'जिम्मेदारियों से भाग रहें हैं राहुल'

 मंगलवार, 11 सितंबर, 2012 को 23:27 IST तक के समाचार
राहुल गांधी

इकोनॉमिस्ट मैगज़ीन ने राहुल गांधी की कार्यक्षमता पर सवाल उठाए हैं.

लंदन से छपनेवाली प्रतिष्ठित पत्रिका इकोनॉमिस्ट ने एक लेख में कहा है कि राहुल गांधी देश की राजनीति और सरकार में अधिक सक्रिय भूमिका निभा सकते थे लेकिन उन्होंने वो मौक़े गंवा दिए.

'राहुल प्रॉब्लम' यानी राहुल गांधी की दिक्कतें शीर्षक के लेख में कांग्रेस महासचिव की राजनीति, उनकी सोच, और कुछ दूसरे पहलूओं की समीक्षा की गई है.

चार पन्नों के लेख में कहा गया है कि उन्होंने ज़िम्मेदारी का पद लेने से इंकार करते हुए, कांग्रेस की यूवा शाखा के पुनर्गठन और क्षेत्रीय चुनावों पर ध्यान केंद्रित करने को तरजीह दी है लेकिन उसमें उन्हें कोई सफलता नहीं मिली है.

आगे कहा गया है कि दिक्कत ये है कि अभी तक वो एक राजनीतिज्ञ के तौर पर अपनी लियाक़त का प्रदर्शन नहीं कर पाए हैं, न इस काम को लेकर उनमें कोई शिद्दत की भावना पाई जाती है, वो शर्मीले हैं, पत्रकारों, लेखकों या वैसे लोगों जिनसे भविष्य में कोई राजनीतिक गठबंधन बन सकते हैं, बात करना नहीं पसंद करते, और न ही वो संसद में उनके स्वर मुखर रहे हैं.

'ख़ुद नहीं मालूम'

इसलिए किसी को उनकी क्षमता के बारे में मालूम नहीं है, न ही ये पता है कि कल अगर वो सत्ता में आ गए तो किस तरह के फैसले लेंगे.

लेख के अनुसार अब लोग ये सोचने लगे हैं कि इन सबका जवाब उन्हें ख़ुद मालूम नहीं है.

इकोनॉमिस्ट ने यूवा नेता पर हाल में लिखी गई आरथी रामचंद्रन की किताब का ज़िक्र किया है, लेकिन आरथी को किताब लिखने में ये दिक्कत पेश आई की राहूल गांधी के बारे में काफी जाकारियां आम नहीं हैं और वो खुद बहुत मामूली से सवालों जैसे विदेश में शिक्षा, या फिर लंदन में उनकी नौकरी में, के बार में कुछ बताने को तैयार नहीं हैं.

राहुल गांधी

राहुल गांधी की भूमिका को लेकर समाचारपत्रों में लेख.

राहुल गांधी पर लिखी गई पुस्तक में कहा गया है कि वो ग़रीबों के जीवन को बेहतर बनाना चाहते हैं, लेकिन उन्हें मालूम नहीं की उन्हें लक्ष्य को पूरा करने के लिए क्या करना चाहिए.

सलाहकार

लेख के मुताबिक़ राहुल गांधी की दिक्क़त उनकी सलाहकार मंडली भी है. विदेशों में तालीम हासिल किए इन लोगों का भारतीय राजनीति की सच्चाईयों से सामना नहीं हुआ है.

लेख के मुताबिक आरथी रामचंद्रन ने अपनी किताब में उत्तर प्रदेश चुनावों की भी समीक्षा की है जिसे कांग्रेस ने राहुल गांधी के नेतृत्व में लड़ा था लेकिन वो चौथे स्थान पर रही.

कहा गया है कि शायद अगर राहुल गांधी को और ज़िम्मेदारियां दीं जाए या वो खुद कोई पद ग्रहण करें तो हालात बदल सकते हैं, लेकिन वो इसके लिए तैयार नहीं दिखते.

इकोनॉमिस्ट का कहना है ज़रूरत इस बात की है कि कांग्रेस परिवार से परे सोचे, जिसकी उपयोगिता वैसे भी दनोंदिन कम होती जा रही है और उसे नीतियों और सिद्धांतों के आधार पर अपना पुनर्निमाण करने की जरूरत है.

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