ममता बनर्जी कहिन.......

 गुरुवार, 6 सितंबर, 2012 को 10:06 IST तक के समाचार

ममता बनर्जी उपलब्धियों की बजाय गलत वजहों से ज्यादा चर्चा में रहीं

‘अग्निकन्या’ के नाम से मशहूर ममता बनर्जी वर्ष 2011 के विधानसभा चुनावों में लोकप्रियता की लहर पर तैरते हुए जब पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठी थीं, तब आम लोगों में बदलाव की एक नई उम्मीद जगी थी.

अब सत्ता में कोई सवा साल पूरे होने के बाद भारी आर्थिक बोझ से चरमराती उनकी सरकार ने कागजी एलानों के अलावा विकास की राह पर कोई ठोस प्रगति तो नहीं की है.

लेकिन इस दौरान अपने अजीबोगरीब बयानों और विवादास्पद टिप्पणियों के चलते मुख्यमंत्री ने जम कर सुर्खियां बटोरी हैं.

डेंगू और डाइटिंग

कोलकाता में फैलते डेंगू के प्रकोप के बीच अब उन्होंने एक और हास्यास्पद बयान दिया है. ममता ने अपने इस ताजा बयान में कहा है कि राज्य के युवा वर्ग में बढ़ती डाइटिंग की प्रवृत्ति से ही डेंगू का प्रकोप फैल रहा है.

उन्होंने आंकड़ों के हवाले यह भी बताया कि कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में डेंगू की चपेट में आने वालों और इससे मरने वालों की तादाद बंगाल के मुकाबले बहुत ज्यादा है.

वे यह भी कहने से नहीं चूकीं कि वर्ष 2005 में वाममोर्चा के शासन में इस बीमारी से 34 लोगों की मौत हो गई थी.

वैसे, यह ममता की पहली अजीबोगरीब टिप्पणी या कार्रवाई नहीं है.

पिछले साल सत्ता में आने के बाद अपना चुनावी वादा पूरा करने की जिद में उन्होंने सिंगुर में नैनो प्लांट की जमीन पर कब्जा करने के लिए एक नया कानून बना दिया.

लेकिन कलकत्ता हाईकोर्ट ने इसे अवैध और असंवैधानिक करार दे दिया है. अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट में है. विशेषज्ञों से राय लिए बिना रातोंरात बनाए गए इस कानून के चलते ममता को काफी किरकिरी झेलनी पड़ी है.

कार्टून

इसी कार्टून को फॉरवर्ड करने के कारण जादवपुर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर को जेल की सजा भुगतनी पड़ी

इस साल मार्च में यादवपुर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अंबिकेश बनर्जी को ममता, पूर्व रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी और मौजूदा रेल मंत्री मुकुल रॉय को लेकर बने एक कार्टून को ई-मेल से फारवर्ड करने के आरोप में जेल की सजा भुगतनी पड़ी.

अब मानवाघिकार आयोग ने सरकार को इस मामले में प्रोफेसर को 50 हजार रुपए का मुआवजा देने का निर्देश दिया है.

इसके कुछ दिनों बाद एक टीवी शो में इस बारे में सवाल पूछने वाली एक छात्रा को माओवादी करार देते हुए ममता वह शो छोड़ कर ही निकल गई थीं.

महानगर के पार्क स्ट्रीट इलाके में इसी साल एक महिला के साथ हुए सामूहिक बलात्कार के मामले में अपनी टिप्पणी के चलते ममता को काफी शर्मिंदगी उठानी पड़ी थी.

उन्होंने जांच के पहले ही कह दिया था कि कहीं कोई बलात्कार नहीं हुआ है.

बाद में उनकी ही पुलिस के जांच दल ने युवती के आरोप को सही माना और इस मामले में कई लोग गिरफ्तार भी किए गए. नतीजा-खुफिया विभाग की प्रमुख का तबादला कर दिया गया.

किसान

ममता बनर्जी को पश्चिम बंगाल में सत्ता सँभाले एक वर्ष से ज्यादा हो गया

राज्य में किसानों की आत्महत्या के मामले में भी यही हुआ.

एक ओर हर रोज किसानों की मौत की खबरें सामने आ रही थीं तो दूसरी ओर ममता लगातार दावा कर रही थीं कि कहीं किसी किसान ने आत्महत्या नहीं की है.

जो एकाध लोग मरे भी हैं, वे दूसरी बीमारियों से मरे हैं. उन्होंने इस मुद्दे को बढा-चढ़ा कर पेश करने के लिए मीडिया को भी आड़े हाथों लिया.

इसके बाद बीती नौ जुलाई को पश्चिम मेदिनीपुर के माओवाद-प्रभावित बेलपहाड़ी में उनकी सभा के दौरान जब एक किसान ने खड़े होकर उनसे खाद की बढ़ती कीमत के बारे में सवाल पूछा तो ममता ने उसे माओवादी बता कर गिरफ्तार करवा दिया.

पुस्तक

इसी सप्ताह उन्होंने वरिष्ठ पुलिस अधिकारी नजरुल इस्लाम की लिखी पुस्तक मुसलमानों को क्या करना चाहिए की बिक्री पर अघोषित पाबंदी लगा कर यह साबित कर दिया कि वे अपने खिलाफ उठने वाली विरोध की कोई आवाज नहीं सह सकतीं.

सीपीएम और कांग्रेस की लगातार आलोचना के बाद ममता अब मीडिया से भी दो-दो हाथ करने पर तुली हैं.

उनका आरोप है कि मीडिया में एक-एक सरकार-विरोधी खबर लिखने-दिखाने के लिए 50 हजार से एक लाख तक का सौदा किया जाता है.

वैसे, जंगलमहल यानी माओवाद और गोरखालैंड आंदोलन की समस्या हल करने का दावा कर वे लगातार अपनी पीठ थपथपाती रही हैं.

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