गर्भाशय कांड: जवाब ढूंढती सरकार..

 शनिवार, 8 सितंबर, 2012 को 07:47 IST तक के समाचार

बिहार सरकार के श्रम संसाधन मंत्री जनार्दन सिंह सिग्रीवाल

राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना (आरएसबीवाई) के तहत ग़रीबों की सेहत से खिलवाड़ और इलाज के नाम पर अनैतिक व्यापार से बिहार सरकार ने थोड़ा झिझकते हुए इनकार किया है.

ख़ासकर इसे 'गर्भाशय घोटाला' कहे जाने पर चिढ़ जाने वाली बिहार सरकार के श्रम संसाधन विभाग के मंत्री जनार्दन सिंह सिग्रीवाल का बयान ग़ौर करने लायक है.

उन्होंने बीबीसी के साथ एक बातचीत में कहा, "माना कि राज्य के सभी 38 ज़िलों में विगत दो-तीन वर्षों में इस बीमा योजना के तहत गर्भाशय निकाले जाने के 50 हज़ार ऑपरेशन किए गए होंगे. उनमें कुछ गैरज़रूरी या फ़र्ज़ी ऑपरेशन जैसी शिकायतों की जांच ख़ुद राज्य सरकार की पहल पर ही हो रही है और मैं विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि जांच के बाद दोषी पाए जाने वालों पर कठोर कार्रवाई ज़रूर होगी"

ये योजना श्रम संसाधन विभाग के अंतर्गत ही आती है.

ज़िम्मेदारी से बचने की कोशिश

समस्तीपुर के माला नर्सिंग होम पर लगे हैं आरोप

मैंने उनसे ये जानना चाहा कि इस योजना की लगातार निगरानी और समीक्षा का दायित्व जब राज्य सरकार का था तो इतनी सारी गड़बडियों का पता पहले क्यों नहीं चला?

इसका कोई सटीक जवाब देने के बजाय उन्होंने सिर्फ ये बताया कि निजी अस्पतालों का चयन भारत सरकार के दिशानिर्देश के मुताबिक़ इंश्योरेंस कंपनी ने किया.

उन्होंने ये भी कहा कि राज्य सरकार ज़िला स्तर पर कोर कमेटी बनाकर योजना पर नज़र रखे हुए थी.

प्रेक्षक मानते हैं कि योजना में अंदर ही अंदर चल रही लूट का पता लगाकर उसे रोक पाने में सरकार विफल रही, इसलिए अब उसे अपनी चूक छिपाने में दिक्क़त हो रही है.

आरएसबीवाई से जुड़े भुगतान की कुल राशि का 75 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार को और बाक़ी 25 प्रतिशत राज्य सरकार को देना पड़ता है.

अब इस बाबत ग़रीबों के साथ हुए घात या योजना राशि में हुए घपले संबंधी आरोपों के केंद्र में मुख्य रूप से सूचीबद्ध निजी नर्सिंग होम आ गए हैं.

चूँकि 'गर्भाशय घोटाला' का बिहार में पहला शोर समस्तीपुर में मचा, इसलिए आरोपों के घेरे में आए वहाँ के नर्सिंग होम चलाने वाले दो प्रमुख चिकित्सकों से मैंने बातचीत की. मिश्रा नर्सिंग होम के संचालक डॉ. आर.पी. मिश्रा इस मसले पर बात करने को क़तई तैयार नहीं हुए.

सफ़ाई

"ये संभव ही नहीं है कि आरएसबीवाई के सिस्टम से जुड़ा कोई एक पक्ष चाहे तो घपला कर ले"

डॉक्टर रति रमण झा, माला नर्सिंग होम के संचालक

माला नर्सिंग होम के डॉ. रति रमण झा और कृष्णा हॉस्पिटल के डॉ. महेश ठाकुर से जब मैं मिला तो उन्हें भी इस विषय पर चर्चा में असहज पाया.

दोनों ही इस बात से बेहद ख़फ़ा थे कि उनका पक्ष सुने बिना ज़िला प्रशासन और लोकल मीडिया ने डाक्टरों को अपराधी घोषित कर दिया.

डॉ. रति रमण झा बोले,"ये संभव ही नहीं है कि आरएसबीवाई के सिस्टम से जुड़ा कोई एक पक्ष चाहे तो घपला कर ले. ये तभी संभव है, जब पूरा सिस्टम करप्ट हो जाए. कार्डहोल्डर मरीज़, डाक्टर, बीमा कंपनी, उसका जांच दल और सरकारी विभाग के संबंधित लोग, इन सब की मिलीभगत हो जाय, तभी घोटाला संभव है. स्मार्ट कार्ड की गड़बड़ी और विभागीय चूक का भी खामियाजा हम डॉक्टरों को भुगतना पड़ रहा है. लेकिन हाँ, फ़र्ज़ीवाड़ा और ठगी के दोषी अगर डाक्टर भी हैं, तो उन्हें दंड ज़रूर मिले."

इस सिलसिले में समस्तीपुर के कृष्णा हॉस्पिटल पर सबसे अधिक ग़ैरज़रूरी या फ़र्ज़ी ऑपरेशन करने के आरोप लगे हैं.

उसके संचालक डॉ.महेश ठाकुर ने सिर्फ ये कहा- "जांच पूरी हुए बिना, हमारा पक्ष जाने बिना, जो मीडिया को अपुष्ट खबरें दी गईं, उससे डाक्टरों की इमेज धूमिल हुई है और हमें बहुत आघात लगा है. ज़िला प्रशासन से हमें ऐसी उम्मीद नहीं थी. दोषी साबित होने पर हमें दंड देते, पहले नहीं."

डॉ. ठाकुर ने अपने ऊपर लगे आरोपों का जवाब अधिकृत जांच टीम को ही देने की बात कहकर हाथ जोड़ते हुए हमें नमस्कार कह दिया.

कई सवाल

डॉक्टर ललिता सिंह समस्तीपुर सदर अस्पताल की मेडिकल ऑफ़िसर हैं

लेकिन जब मेरी बात वहाँ सदर अस्पताल की मेडिकल अफ़सर डॉ ललिता सिंह से हुई, तो उन्होंने इन निजी अस्पतालों में हुए गर्भाशय के ऑपरेशन पर सवाल उठाए.

उनका कहना था, "यहाँ शिविर में हमने अंडर एज सर्जरी के कई मामले पाए. कुछ मामले ऐसे मिले कि अल्ट्रा साउंड रिपोर्ट में युटेरस देख कर आगे की ज़रूरी जांच कराये बिना गर्भाशय निकाला गया था. बच्चेदानी में कैंसर के खतरे का पता लगाने के लिए एक ख़ास जांच (पायप्सीस्मेयर) होती है, उसे कराये बिना युटेरस काट कर निकाल दिया गया, जो ग़लत हुआ. कम उम्र में गर्भाशय हटा देने के बाद औरतों में मासिक धर्म रुकने से कई तरह की तकलीफें होती हैं."

यहीं पर ये सवाल उठा है कि क्या आरएसबीवाई के तहत ज़्यादा से ज़्यादा ऑपरेशन करके बीमा क्लेम की मोटी राशि बटोरने का धंधा नहीं हुआ?

बिहार राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष जस्टिस एस. एन. झा ने बीबीसी से कहा," गर्भाशय निकाले जाने के ऐसे मामलों में ज़ाहिर तौर पर मानवाधिकार के हनन की बात आ जाती है. इसलिए मैंने राज्य के श्रम संसाधन विभाग और स्वास्थ्य विभाग को इसकी जांच कराके आयोग को सही तथ्यों से अवगत कराने के लिए पत्र भेज दिया है."

बिहार सरकार राज्य के सभी 38 ज़िलों से इस बाबत जांच रिपोर्ट मंगाने में जुट गई है. लेकिन विपक्ष ने इसे घोटाले का बड़ा मामला बताते हुए केन्द्रीय जांच ब्यूरो से इसकी जांच कराने की मांग की है.

हालांकि कुछ प्रभावित ग्रामीण इलाक़ों में घूमते हुए ज़्यादातर लोगों से मैंने यही सुना कि योजनाओं को लूट से बचाने वाला नहीं, लूट मचाने वाला ज़्यादा ताक़तवर हो गया है.

इससे जुड़ी और सामग्रियाँ

इसी विषय पर और पढ़ें

BBC © 2014 बाहरी वेबसाइटों की विषय सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है.

यदि आप अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करते हुए इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरूप कर लें तो आप इस पेज को ठीक तरह से देख सकेंगे. अपने मौजूदा ब्राउज़र की मदद से यदि आप इस पेज की सामग्री देख भी पा रहे हैं तो भी इस पेज को पूरा नहीं देख सकेंगे. कृपया अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करने या फिर संभव हो तो इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरुप बनाने पर विचार करें.