कब जागेगी भारत की सरकार ?

 शुक्रवार, 7 सितंबर, 2012 को 20:12 IST तक के समाचार
भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह

वॉशिंगटन पोस्ट में मनमोहन सिंह की आलोचना पर सूचना और प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी ने तीखी प्रतिक्रिया दी

ऐसा क्यों होता है कि जब कोई विदेशी आलोचना करता तो भारत अपनी प्रतिक्रिया में चिड़चिड़ा प्रतीत होता है.

इसका ताज़ा उदाहरण है वॉशिंगट पोस्ट में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बारे में छपे लेख पर सूचना और प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी की तीखी प्रतिक्रिया. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बारे में वॉशिंगटन पोस्ट में जो लिखा गया है उससे अंबिका सोनी बेहद नाख़ुश हैं.

वॉशिंगटन पोस्ट के दिल्ली संवाददाता के लेख के मुताबिक 'जिस प्रधानमंत्री ने भारत को समृद्धि की राह पर लाने में अहम भूमिका निभाई थी, खतरा है कि उसी प्रधानमंत्री को इतिहास में एक विफल नेता के तौर पर याद किया जाएगा.

अख़बार के मुताबिक, मनमोहन सिंह ‘फ़ैसले ले पाने में अक्षम, प्रभावहीन नौकरशाह की तरह हैं जो एक बेहद भ्रष्ट सरकार के मुखिया हैं.’

कहने को तो लेख ने बहुत कड़े शब्द इस्तेमाल किए हैं लेकिन ऐसा उनके बारे में पहली बार नहीं कहा गया है.

हाल के महीनों में केंद्रीय सरकार एक-के-बाद एक संकट से जूझती रही है और इसका ख़ामियाज़ा मनमोहन सिंह को देशी और विदेशी मीडिया में उनकी आलोचना के रूप में भुगतना पड़ा है.

टाइम पत्रिका ने हाल ही में मनमोहन सिंह को ‘अंडरएचीवर’ बताया था जो “अपने व्यक्तिगत और राजनीतिक अंधकार में डूबे हुए हैं.” ब्रिटेन से छपने वाले इंडिपेंडेंट अख़बार ने टिप्पणी की थी कि 'क्या प्रधानमंत्री मुक्तिदाता हैं या फिर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के पालतू?'

"किसी विदेशी अख़बार द्वारा हमारे प्रधानमंत्री के बारे में बेसिर-पैर बात छापने को लेकर सरकार की चिंताए हैं. इसे पीत पत्रकारिता कहते हैं."

अंबिका सोनी, केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री

वहीं इकॉनोमिस्ट पत्रिका ने मनमोहन सिंह को “सब तरफ़ से घिरे हुए प्रधानमंत्री” बताया था.

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर इस तरह की टिप्पणियाँ होती रहती हैं.

लेकिन कई लोग वॉशिंगटन पोस्ट के लेख पर सूचना और प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी की प्रतिक्रिया को लेकर हैरान हैं.

अंबिका सोनी के बयान में वॉशिंगटन पोस्ट के लेख को “अस्वीकार्य” बताया गया और कहा गया कि वो इस मुद्दे को सरकार के साथ उठाएंगी.

अंबिका सोनी ने कहा “किसी विदेशी अख़बार द्वारा हमारे प्रधानमंत्री के बारे में बिना सिर-पैर बात छापने को लेकर सरकार की चिंताए हैं. हम इसे सनसनी फैलाने के लिए की गई पत्रकारिता कहते हैं.”

मंत्री ने इस ओर भी इशारा किया कि सरकार अमरीकी अख़बार से माफ़ी की मांगने को कहेगी. उन्होंने कहा, “अगर वॉशिंगटन पोस्ट ने प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ ऐसा कुछ लिखा है तो यकीन कीजिए मैं इसका कड़ा विरोध करूंगी.”

मुझे नहीं पता कि किसी ने मंत्री से ये भी पूछा कि वॉशिंगटन पोस्ट के संवाददाता के इस पर साफ इनकार करने के बाद वो किस तरह अखबार से माफ़ी ले पाएँगी. क्या सरकार संवाददाता का कार्य वीज़ा रद्द करेगी? किसी को कुछ नहीं पता.

"कई लोग वॉशिंगटन पोस्ट के लेख पर सूचना और प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी की प्रतिक्रिया को लेकर हैरान हैं. एक लेख में कहा गया कि अंबिका सोनी ने वॉशिंगटन पोस्ट के लेख को “अस्वीकार्य” बताया और कहा कि वो इस मुद्दे को सरकार के साथ उठाएंगी."

फ़िलहाल सरकार और अख़बार के बीच लेख में इस्तेमाल की गई कुछ टिप्पणियों के स्रोत को लेकर कहा-सुनी चल रही है. प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार पंकज पचौरी ने वॉशिंगटन पोस्ट को लिखा है कि उनका “आकलन एकतरफ़ा” है, चाहे पत्रकारिता में 'टिप्पणी करने का आधिकार सभी को है.'

पंकज पचौरी का कहना भी सही है.

लेकिन कई लोग अंबिका सोनी की तीखी प्रतिक्रिया से चिंतिंत हैं जो ख़ासकर किसी विदेशी द्वारा आलोचना के लिए असहिष्णुता की ओर इशारा करती है. स्थानीय टीकाकार और पत्रकार हर रात टीवी पर मनमोहन सिंह की आलोचना करते हैं और यही हाल भारतीय अख़बारों का भी है.

कई समीक्षक कहते हैं कि निंदा के प्रति ये असहिष्णुता कांग्रेस को विरासत में मिली है. ये वही पार्टी है जिसने वर्ष 1975 में नागरिक अधिकारों को निलंबित कर इमर्जेंसी लगाई थी. वो भारतीय लोकतंत्र का सबसे काला अध्याय था.

समीक्षक, मुख्यत: एक परिवार का दामन थामे चलने वाली कांग्रेस के लोकतांत्रिक झुकाव को भी संदेह की नजर से देखते हैं.

समीक्षक प्रताप भानू मेहता इंडियन एक्सप्रेस में कहते हैं कि जैसे-जैसे तेज़ी से बढ़ता हुआ मध्यम वर्ग और नागरिक समाज सरकार की कारगुजारी पर पैनी नजर डालता है, वैसे-वैसे सरकारें और ज़्यादा असहिष्णु होती जा रही हैं.

इंडिया एक्प्रैस अख़बार के लेख में प्रताप भानू लिखते हैं, “जब भी सरकार की कोई कमी सामने आती है, वो अब भी आलोचकों को चुप कराने, मुद्दे को व्यक्ति विशेष से जोड़ने, प्रणाली में बदलावों से बचने और जिसका बचाव नहीं हो सकता, उसका बचाव करने के पुराने सरकारी हथकंडों का इस्तेमाल कर रही है. "

स्पष्ट है कि लड़ाई पुराने राजनीतिक तौर-तरीकों और बदली हुई नई वास्तविकता की है. सरकार कब जागेगी?

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