बम को पेपर-वेट बनाने वाला पुलिसिया

 रविवार, 16 सितंबर, 2012 को 06:57 IST तक के समाचार
टेगार्ट

फ़लस्तीन में 1938 में अपनी कार से उतरते टेगार्ट.

अब सर चार्ल्स ऑगस्टस टेगार्ट जैसे पुलसिए नहीं होते. शायद इसलिए क्योंकि अब ऐसे ख़तरनाक लोगों की ज़रुरत ही नहीं पड़ती.

टेगार्ट आइरिश मूल के पुलिस अधिकारी थे जिनके जिम्मे भारत समेत दुनिया भर में फैले ब्रितानी साम्राज्य के झंडे यूनियन जैक की हिफ़ाज़त करना था.

टेगार्ट एक मुश्किल वक़्त में एक बेहद कठोर अधिकारी थे.

भारत में छह बार उनकी जान लेने की कोशिश की गई. और ख़तरे के बावजूद वो अपने बुल टैरियर कुत्ते को बोनट पर बिठा कर बिना छत वाली कार में घूमते रहते थे.

भारत के उग्रपंथी स्वंतत्रता सेनानी उनके घोर विरोधी थे.

बम का पेपर-वेट

किले का मुहाफ़िज़

  • सर चार्ल्स ऑगस्टस टेगार्ट (1881-1946) ने ट्रिनिटी कॉलेज डब्लिन से पढ़ाई करने के बाद 1901 में भारतीय पुलिस में नौकरी शुरू की.
  • कोलकाता पुलिस की स्पेशल ब्रांच में डिप्टी कमीश्नर पद पहुंचे.
  • बाद में वे भारतीय पुलिस में कमिश्नर के पद पर पहुंचे. 1931 में वे सैक्रेटरी ऑफ़ स्टेट की भारतीय परिषद के सदस्य बने
  • अरब विद्रोह को दबाने के लिए उन्हें फ़लस्तीनी इलाक़े में भेजा गया.
  • दूसरे विश्व युद्ध के दौरान उन्हें कालाबाज़ारी रोकने के अभियान का प्रमुख बनाया गया.

एक बार ऐसे ही कुछ युवकों ने एक व्यापारी को टेगार्ट समझकर गोली मार दी थी.

उनके बारे में कई दिलचस्प क़िस्से हैं. जैसे कि वो अपनी मेज़ पर निष्क्रिय बमों का पेपर-वेट की तरह इस्तेमाल करते थे.

एक दिन ग़ुस्से में आकर टेगार्ट ने ये पेपर-वेट अपने कमरे में ज़ोर से फेंक मारा और एक ज़ोरदार धमाका हुआ.

ज़ाहिर है बम को ठीक ढंग से निष्क्रिय नहीं किया गया था. सुनते हैं कि टेगार्ट इस क़िस्से को ख़ूब मज़े से सुनाते थे हांलाकि ये कहना मुश्किल है कि कमरे में मौजूद बाक़ी लोगों को ये विस्फोट कैसा लगा होगा.

टेगार्ट का जन्म अविभाजित आयरलैंड के लंडनडेरी में हुआ था. और उन्होंने अपना सारा जीवन इसे पक्का करने में लगा दिया कि अब ब्रितानी साम्राज्य के और टुकड़े ना हों.

लेकिन भारत में अपने कार्यकाल के दौरान टेगार्ट को एक शातिर पुलिसिया जासूस माना जाता था जिससे कई लोग नफ़रत करते थे.

टेगार्ट की साख

दरअसल टेगार्ट की साख भी भारत में बनी थी.

ब्रिटेन के अपने उपनिवेशों के साथ संबंध काफ़ी पेचीदा थे. ब्रितानी साम्राज्य के समर्थक सोचते थे कि उपनिवेशों में ब्रितानी शिक्षा-दीक्षा और प्रशासन से वहां के लोगों को फ़ायदा होगा.

लेकिन औपनिवेशिक व्यवस्था के केंद्र में व्यापार ही था. और इसलिए भारतीय उपमहाद्वीप पर मज़बूती से पकड़ बनाए रखना ब्रिटेन के हित में था और इसके लिए साम्राज्य ने सर चार्ल्स टेगार्ट जैसे लोगों की मदद ली.

उपनिवेश काल के अन्य साम्राज्यों की तरह ब्रिटेन भी अपने उपनिवेशों से बच्चों की तरह व्यवहार करता था.

मसलन अगर आप हमारा राज-पाठ स्वीकार करते हैं तो ठीक अगर नहीं तो आप संभावित उग्रपंथी हो सकते हैं और अगर आप संभावित उग्रपंथी हैं तो आपसे चार्ल्स टेगार्ट निपटेंगे.

थर्ड डिग्री

1934 में बंगाल के गवर्नर पर हमला हुआ था.

टेगार्ट के तौर-तरीके मौजूदा दौर में टिक नहीं पाएंगे.

वो पूछताछ के उन सब तरीकों में माहिर थे, आजकल पुलिसिया ज़बान में जिन्हें थर्ड डिग्री कहते हैं.

उनके उग्रपंथी भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों के साथ गोलीबारी की वारदातें होती रहती थीं और साथ ही उनकी जान पर सीधे हमले भी.

1930 के दशक मे कोलकाता में उग्रपंथी सेनानी काफ़ी सक्रिय थे. टेगार्ट इसी दौर में कोलकाता की पुलिस की स्पेशल ब्रांच में डिप्टी कमीश्नर बने. वैसे वे 1901 में पढ़ाई पूरी करने के बाद भारतीय पुलिस में भर्ती हो गए थे.

1931 में वे कमीश्नर बन गए. इस दौरान छह बार उन पर जानलेवा हमला हुआ.

भारत में अपने कारनामों में मशहूर होने के बाद टेगार्ट को फ़लस्तीनी इलाक़े में भेजा गया जहां उन्होंने कई छोटे-छोटे किले बनाए जो सीरिया और लेबनान से चरमपंथियों को मिलने वाले हथियारों की आपूर्ति को रोकने का काम करते थे.

इन किलों के अवशेष आज भी हैं.

टेगार्ट के जीवन और उनके भारत में कार्यकाल के बारे में जानकारी बीबीसी संवाददाता केविन कॉनली के लेख से ली गई है. इसमें टेगार्ट के फ़लस्तीनी इलाक़े के कार्यकाल की जानकारी नहीं ली गई है. क्लिक करें अंग्रेज़ी में पूरा लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.

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