बच्चों की मौत कितना झकझोरती है आपको?

  • 14 सितंबर 2012
Image caption संयुक्त राष्ट्र के आँकड़े बताते हैं कि भारत में हजारों बच्चे हर साल असमय मौत के मुँह में समा जाते हैं.

पूर्वी उत्तर प्रदेश में हर बरस सैकड़ों बच्चे दिमागी बुखार के शिकार हो जाते हैं. इस वक्त जब आप ये खबर पढ़ रहे हैं तब भी भारत के अलग अलग हिस्सों में छोटे छोटे बच्चे लगातार मौत के गाल में समा रहे हैं.

यूनीसेफ़ के ताज़ा आँकड़े बताते हैं कि पिछले पूरे साल हर एक मिनट में पाँच साल से कम उम्र के तीन बच्चे औसतन मरते रहे.

पर ये खबर भारत में वैसी हलचल क्यों पैदा नहीं करतीं जैसी हलचल मॉडल शर्लिन चोपड़ा का एक ट्वीट कर देता है?

लगातार मर रहे बच्चों की खबरें आखिर देश के मीडिया और राजनीतिक हलकों में बेचैनी क्यों पैदा नहीं कर पातीं?

यूनीसेफ कहता है कि असमय मरने वाले बच्चों की संख्या भारत में सबसे ज़्यादा है.

क्या ये खबर सचिन के खराब प्रदर्शन और उनके संन्यास लेने जितनी महत्वपूर्ण नहीं, या इसमें शर्लिन चोपड़ा के उस ट्वीट जितनी ताकत नहीं जिसमें उन्होंने कहा था कि उन्हें भारत रत्न मिलना चाहिए?

कई सवाल

यूनिसेफ़ की इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर घंटे 189 बच्चे मारे जाते हैं. यानी रोज़ाना 4,534 बच्चों की मौत हो रही है. शिशु मृत्यु-दर के मामले में भारत, नाइजीरिया, कॉंगो और पाकिस्तान जैसे देशों से भी पीछे है.

लेकिन इस खबर ने मीडिया और नेताओं के बीच उतनी हलचल नहीं मचाई जितनी पिछले दिनों टाइम मैग़जीन के उस लेख ने मचाई जिसमें प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को ‘अंडर-एचिवर’ कहा गया था.

बीबीसी हिंदी ने ये सवाल मीडिया और बच्चों के लिए काम करने वाले संगठनों के सामने रखे.

भुखमरी-कुपोषण और सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों पर लगातार काम करने वाले पत्रकार हरतोष सिंह बल कहते हैं कि विडम्बना ये है कि कुपोषण, भुखमरी और बच्चों की बदहाली जैसे मुद्दे अब हमारे लिए नए नहीं रहे.

हरतोष कहते हैं, ''ये किसी एक पत्रकार, मीडिया संस्थान या अखबार की समस्या नहीं ये समस्या है उस व्यवस्था की जिसमें हम जी रहे हैं. हम इन मुद्दों के आदी हो चुके हैं. मीडिया और आम लोग सिर्फ वही कहना और सुनना चाहते हैं जिसमें कुछ नया हो. जिनसे कोई विवाद जुड़ा हो.''

'असंवेदनशील है भारत'

यूनिसेफ़ की इस रिपोर्ट के मुताबिक साल 2011 में दुनियाभर में हुई पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मौतों में 50 फीसदी मौतें केवल भारत, नाईजीरिया और कॉंगो जेसे देशों में हुईं. इनमें से भी एक-तिहाई से ज़्यादा मौतें केवल नाइजीरिया और भारत में हुई हैं.

Image caption विश्लेषकों का मानना है कि भारत में बच्चों की समस्याओं के प्रति कोई गंभीर नहीं है.

बच्चों के अधिकारों और उनसे जुड़े मुद्दों पर काम करने वाली संस्था सेव द चिल्ड्रन से जुड़े डॉक्टर राजीव टंडन कहते हैं, "सच तो ये है कि भारत बच्चों के प्रति बेहद असंवेदनशील और गैर-ज़िम्मेदार है. बच्चों के साथ हर क्षेत्र में समस्या है, पोषण के क्षेत्र में, स्वास्थ्य के क्षेत्र में, शिक्षा के क्षेत्र में, श्रम-कानूनों के क्षेत्र में लेकिन हम तो आजतक यह भी तय नहीं कर पाए कि हमारे यहां बचपन की उम्र क्या है. पांच साल, 14 साल या 18 साल से नीचे."

यानी जिन नेताओं को चुनकर भारत की जनता संसद में भेजती है वो न सिर्फ इन खबरों को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं बल्कि इन अहम मुद्दों पर नीतियां बनाने को लेकर भी उनमें तत्परता की कमी दिखती है.

राजनीतिक व्यवस्था को लेकर उठे सवाल के जवाब में तृणमूल काँग्रेस के सांसद और संगीतकार कबीर सुमन कहते हैं, ''संसद में जो लोग मौजूद हैं वो अपने चुनावी टिकट, आपसी गठ-जोड़, अपनी निष्पक्ष छवि और राजनीति में इतने उलझे हैं कि उनके पास इन गंभीर मुद्दों पर सोचने का समय ही कहाँ है? कुछ लोग हैं जो इस मानसिकता से लड़ने की कोशिश करते हैं लेकिन उनकी संख्या कहीं दबकर रह जाती है.''

बड़ी खबर

पत्रकार हरतोष बल कहते हैं कि इस समस्या से निपटने के लिए मीडिया को खबर बनाने के मौके लगातार ढूंढने होंगे. इस तरह की रिपोर्ट और इनके आंकड़ों पर राज्य सरकारों को लगातार घेरना होगा और उनसे पूछना होगा कि साल दर साल उन्होंने इस पर क्या क़दम उठाए.

कुल मिलाकर यूनिसेफ की इस रिपोर्ट से बड़ी खबर ये है कि जिन मुद्दों पर मीडिया, सरकार और आम लोगों के बीच लगातार और सबसे बड़ी बहस होनी चाहिए वो मुद्दे खबरों के बीच खोते जा रहे हैं.

इन मुद्दों का तुरत-फुरत हल किसी के पास नहीं लेकिन ज़रूरी है कि ये मुद्दे लगातार खबर बनें और लंबी दूरी के इनके समाधानों पर बहस होती रहे.

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