'पैसे पेड़ों पर नहीं लगते......याद है 1991'

 शनिवार, 22 सितंबर, 2012 को 09:24 IST तक के समाचार
मनमोहन सिंह

मनमोहन सिंह लगातार विपक्षी दलों के निशाने पर हैं

भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में लोगों का विश्वास खत्म न हो, इसीलिए उन्हें कड़े कदम उठाने पड़े हैं.

प्रधानमंत्री ने तृणमूल कांग्रेस के यूपीए सरकार से समर्थन वापस लेने के बाद राष्ट्र को संबोधित करते हुए ये विचार व्यक्त किए हैं. तृणमूल कांग्रेस ने खुदरा क्षेत्र में 51 प्रतिशत विदेशी पूँजी निवेश की इजाजत देने और डीजल के दामों में वृद्धि के सरकार के फैसले के विरोध में ये कदम उठाया है.

मुश्किल फैसला

"पैसा पेड़ों पर तो लगता नहीं...यदि हम कड़े कदम न उठाते तो वित्तीय घाटा, सरकारी खर्चा खासा बढ़ जाता. निवेशकों का विश्वास भारत में कम हो जाता. वे कतराने लगते और ब्याज की दरें बढ़ जाती...बेरोजगारी भी बढ़ जाती...दुनिया उन पर रहम नहीं करती जो अपनी मुश्किलों को खुद हल नहीं करते"

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राष्ट्र को अपने संबोधन में कहा, "आपको जानने का हक है कि हमने हाल में कुछ अहम फैसले क्यों किए हैं. हमारी सरकार को दो बार आम आदमी का हित देखने के लिए ही चुना गया. हमें सुनिश्चित करना है अर्थव्यवस्था का तेजी से विकास हो और नौजवानों के लिए रोजगार मिले और शिक्षा, स्वास्थ्य क्षेत्रों में निवेश हो."

'1991 में कोई कर्ज देने को तैयार न था'

मनमोहन सिंह का कहना था कि ये विश्व अर्थव्यस्था के लिए मुश्किल समय है और अमरीका, यूरोप, यहाँ तक कि चीन को भी आर्थिक मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है.

प्रदर्शन

गुरुवार को विपक्षी दलों ने डीजल, एलपीजी और खुदरा व्यापार पर सरकार के फैसलों के खिलाफ हड़ताल की थी

उनका कहना था, "हम वैश्विक अर्थव्यस्था में आई मुश्किलों का सामना करने में काफी हद तक कामयाब रहे हैं. हमें वो फैसले करने थे जिनसे विकास में आई मंदी को खत्म किया जा सके."

प्रधानमंत्री ने कहा, "हाल में डीजल की कीमत में वृद्धि और एलपीजी पर लगाई गई सीमा का मुख्य कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ी तेल के पदार्थों की कीमते हैं. पिछले साल सब्सिडी 1 लाख 40 हजार करोड़ थी जो बढ़कर दो लाख करोड़ हो जाती."

मनमोहन सिंह ने जोर देते हुए कहा, "पैसा पेड़ों पर तो लगता नहीं...यदि हम कड़े कदम न उठाते तो वित्तीय घाटा, सरकारी खर्चा खासा बढ़ जाता. निवेशकों का विश्वास भारत में कम हो जाता. वे कतराने लगते और ब्याज की दरें बढ़ जाती...बेरोजगारी भी बढ़ जाती..

खुदरा व्यापार पर

"किसी भी राज्य को हक नहीं है कि वो दूसरे राज्य को नौजवानों, किसानों और उपभोक्ताओं को बेहतर जिंदगी तलाशने से रोकें"

मनमोहन सिंह

मनमोहन सिंह ने 1991 के विदेशी मुद्रा संकट का जिक्र करते हुए कहा, "पिछली बार कोई विदेशी निवेशक हमें कर्ज देने को तैयार नहीं था. इससे पहले कि लोगों का भरोसा खत्म हो जाए हमें कदम उठाने पड़े...मुझे याद है 1991 में क्या हुआ था..दुनिया उन पर रहम नहीं करती जो अपनी मुश्किलों को खुद हल नहीं करते."

उनका कहना था कि डीजल बड़ी गाड़ियों वाले इस्तेमाल करते हैं, तो क्या इसका खामियाजा आम आदमी भुगते?

'बहकावे में न आएँ'

खुदरा व्यापार में 51 प्रतिशत विदेशी पूँजी निवेश की इजाजत के फैसले पर मनमोहन सिंह ने कहा, "राज्य सरकारों को छूट है कि वो खुद फैसला करें कि उनके राज्य में विदेशी निवेश आ सकता है या नहीं."

लेकिन उन्होंने साथ ही कहा कि किसी भी राज्य को हक नहीं है कि वो दूसरे राज्य को नौजवानों, किसानों और उपभोक्ताओं को बेहतर जिंदगी तलाशने से रोकें.

अंत में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देश की जनता से अपील की - "बड़े कदम उठाने का समय आ गया है. मुझे आपके विश्वास की जरूरत है, आप उनके बहकावे में न आएँ जो आपको गलत जानकारी देते हैं."

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