आई-स्लेट पर लिखी कामयाबी की इबारत....

 बुधवार, 5 सितंबर, 2012 को 15:57 IST तक के समाचार

एक छोटे से इलेक्ट्रॉनिक यंत्र ने जो किसी क्लिक करें कंप्यूटर टैबलेट की तरह दिखाई देता है, आंध्र प्रदेश के एक सुदूर गाँव के ग़रीब छात्रों के जीवन को बदल डाला है.

महबूबनगर ज़िले के दो स्कूलों के छात्र 'आई-स्लेट' नामक उस यंत्र का प्रयोग कर रहे हैं, जिसे अमरीका और सिंगापुर के तकनीकी विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं ने बनाया है.

पहाड़ों और बंजर भूमि से घिरा मोहम्मद हुसैन पल्ली गाँव कहने को तो हैदराबाद से सौ सवा सौ किलोमीटर दूर है लेकिन विकास और ख़ुशहाली वहां से अभी सैकड़ों वर्ष दूर है.

लेकिन इस गाँव का एक तेलुगू भाषी सरकारी स्कूल एक अंतरराष्ट्रीय प्रयोग का केंद्र बन गया है.

अशोक, काशीनाथ, श्रृषा, समीना और रेहाना दलित-पिछड़ी जातियों और मुस्लिम समुदाय के खेतिहर मज़दूरों के बच्चे हैं जो सातवीं कक्षा में पढ़ते हैं. ये बच्चे अपनी पढ़ाई के लिए उस आई-स्लेट का प्रयोग कर रहे हैं, जो अमरीका और सिंगापुर में विशेष कर उनके लिए बनाया गया है.

बड़ा परिवर्तन

ई-स्लेट

ई-स्लेट का जो अंतिम रूप होगा उसमें वाई-फ़ाई से इंटरनेट जोड़ने की क्षमता होगी

इस यंत्र के कारण इन बच्चों के जीवन में एक बड़ा परिवर्तन आया है और इनकी शिक्षा के स्तर में भी बढ़ेत्तरी हुई है.

11 वर्षीय काशीनाथ का कहना है कि यह आई-स्लेट उसका नया मित्र है, जिसने उसके शैक्षिक जीवन को एक नई दिशा दी है.

वो कहता है, "पहले जब मैं स्कूल से घर आता था तो अपना बस्ता फ़ेंक कर खेलने और घूमने के लिए निकल जाता था लेकिन जब से मुझे आई-स्लेट मिला है मैं घर पर ही रह कर पढ़ने लगा हूँ. इस पर मुझे गणित और विज्ञान पढ़ने में मज़ा आता है."

गाँव में वैसे भी 12 घंटे बिजली नहीं रहती लेकिन ये छात्र सौर ऊर्जा से आई-स्लेट को रिचार्ज करते हैं, जिसके लिए स्कूल में विशेष प्रबंध किया गया है.

इस बात को सुनिश्चित करने के लिए कि बच्चे पूरी तरह आई-स्लेट का उपयोग करें, उन्हें यह यंत्र घर ले जाने की अनुमति है. हर छात्र और छात्रा का चित्र उसके आई-स्लेट के स्क्रीन पर दिखाई देता है जिससे उनके अंदर गर्व का भावना भी पैदा होती है.

आई-स्लेट के नोट पैड और स्टाइलस या विशेष पेन के ज़रिए बच्चे उस पर लिखाई-पढ़ाई भी कर सकते हैं. गणित और विज्ञान के पाठ्यक्रम की वो पुस्तकें भी पढ़ सकते हैं जो इसमें लोड की गई हैं और ऐसी परीक्षा भी दे सकते हैं जिसमें यह आई-स्लेट हर प्रश्न के चार उत्तर बताता है और छात्र को सही उत्तर चुनना पड़ता है.

साथ ही यह आई-स्लेट इन बच्चों को कई नई चीज़ें सिखा रहा है. एक खेतिहर मज़दूर की बेटी रेहाना कंप्यूटर की उन सारी क्षमताओं को जानती है जो शहर की कोई लड़की जानती होगी.

वो कहती है, "मैंने आई-स्लेट पर माई वीडियो, कैमरा, स्लाइड शो, वाल पेपर सहित कई चीज़ें सीखी हैं. साथ ही मैं उस पर गणित और विज्ञान भी पढ़ती हूँ. इसके आने के बाद से परीक्षाओं में मेरे नंबर और भी बढ़ गए हैं और मुझे समझ भी आता है कि मैं क्या पढ़ रही हूँ."

सपनों की उड़ान

"मैंने ई-स्लेट पर माई वीडियो, कैमरा, स्लाइड शो, वाल पेपर सहित कई चीज़ें सीखी हैं. साथ ही मैं उस पर गणित और विज्ञान भी पढ़ती हूँ. इसके आने के बाद से परीक्षाओं में मेरे नंबर और भी बढ़ गए हैं और मुझे समझ भी आता है कि मैं क्या पढ़ रही हूँ."

रेहाना, छात्रा

ये स्पष्ट है कि आई-स्लेट ने बच्चों पर एक अदभुत प्रभाव डाला है और उनकी कल्पना शक्ति को बढ़ा दिया है. अब ये बच्चे किसी दूसरे विषय से ज़्यादा ज्ञान में रूचि लेने लगे हैं. श्रृषा पहले पुलिस अफ़सर बनना चाहती थी लेकिन अब वो साइंस टीचर बनना चाहती है.

समीना, जिसके पिता भी एक खेत मज़दूर हैं अब एक डॉक्टर बनने का सपना देख रही है. वो कहती है, "आई-स्लेट पर साइंस पढ़ते हुए मुझे डाक्टर बनने का ख्याल आया."

लेकिन सवाल ये है कि आई-स्लेट क्या है और यह दूर स्थित गाँव तक कैसे पहुंचा?

सिंगापुर की नायांग टेकनोलॉजिकल यूनिवर्सिटी और अमरीका की राइस यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर पालेम कृष्ण इस यंत्र के पीछे काम करने वालों में से एक हैं.

वो कहते हैं की आई-स्लेट केवल एक यंत्र नहीं बल्कि एक सोच है. वो कहते हैं, "यह शिक्षा के क्षेत्र में ग़रीब बच्चों को शिक्षित करने का एक माध्यम है जो कम ख़र्च और कम ऊर्जा से उपयोग में लाया जा सकता है, क्योंकि ग्रामीण इलाक़ों में बिजली एक बड़ी समस्या है.

बेहतर अवसर

"ई-स्लेट पर साइंस पढ़ते हुए मुझे डॉक्टर बनने का ख्याल आया"

समीना, छात्रा

इस पर हम गत दो वर्षों से शोध कर रहे हैं और हमने देखा है कि इससे बच्चों की शिक्षा का स्तर बेहतर हुआ है.

यह यंत्र सीधा-सादा है और इसमें बच्चों के लिए आकर्षण भी है. इस परियोजना पर काम करने वालों में प्रोफेसर पालेम कृष्ण के अलावा लॉस एंजेलेस के सेसो मीडिया ग्रुप के मार्क मार्टिनस और हेनरिक एंडरसन भी शामिल हैं.

इसे ग्रामीण ग़रीबों तक पहुंचाने का काम एक गैर सरकारी संस्था विलेज फॉर लर्निंग एंड डेवेलपमेंट की पिंगली राजेश्वरी कर रही हैं जो भारत का तिरंगा बनाने वाले पिंगली वेंकन्ना परिवार की सदस्या हैं.

राजेश्वरी ने इस प्रयोग के लिए महबूबनगर ज़िले के चयन का कारण बताते हुए कहा, "महबूबनगर देश के सबसे ग़रीब इलाक़ों में से एक है. वहां प्राकृतिक साधनों की कमी है, पानी नहीं है जिससे खेती-बाड़ी कम होती जा रही है. अगर हम वहां के बच्चों को नई तकनीक से जोड़ते हैं, तो इससे आगे चलकर उनके लिए रोज़गार के बेहतर अवसर उपलब्ध होंगे."

लेकिन अभी यह शोध पूरा नहीं हुआ है. इन बच्चों ने जिन आई-स्लेट का उपयोग किया है, उन्हें सिंगापुर की एक लैब में ले जाया जाएगा, जहाँ उनका विश्लेषण कर यह देखा जाएगा कि बच्चों ने किन चीज़ों का ज्यादा उपयोग किया है और किन चीज़ों से उन्हें ज़्यादा फ़ायदा पहुंचा है.

इसे और भी सरल और बेहतर बनाने के लिए शोधकर्ता, छात्रों और अध्यापकों के सुझाव भी ले रहे हैं.

इंटरनेट का जादू

"महबूबनगर देश के सबसे गरीब इलाकों में से एक है. वहां प्राकृतिक साधनों की कमी है, पानी नहीं है जिससे खेती-बाड़ी कम होती जा रही है. अगर हम वहां के बच्चों को नई तकनीक से जोड़ते हैं तो इससे आगे चलकर उनके लिए रोज़गार के बेहतर अवसर उपलब्ध होंगे."

पिंगली राजेश्वरी, विलेज फॉर लर्निंग एंड डेवेलपमेंट

कक्षा में कभी ख़ामोश न बैठने वाला अशोक चाहता है कि आई-स्लेट को इंटरनेट से भी जोड़ा जाए.

वो कहता है, "अगर यह इंटरनेट से जुड़ा होता है तो हम किसी भी विषय पर नई से नई जानकारी ले सकते हैं. हमारे टीचर भी हमें यह दिखा सकते हैं कि वो जिन चीज़ों की बात कर रहे हैं, वो दिखाई कैसी देती हैं."

स्कूल की हेड मिस्ट्रेस गंजी श्यामला का मनना है कि इंटरनेट बच्चों के लिए नई जानकारी पाने के कई दरवाज़े खोल देगा. इन सुझावों को सामने रखते हुए शोधकर्ता आई-स्लेट को नया रूप देने में लगे हैं जो दो महीने के अंदर तैयार हो जाएगा.

पालेम कृष्ण का कहना है कि वो पहले आई-स्लेट को इंटरनेट से जोड़ने के खिलाफ़ थे लेकिन उनकी टीम के सभी सदस्य इसके पक्ष में हैं इसलिए आई-स्लेट का जो अंतिम रूप होगा, उसमें वाई-फ़ाई से इंटरनेट जोड़ने की क्षमता होगी.

क्योंकि यह यंत्र ग़रीबों को ध्यान में रख कर तैयार किया जा रहा है, इसलिए इसकी क़ीमत 50 सिंगापुर डॉलर यानी 2000 रूपए से ज़्यादा नहीं होगी.

यह ग्रुप अब आंध्र प्रदेश के अधिकारियों से बातचीत कर रहा है कि किस तरह आगामी तीन वर्षों में इसे महबूबनगर के सरकारी स्कूलों के कम से कम दस प्रतिशत छात्र-छात्राओं यानी लगभग 50 हज़ार बच्चों तक पहुंचाया जाए.

अगर ऐसा हुआ तो पिछड़े ज़िले महबूबनगर में शिक्षा के क्षेत्र में एक बड़ी क्रांति आ सकती है. कृष्ण पालेम का कहना है कि भारत के अलावा इंडोनेशिया और अफ़्रीका के कई देशों में भी इस यंत्र में गहरी रूचि देखने में आई है.

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