क्या आप देना चाहेंगे पत्नी को पगार

  • 13 सितंबर 2012

आज के ज़माने में जहाँ पैसा कमाने वाली कामकाजी महिलाओं की संख्या बढ़ रही है वहीं आज भी भारतीय समाज मे ज़्यादातर महिलाएँ घर में रहकर गृहस्थी संभालती हैं. सीधे तौर पर तो गृहणियाँ या हाउज़वाइफ़ कोई आर्थिक योगदान नहीं करतीं लेकिन पूरा दिन घर-परिवार का ज़िम्मा संभालना भी कोई आसान काम नहीं है.

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक महिला और बाल कल्याण मंत्रालय में एक प्रस्ताव पर विचार चल रहा है कि गृहणियों को पति हर महीने वेतन दें. गृहणियों पर ज़िम्मेदारियों के बोझ और मासिक भत्ता दिए जाने के प्रस्ताव पर बीबीसी ने दो गृहणियों से बात की.

नूतन नारायण, गृहणी, दिल्ली

मैं दिल्ली में रहती हूँ. एमफिल किया है और लेक्चरर थी लेकिन परिवार के लिए मैंने काम छोड़ दिया. पहले तो मैं कभी गृहणी या हाउज़वाइफ शब्द का इस्तेमाल नहीं करती. मैं हमेशा होममेकर कहती हूँ क्योंकि हम घर को बनाते हैं और देखभाल करते हैं. पूरा घर हमारे ऊपर टिका हुआ है. मिसाल के तौर पर कुछ दिन पहले मेरी पीठ में फ्रैक्चर हो गया था. तब मैने देखा था कि पूरे घर में सबको कितनी ज़्यादा मुश्किल हुई. हाउज़वाइफ़ अगर बीमार हो जाए तो पूरे घर में मुसीबत आ जाती है. घर का खर्च चलाने की ज़िम्मेदारी भी हमारे ऊपर है. ज़्यादा खर्च हो जाए तो भी हमसे ही पूछा जाता है. लोग अकसर गृहणियों को कहते हैं कि अपना ध्यान क्यों नहीं रखते, मोटापा आ गया है. मैं यही पूछना चाहती हूँ कि समय कहाँ है अपना ध्यान रखने का. हमारा समय तो परिवार का ध्यान रखने में ही चला जाता है.

कारगार होगा प्रस्ताव?

मुझे नहीं लगता कि गृहणियों को हर महीने वेतन देने का प्रस्ताव कारगर है. ऐसा हुआ तो पति सबसे पहले यही कहेंगे कि वो परिवार चलाने के लिए खर्चा-पानी, कपड़ा, गहना सब दे तो रहे हैं तो फिर गृहणियों को अलग से वेतन देने की क्या ज़रूरत ?

मैं ये बात स्वीकार करती हूँ कि पति हर चीज़ का ध्यान रखते भी हैं. पर मुझे नहीं लगता कि पति पत्नियों को मेहनताना देने के लिए तैयार होंगे. वो कोई न कोई कारण ढूँढ ही लेंगे पैसे न देने का. अगर पत्नी कहेगी कि वो घर का इतना काम करती है तो पति कह देगा कि मत करो घर का काम, नौकर रख लो. लेकिन हर काम नौकरों के हवाले नहीं किया जा सकता. अगर मैं घर का काम नौकरों के हवाले छोड़ कर चली जाऊँ और कुछ गलत हो जाए तो सारा ज़िम्मा महिला के मत्थे ही आ जाएगा.

मेरे हिसाब से अगर ये क़ानूनी रूप से बाध्य हो भी गया कि पत्नी को हर महीने पैसे देने हैं तो इससे पति-पत्नी के रिश्ते में दरार आ सकती है. पर पति कभी हामी नहीं भरेंगे पैसे देने के लिए क्योंकि मानसिकता शुरु से ही वैसी है.

इंदु रानी, गृहणी, पटना

मैं पटना में एक मध्यम वर्ग परिवार में रहती हूँ. साधारण घर की महिलाएँ तो सारा दिन घर में काम करती रहती हैं. उन्हें फुर्सत भी नहीं होती कि बाहर जाएँ, अपने लिए समय निकालें या कभी घूम लें. इसलिए ये प्रस्ताव बिल्कुल ठीक है कि गृहणियों को हर महीने पति भत्ता दे ताकि वो उस पैसे को अपना समझें.

घर रहने वाली महिलाएँ जो भी काम करती हैं उसे आर्थिक नज़र से आंका ही नहीं जाता है. चूँकि वो पैसा कमाकर नहीं लाती हैं तो उनका इतना महत्व भी नहीं समझा जाता है. जबकि कामकाजी महिलाओं को घर के लोग ज़्यादा तरजीह देते हैं.

वैसे गृहणियों को पति से जो भी पैसा मिलता है वो घर परिवार पर खर्च देती है. लेकिन अगर उन्हें हर महीने तन्ख्वाह मिलेगी तो ये पैसा हाउज़वाइफ़ का अपना होगा. वो चाहें तो इसे निजी काम के लिए इस्तेमाल कर सकती हैं. तन्ख्वाह मिलने से महिला पर जवाबदेही ज़रुर आएगी लेकिन साथ में आत्मबल भी आएगा. ऐसा होने से महिला के अंदर स्वाभिमान भी जगता है.

हालांकि इस प्रस्ताव को घर-घर में सुचारू रूप से लागू करवाना आसान नहीं होगा. पति यही बोलेगा कि सारा खर्चा तो मैं ही देता हूँ तो अलग से पैसा देने का सवाल ही नहीं है.

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