हिंदी के लिए दोधारी तलवार सोशल नेटवर्किंग?

फेसबुक

आज की ग्लोबल दुनिया में सोशल नेटवर्किंग साइट हमारे जीवन का अहम हिस्सा बनते जा रहे हैं.

नौजवान युवक और युवतियां मनोरंजन और सामाजिक जुड़ाव के लिए अपना अच्छा ख़ासा समय इंटरनेट पर गुज़ारते हैं.

कोई रियल टाइम चैट कर रहा होता है तो कोई अपनी पसंदीदा फिल्म देख रहा होता है या फिर गेम खेल रहा होता है.

सोशल नेटवर्किंग की इस नई रोमांचक दुनिया ने लोगों के परिचय का संसार काफी विविधतापूर्ण बना दिया है.

आभासी दुनिया

आज के बच्चे कंप्यूटर और टैबलेट पर अपने मतलब की चीज़ें पढ़ते हैं, मोबाइल पर गाने सुनते हैं और गेम खेलते हैं. पढ़ने का स्पेस तुलनात्मक रूप से कम होता जा रहा है.

इस विषय को स्पष्ट करते हुए दो बेटियों के पिता वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव कहते हैं, “पढ़ने और किताबों से पहले जैसे टीवी ने अलग किया था, उतना ही और शायद संभावना में उससे भी ज़्यादा पढ़ने से अलग करने वाली और लोगों के ध्यान और समय को सोख लेने वाली ये सोशल नेटवर्किंग नाम की चिड़िया है. इसको बहुत गंभीरता से लिए जाने की ज़रूरत है.”

ये सच है कि सूचना क्रांति के इस दौर में दुनिया भर की ज्ञान-विज्ञान की किताबें इंटरनेट पर उपलब्ध हैं लेकिन पढ़ने की आदत कम होती जा रही है.

ऐसे में हिंदी भाषा और साहित्य का संसार इस डिजिटल दुनिया के साथ तालमेल कैसे बिठा सकता है, उसका सकारात्मक इस्तेमाल कर कैसे आगे बढ़ सकता है.

अपूर्व स्वाधीनता

Image caption आज का युवा फ़ेसबुक और ट्विटर पर ही अपना सुख-दुख बांटता है

वरिष्ठ आलोचक और साहित्यकार पुरुषोत्तम अग्रवाल इसे स्पष्ट करते हुए कहते हैं, “मुझे लगता है कि इंटरनेट हिंदी के लिए एक बहुत अच्छी घटना है. अब बहुत सारे साहित्य से जुड़े लोग और लेखक फेसबुक और ट्विटर पर सक्रिय हो रहे हैं. इंटरनेट, फ़ेसबुक, ब्लॉग जैसी चीजें एक धरातल पर व्यक्ति को अभूतपूर्व स्वाधीनता देती हैं.”

इसे और स्पष्ट करते हुए वो कहते हैं कि किसी की कोई कविता या कहानी अगर अखबार या पत्रिका में नहीं छपती है तो वो उसे अपने ब्लॉग या फेसबुक जैसे माध्यमों पर खुद छाप सकता है और उसे आसानी से अपने पाठक समुदाय तक पहुंचा सकता है. ये तकनीक का एक सकारात्मक इस्तेमाल है.

लेकिन ऐसा भी है कि लोग सोशल नेटवर्किंग साइट पर इस स्वाधीनता का ग़लत इस्तेमाल भी करते हैं, एक-दूसरे पर सार्वजनिक रूप से आरोप-प्रत्यारोप करते हैं.

इसे और स्पष्ट करते हुए हिंदी के साहित्यकार बद्री नारायण कहते हैं, “आजकल लोग इन सोशल नेटवर्किंग साइट्ट पर गाली में बात करते हैं. कोई किसी के बारे में कुछ भी लिख सकता है. ऐसी समस्या प्रिंट साहित्य में नहीं थी. कहने का तात्पर्य ये कि इस नई तकनीक का हिंदी को बिगाड़ने और बनाने दोनों ही रूपों में इस्तेमाल हो सकता है. इसलिए इंटरनेट पर सक्रिय हिंदी जगत को बहुत ज़िम्मेदार होने की ज़रूरत है.”

हिंदी की कमियां

सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर हिंदी की दूसरी समस्या लिपि से जुड़ी हुई है. ज्यादातर गैर हिंदी भाषी लोग हिंदी की लिपि नहीं जानते इसलिए इंटरनेट पर मौजूद साहित्य वो चाहें भी तो नहीं पढ़ सकते.

इस समस्या के बारे में फ़ेसबुक पर सक्रिय हिंदी साहित्यकार उदय प्रकाश कहते हैं, “हर कोई देवनागरी नहीं पढ़ सकता. हिंदी बोलने और समझने वाले लोग बहुत बड़ी संख्या में हैं लेकिन लिपि का ज्ञान नहीं होने की वजह से वो हिंदी का साहित्य नहीं पढ़ पाते. हिंदी का जो यूनीकोड है उसने अप्रत्यक्ष रूप से अंग्रेज़ी को ही आगे बढ़ाया है. हमें हिंदी में एकरूपता लानी होगी, लेकिन समस्या ये है कि हम हिंदियों के संसार में जी रहे हैं. भाषाई एकरूपता नहीं है. इस डिजिटल दुनिया में आगे बढ़ने के लिए हमें लिपि और भाषा की एकरुपता हासिल करनी होगी तभी हिंदी का भला हो सकता है.”

ये सच है कि हिंदी के कई रूप हैं. अलग-अलग फॉन्ट की भी समस्या है. मोबाइल पर हिंदी का इस्तेमाल आसान नहीं और डिजिटल डिवाइस बनाने वाली ज्यादातर कंपनियां हिंदी को ध्यान में रखकर सॉफ्टवेयर डिज़ाइन नहीं करतीं. ऐसे में लेखक और पाठक दोनों ही के लिए चुनौती बढ़ जाती है और हिंदी में ई बुक्स की कल्पना अभी अपने आरंभिक काल में ही है.

अंग्रेज़ी से दोस्ती

Image caption हिंदी के रचनाकार ट्विटर और फ़ेसबुक का सही इस्तेमाल कर एक बड़ा पाठक वर्ग तैयार कर सकते हैं

एक और समस्या प्रकाशक से जुड़ी है. हिंदी का प्रकाशक अभी भी काफी पीछे चल रहा है. अंग्रेज़ी में जिस तरह किताब आने से पहले प्रकाशक डिजिटल माध्यमों में उसका ढिंढोरा पीट देते हैं, हिंदी का प्रकाशक अभी ऐसा नहीं कर पा रहा है. पाठकों को नई पु्स्तकों की जानकारी तक नहीं मिल पाती. ऐसे में फेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल नेटवर्किंग साइट लेखकों के लिए काफ़ी मददगार साबित हो सकते हैं.

ये तो हुई तकनीक से तालमेल बिठाने की बात लेकिन एक और मसला रचना के स्तर पर भी है.

हिंदी का लेखक अंग्रेज़ी से दूरी बनाकर चलता है. उसे लगता है कि अंग्रेज़ी के विरोध में ही हिंदी की सार्थकता है.

इसे स्पष्ट करते हुए पुरुषोत्तम अग्रवाल कहते हैं, “अंग्रेज़ी जानने और ज़रूरत के अनुसार उसका इस्तेमाल करने का अर्थ हिंदी की अवहेलना या हिंदी की उपेक्षा नहीं है. हिंदी से प्रेम करने का अर्थ अंग्रेज़ी के ख़िलाफ़ खड्गहस्त बने रहना नहीं है. जब तक हिंदी का लेखक और पाठक ये नहीं समझ लेते हिंदी का भला नहीं हो सकता.”

भविष्य की चुनौती

वो आगे कहते हैं कि तकनीक से दूरी और बाज़ार से आतंकित होने की ज़रूरत नहीं है. हिंदी आज भी दुनिया की सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं में तीसरे नंबर पर है.

लेकिन इस भाषा में ज्ञान-विज्ञान का भविष्य चिंता जगाता है. जिस भाषा में साहित्येत्तर विषयों का गहरा शब्दकोश और गहरी चिंतन परंपरा नहीं होगी, उस भाषा में श्रेष्ठ साहित्य भी संभव नहीं होगा.

हिंदी को कंटेंट के स्तर पर, तकनीक के स्तर पर और बाज़ार के स्तर पर इन चुनौतियों का सामना करना ही होगा तभी उसका भविष्य उज्ज्वल होगा और डिजिटल दुनिया में जी रही वर्तमान पीढ़ी उसे स्वीकार कर सकेगी, उसकी समृद्ध परंपरा को आगे बढ़ा सकेगी.

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