सिवकासी में मरते मज़दूर, बढ़ता मुनाफ़ा

सिवकासी पठाखा मज़दूर
Image caption मज़दूर बिना दास्तानों और मास्क के काम करने करते हैं.

पटाखे की फैक्टरी में आग से 39 मौतों की बाद सिवकासी में झकझोर देने वाली शांति है. ना प्रदर्शन, ना गुस्सा. बस एक सवाल, कि अगली दुर्घटना कब होगी?

पिछले एक दशक में आधिकारिक तौर पर 250 से 300 मजदूर दुर्घटनाओं में मारे जा चुके हैं और कई सौ घायल हुए हैं.

प्रशासन ने फैक्टरियों पर छापे की कार्रवाई शुरू की है. लेकिन छापे पहले भी पड़े हैं.

ऐसे ही एक छापे की टीम में शामिल होने के लिए जब मैं सिवकासी सब-कलेक्टर दफ्तर में पहुँचा तो एक अधिकारी ने बातों ही बातों में कहा कि मजदूरों को तो बस पैसे से मतलब है और कुछ नहीं.

उन्होंने कहा, “एक बार मैने खुद देखा कि एक व्यक्ति पहले तो अपने रिश्तेदार के मरने पर रोने लगा, लेकिन जब उसे दो लाख का चेक दिया गया, तो उसके आंसू गायब हो गए और वो जोर-जोर से हंसने लगा.”

बेरूख़ी

इतने बड़े हादसे के चंद दिनों में बाद एक वरिष्ठ अफसर की ये टिप्पणी मजदूरों को लेकर प्रशासन के एक तबके की बेरुखी को दर्शाती है. उधर हादसे के बाद मजदूरों ने रोज़ी-रोटी की तलाश में फिर फैक्टरियों का रुख़ किया है.

फैक्टरियों में काम के माहौल को समझने हम पहुंचे किलाथिरुथंगल इलाके में कई एकड़ में फैले विनायगा फायरवर्क्स इंडस्ट्रीज की फैक्टरी में.

बाहर लोहे का बड़ा सा गेट था, अंदर चारों ओर रसायन और पटाखों के बीच काम करते लोग थे. रुकी हुई हवा से ऐसा लगा कि तापमान 36 डिग्री से कहीं ज्यादा है. कोई बम में पलीता लगा रहा था, तो कहीं पैकेजिंग चल रही थी.

आंगनों में पटाखे सूखने को रखे हुए थे. अंदर मोबाइल से बात करने की भी मनाही थी.

चारों ओर रसायन ही रसायन था. पटाखों में हरी चमक लाने के लिए बैरियम नाइट्रेट, लाल रंग के लिए स्टैंसियम नाइट्रेट, नीले रंग के लिए क़ॉपर ऑक्साइड, पीले रंग के लिए सोडियम नाइट्रेट, पटाखों में सितारों जैसी चमक के लिए मैग्नीशियम, एल्युमीनियम अलॉय और उनके रंगों का निखार डालने के लिए पॉलीविनाइल क्लोराइड.

और दूसरी कई और तरह की सामग्री.

मैनेजर ने बताया कि फैक्टरी में फर्स्ट-एड की सुविधा है. लेकिन डॉक्टर जहां बैठते हैं वो जगह वहां से तीन किलोमीटर की दूरी पर है. हमें कहीं आग बुझाने के लिए फायर एक्सटिंग्विशर नजर नहीं आया.

हमें छोटे-छोटे माचिस के डिब्बों जैसे कमरों में लोग पटाखे तैयार करते दिखे. कहीं ट्रॉलियों में पटाखे रखकर ले जाए जा रहे थे, तो कहीं महिलाएँ खराब पटाखों को अच्छे पटाखों से अलग कर रही थीं. अगर कुछ भी हुआ तो स्थिति भयावह होनी निश्चित थी.

मेरा ध्यान एक कमरे में बैठे नारायणस्वामी पर गया. आधा कमरा लटकती चमकीली डोरियों से भरा था. उनका सिर पॉलीथीन से ढका था, चेहरे पर सालों की कड़ी मेहनत के निशान साफ थे. साथ ही निशान थे एल्युमीनियम पाउडर के. ना हाथों में दस्ताने, ना नाक को ढकने के लिए मास्क. और ना ही चेहरे पर कोई भाव.

Image caption एक कंपनी के मालिक पी गनेसन फैक्टरी में बेहतरीन सुरक्षा व्यवस्था की मौजूदगी का दावा करते हैं.

सामने एक कटोरेनुमा बर्तन में सल्फर, पोटैशियम, एल्युमीनियम पाउडर का घोल था. उनके साथी नागराज कुछ फीट लंबी डोर को घोल में डुबोकर कमरे में टंगी तारों में लटका रहे थे.

नागराज की आँखों पर मोटा चश्मा था और तन ढकने के लिए बस एक लुंगी. चेहरा शांत और ध्यान काम पर. तैयारी हो रहे थी स्प्रिंकलिंग स्टार्स पटाखे बनाने की, यानि उनमें आग लगाते ही चारों ओर सितारों जैसी चमक होगी.

एक फैक्टरी अधिकारी ने बताया कि कुछ मजदूरों को टीबी की शिकायत है. उनका कहना था, “ये रसायन फेफड़ों को नुकसान पहुँचाते हैं जिससे साँस लेने में परेशानी होती है.”

सिवकासी सरकारी अस्पताल के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर एम कथिरेसन की भी यही राय है. उनके पास मजदूर जलने, हड्डी टूटने की शिकायतें लेकर आते हैं.

लेकिन विनायगा फायरवर्क्स मजदूरों को दस्ताने और मास्क क्यों नहीं देती? अधिकारी ने बताया कि कई मजदूर गर्मी और पसीने के कारण इसे नहीं पहनते.

फैक्टरी जाने के एक दिन पहले मेरी मुलाकात कंपनी के मालिक पी गनेसन से उनके शानदार दफ्तर में हुई थी. उनकी मुख्य कंपनी सोनी फायरवर्क्स की दुकाने सिवकासी में छाई हुई हैं.

चेक कमीज पहने हुए गनेसन ने मुझसे कहा था कि उनकी फैक्ट्री में मजदूर “बहुत अच्छा मास्क” का इस्तेमाल करते हैं.

गनेसन ने आगे कहा था कि दस्ताने पहनने से हथौड़ा और छेनी के इस्तेमाल में समस्या होती है. गनेसन विश्वास के साथ कहते हैं, “जब हमने 1982 में फैक्ट्री शुरू की थी, तब भी मैं, मेरे भाई रसायनों को कागज को खोखों में भरते थे. हमें कुछ नहीं हुआ.”

कहाँ है प्रशासन

ये लड़ाई बराबरी वाले लोगों के बीच नहीं है. एक तरफ हैं सिवकासी के फैक्टरी मालिक जिन्होंने फैक्टरियाँ, स्कूल कॉलेज खड़े किए हैं. उन्होंने दूसरे उद्योगों में भी निवेश किया है.

दूसरी तरफ है ग़रीबी से जूझता, पढ़ाई-लिखाई से दूर, मजदूर.

Image caption पुलिस ने दुर्घटना के बाद कई फैक्ट्रियों पर छापे मारे हैं लेकिन प्रशासन के एक तबक़े में बेरूख़ी का भाव है.

ज्यादातर मजदूरों की सोच अपने काम और परिवार तक सीमित है. उनमें प्रशिक्षण का अभाव है, वो सुरक्षा को लेकर “लापरवाह” हैं और अधिकतर नौकरी के दौरान ही काम सीखते हैं. हमने जितने लोगों से बात की उनका कहना था कि उन्हें खतरों से निपटने और सावधानी बरतने के बारे में फैक्टरियों में कुछ नहीं बताया गया.

पटाखों की एक बड़ी कंपनी के मालिक की मानें तो उनके यहां एक महिला ने पैसे के लालच में आकर खुद ही धमाका कर आत्महत्या कर ली ताकि परिवार को हर्जाना मिल सके.

सवाल ये कि सिवकासी की कड़ी गर्मी में पसीना बहाकर परिवार के लिए दिन के 160 रुपए जुटाने वाले व्यक्ति के पास क्या विकल्प है?

जुबिलेंट क्रैकर्स के डॉयरेक्टर वी रामामूर्ति की अनुसार दरअसल मज़दूर मालिक पर राज कर रहा है और मालिक मज़दूरों के सामने जोकर बनकर रह गए हैं.

वो कहते हैं कि उद्योग में काम जानने वालों की कमी है और मजदूर इसका फायदा उठाते हैं और मालिकों से पैसे लेते हैं.

रामामूर्ति के अनुसार, “कोई मालिक नहीं चाहेगा कि गलत काम करके हवालात में जाए.”

सिवकासी और आसपास का इलाक़ा पूरी तरह पटाख़ा उद्योग पर निर्भर है. सड़क पर हर थोड़ी दूर पर आपको पटाखों के पोस्टर या उनकी दुकानें मिलेंगी. ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि मजदूरों की मौत से क्या किसी को फर्क पड़ रहा है?

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