भारतीय अरबपति भी खोल रहे हैं बटुए

 बुधवार, 19 सितंबर, 2012 को 02:42 IST तक के समाचार
भारतीयों में परोपकार की भावना

ओम क्रिएशंस की डॉ खन्ना कहती हैं कि टाटा समूह की मदद के बिना ये काम करना मुमकिन नहीं था.

आंकड़ों के अनुसार पूरी दुनिया में रहने वाले अरबपतियों का चार प्रतिशत भारत में रहता है, लेकिन यहां रहने वाले अमीरों की अपनी कमाई के अनुसार परोपकार नहीं करने के लिए आलोचना होती रहती है.

लेकिन अब ये हालात बदल रहे हैं और ज्य़ादा से ज़्यादा लोग दूसरों की मदद के लिए आगे आ रहे हैं.

निकिता ऑटिस्टिक मरीज़ है लेकिन वो काफी अच्छी चित्रकारी करती है. वो आगे भी चित्रकारी कर सके इसके लिए ओम क्रिएशंस ट्रस्ट नाम की संस्था ने उउनकी मदद की.

ओम क्रिएशंस ऐसी 70 महिलाओं की मदद करता है जिन्हें कोई ना कोई बीमारी है. इन महिलाओं को घर की साज-सज्जा और खाने का सामान बनाने की ट्रेनिंग दी जाती है.

ओम क्रिएशंस को टाटा समूह आर्थिक मदद देता है. संस्था की विशेष प्रशिक्षक और संस्थापक डॉ राधिका खन्ना कहती हैं, ''हम टाटा समूह की मदद के बगैर ये नहीं कर सकते थे, हमारे पास अच्छे सुझाव थे लेकिन पैसा नहीं था.''

कम कमाते हैं भारतीय

अंतरराष्ट्रीय पत्रिका फोर्ब्स के अनुसार अगर दुनिया भर में अमीरों की आबादी की बात की जाए तो भारत चौथे नंबर पर आता है.

इसके बावजूद जब बात परोपकार की आती है तो भारत 153 देशों की सूची में 91 पायदान है जो पिछले साल तक 134वां स्थान था.

गोदरेज समूह के मालिक अदी गोदरेज के अनुसार, ''विकसित देशों के मुकाबले भारतीयों की आय कम होती है इसलिए यहां के लोग उनके जितना दान नहीं कर सकते. इसके बावजूद दूसरे विकासशील देशों की तुलना में यहां के लोग ज्य़ादा परोपकारी हैं.''

"विकसित देशों के मुकाबले भारतीयों की आय कम होती है इसलिए यहां के लोग उनके जितना दान नहीं कर सकते. इसके बावजूद दूसरे विकासशील देशों की तुलना में यहां के लोग ज्य़ादा परोपकारी हैं."

अदी गोदरेज, गोदरेज समूह के मालिक

कुछ लोगों का मानना है कि एक आम भारतीय दूसरों को मदद पहुंचाने के बजाय धार्मिक कार्यों के लिए ज्य़ादा दान देता है.

मुंबई सिद्धिविनायक मंदिर ट्रस्ट को हर साल एक करोड़ दस लाख डॉलर से ज्य़ादा का दान मिलता है. मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष सुभाष मायेकर कहते हैं, ''भारत में अगर आप किसी से स्कूल या अस्पताल बनाने के लिए मदद करने को कहेंगे तो शायद ही वो तैयार हो लेकिन अगर आप मंदिर की बात कहेंगे हर कोई कुछ ना कुछ मदद कर ही देगा.''

इसलिए अब बदले में इन धार्मिक संस्थानों के ट्रस्ट ग़रीबों, ज़रुरतमंदों और हादसे के शिकार लोगों की मदद करता है.

सोच में बदलाव

ओम क्रिएशंस की डॉक्टर खन्ना के अनुसार अब लोगों की सोच में भी फर्क आया है. जिन लोगों की आर्थिक स्थिती बेहतर हुई है वे ज़रुरतमंदों की मदद करना चाहते हैं.

पहले जहां लोग अपनी वसीयत में सबकुछ अपने बच्चों के लिए छोड़ जाते थे वे भी अब दान-पुण्य करने लगे हैं.

सबसे प्रभावशाली वो भारतीय युवा हैं जिनके भीतर सामाजिक जागरुकता और ज़िम्मेवारी की भावना पैदा हुई है. कंसलटेंसी बेन की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 30 से कम साल के युवा परोपकार के क्षेत्र में आगे बढ़ रहे हैं.

मुंबई में 6 युवाओं का एक समूह 'हमारा फुटपाथ' नाम से एक संस्था चलाता है जो गरीब बच्चों को पढ़ाने का काम करता है.

भारतीयों में परोपकार की भावना

अनुजा गरीब बच्चों को पढ़ाती हैं क्योंकि वे अपने देश में बदलाव लाना चाहती हैं.

समूह की सदस्य अनुजा संघवी कहती है, ''हम हमेशा शिकायत करते हैं कि हमारे देश में क्या अच्छा नहीं हो रहा है. लेकिन अगर हम बदलाव चाहते हैं तो हमें आगे भी बढ़ना होगा. हम हमेशा दूसरों पर निर्भर नहीं रह सकते.''

उम्मीद है कि भविष्य में भारतीयों में समाज को कुछ वापस देने की सोच और प्रबल होगी.

विप्रो के चेयरमैन अज़ीम प्रेमजी और एचसीएल टेक्नोलॉजिस के संस्थापक शिव नादर ने वादा किया है कि वे अपनी संपत्ति का एक हिस्सा दान में देंगे. पिछले कुछ सालों से सरकार भी सोच रही है वे इन कंपनियों के लिए ये अनिवार्य करें कि वे अपने मुनाफे का दो प्रतिशत सामाजिक दायित्वों को निभाने में खर्चें.

और जिस तरह से भारतीय मध्यवर्ग की आय बढ़ रही है वे भी परोपकार के क्षेत्र में अपनी पांव जमाने के लिए तैयार है.

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