मिलीं और अदालत में भी गईं, पर हुआ कुछ भी नहीं.

"सभी तथ्यों और गवाहों पर ग़ौर करने के बाद मेरी अदालत ने अशर्फ़ी देवी के साथ न्याय किया जो ये कहती थीं कि वो जीवित हैं"

संध्या सिंह, सरपंच

वो कहती हैं, "मैंने पुलिस से लेकर न्यायपालिका तक, हर दरवाज़ा खटखटाया. लेकिन कोई भी मुझे जीवित साबित नहीं कर सका, ये स्वीकार करते हुए भी कि मैं जीवित हूँ."

वे अपनी बेटी और दामाद के साथ गाँव में एक झोपड़ी में रहने लगीं और अपने को ज़िंदा साबित करने की लड़ाई लड़ने लगीं.

वो बताती हैं कि उनके पति और उनकी पत्नी उन्हें धमकी दिया करते थे.

अशर्फ़ी कहती हैं, "उन्होंने मुझे 1993-94 में चोरी के एक फ़र्ज़ी मामले में फँसाकर जेल भी भिजवाया. वो मुझे मरा हुआ साबित कर अपनी सारी संपत्ति अपनी तीसरी पत्नी के नाम कर रहे थे."

सारी उम्मीदें खोने के बाद अशर्फ़ी देवी ने 2006 में पटना हाई कोर्ट में गुहार लगाई लेकिन हुआ कुछ भी नहीं.

इसके बाद 24 सितंबर 2011 को उन्होंने ज़िला पंचायत में फरियाद की जहाँ आठ महीने तक सभी सबूतों की जाँच की गई.

मई में अशर्फ़ी देवी, उनके पति और रिश्तेदारों, ग्रामीणों, स्थानीय पुलिस, अधिकारियों और पत्रकारों को पंचायत की अदालत में बुलाया.

सरपंच संध्या सिन्हा ने बीबीसी को बताया,"सभी तथ्यों और गवाहों पर ग़ौर करने के बाद मेरी अदालत ने अशर्फ़ी देवी के साथ न्याय किया जो ये कहती थीं कि वो जीवित हैं."

"अब मेरे पास अपने अस्तित्व को साबित करने के काग़ज़ हैं. मैं मृत नहीं हूँ"

24 वर्षों की लंबी और थका देनेवाली लड़ाई के बाद अब अशर्फ़ी देवी के पास अपने आप को जीवित सिद्ध करने का प्रमाण मिल चुका है.

वो कहती हैं, "अब मेरे पास अपने अस्तित्व को साबित करने के काग़ज़ हैं. मैं मृत नहीं हूँ."

उनकी बेटी बिमला देवी कहती हैं, "ये मेरी माँ के दूसरे जन्म की तरह है."

लेकिन उनके पिता अभी भी आँखों पर पट्टी बाँधे बैठे हैं.

राम जनम सिंह का कहना है, "अशर्फ़ी देवी 1988 में मर चुकी. मुझे नहीं पता ये औरत क्यों मेरी बीवी होने का दावा करती है. उससे पूछिए, मुझसे क्या पूछते हैं?"

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