मंटो की बेटी होने का मतलब

 सोमवार, 17 सितंबर, 2012 को 00:34 IST तक के समाचार
अपनी बेटियों के साथ मंटो

अक्सर ज़हन में आता है कि एक बड़े बाप की बेटी होना कैसा होता होगा? और अगर पिता सआदत हसन मंटो जैसा बड़ा लेखक हो तो?

मंटो कम उम्र में ही दुनिया से चले गए थे. तब उनकी बड़ी बेटी निगहत नौ साल, नुज़हत सात साल और नुसरत चार साल की थीं.

एक मौक़ा मिला कि ये सवाल मंटो की बेटियों से ही पूछ लिया जाए. मेरे सवाल पर उनका मायूस सा जवाब था कि उन्हें अपने पिता की कोई याद नहीं है. चेहरा तक नहीं.

ज़ाहिर है कि इस जवाब से मुझे भी मायूसी हुई, लेकिन जब उनसे पूछा कि उन्हें अपने पिता से सबसे क़ीमती तोहफ़ा क्या मिला, उनके जवाब ने इस मायूसी को दूर कर दिया.

उनकी बड़ी बेटी निगहत ने कहा कि उनके वालिद ने उनको 'मंटो' नाम दिया जो हर तोहफ़े से ज्य़ादा कीमती है.

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उनका कहना था कि इस नाम ने उनकी ज़िंदगी में पिता की कमी की भरपाई कुछ इस तरह से की है कि उनके लिए 'मंटो' का सशरीर उनके जीवन में मौजूद ना होना एक तरह से मायने नहीं रखता.

बात भारत-पाकिस्तान के हालातों पर भी हुई. वो मानती हैं कि सआदत हसन मंटो अगर आज होते तो क़तई ख़ुश नहीं होते.

निगहत ने कहा, ''इस वक्त दोनों मुल्क के बीच जो हालात हैं उनमें मेरे वालिद की लेखनी ना सिर्फ प्रासंगिक बल्कि और ज्य़ादा असरदार है. अगर आज वो ज़िंदा होते तो इन हालातों में बिल्कुल भी खुश नहीं होते और दोनों मुल्कों के बीच अमन चाहते.''

'सबसे बड़े लेखक'

दुनिया भर में मंटो की शताब्दी मनाई जा रही है. उनकी रचनाओं का कई भाषाओं में अनुवाद हो रहा है. इसे वे किस तरह से देखती हैं?

इस सवाल पर सबसे छोटी बेटी नुसरत कहती हैं, ''ये वक्त की बात है. समय बीतने के साथ मेरे पिता की अहमियत कम होने के बजाय बढ़ती जा रही है और अब इस बात में कोई संदेह नहीं रह गया है कि वो अपने समय के बड़े लेखकों में से एक थे.''

"मेरे पिता की चाहत सिर्फ इंसानियत की बुलंदी थी और उन्होंने कहा भी था कि मुल्कों का बंटवारा तो हो सकता है लेकिन 'अदब' का बंटवारा भला कोई कैसे कर सकता है?"

नुसरत, मंटो की छोटी बेटी

भारत में उनकी लोकप्रियता पर नुसरत कहती हैं, ''हिंदी के अलावा यहां की प्रांतीय भाषाओं में उनकी कहानियों का अनुवाद हो रहा है उससे उनकी साख और मज़बूत हो रही है. मेरे पिता की चाहत सिर्फ इंसानियत की बुलंदी थी और उन्होंने कहा भी था कि मुल्कों का बंटवारा तो हो सकता है लेकिन 'अदब' का बंटवारा भला कोई कैसे कर सकता है ? ''

ये एक धारणा है कि जब मंटो मुंबई में थे तो वे काफी खुशमिजाज़ इंसान हुआ करते थे लेकिन विभाजन के बाद पाकिस्तान जाने पर वे इस ग़म को भुला नहीं सके और इसका असर उनके काम पर भी पड़ा.

लेकिन मंटो की मंझली बेटी नुज़हत ने इस धारणा का खंडन करती हैं, ''उन्होंने जितनी भी बेहतरीन और अच्छी कहानियाँ लिखी हैं वो विभाजन के बाद पाकिस्तान जाकर ही लिखीं हैं और वहां रहते हुए वे काफी खुश और संतुष्ट रहे.''

अश्लीलता का आरोप

मंटो जब ज़िंदा थे तब उन्हें कई स्तरों पर विरोध झेलना पड़ा और उनकी रचनाओं पर अश्लीलता का आरोप भी लगा. आखिर मंटो की बेटियां जो खुद एक स्त्री हैं, वे जब स्त्रियों पर लिखी अपने पिता की कहानियां पढ़ती हैं, तो क्या सोचती हैं?

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बेटियाँ कहती हैं कि उनके पिता अगर ज़िंदा होते तो भारत और पाकिस्तान के बीच शांति चाहते

इस सवाल पर मंटो की सबसे छोटी बेटी नुसरत ने मंटो की कहानी 'सड़क के किनारे' का ज़िक्र करते हुए कहा, ''मुझे अभी तक समझ में ये नहीं आता है कि एक मर्द होने के नाते आदमी के छोड़ देने से अकेली पड़ी औरत की तकलीफ़ को वो कैसे इतनी बारीकी से समझ सके. उस कहानी को पढ़ कर मुझे ऐसा लगता है मानों उनके पुरुष देह के भीतर एक औरत की आत्मा समाई हुई थी जिसने ये सब कुछ खुद महसूस किया है.''

इस्मत चुगताई ने अपने एक संस्मरण में मंटो के जिन आर्थिक परेशानियों के बारे में लिखा है, उनकी बेटियाँ इसके बारे में जानती हैं.

उन्होंने बताया कि जब मंटो ने शादी की थी तब उनकी जेब में सिर्फ आठ आने पैसे थे और वे अमीर घराने से ताल्लुक रखने के बावजूद एक छोटी सी 'खोली' में रहा करते थे.

वो बताती हैं कि बाद में बंबई में ही हिंदी फिल्मों के लिए लिखते हुए उनकी तंगहाली का दौर खत्म हुआ और उनकी ज़िंदगी में संपन्नता आई.

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