क्या नक्सली हिंसा को राजनीतिक माना जाए?

  • 24 सितंबर 2012
नक्सली
Image caption माओवादी गतिविधियों में शामिल होने या फिर विचारधारा के नजदीक होने के आरोप में कई लोग जेल में हैं

पश्चिम बंगाल की एक अदालत के नक्सलियों से जुड़े एक फैसले ने नई बहस को जन्म दे दिया है. अदालत ने कहा है कि नक्सल बंदियों को राजनीतिक कैदियों का दर्जा दिया जाए. इस फैसले से सवाल उठ रहे हैं कि राजनीतिक और चरमपंथी गतिविधियों के बीच की सीमा रेखा को कैसे निर्धारित किया जाए?

शुक्रवार को एक स्थानीय अदालत ने नौ नक्सलियों को राजनीतिक बंदी करार दिया था. इससे पहले अगस्त में कलकत्ता उच्च न्यायालय ने भी ऐसा ही फैसला किया था.

रिपोर्टों के अनुसार इन नक्सलियों को राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) ने गैर-कानूनी हथियार बनाने के लिए गिरफ्तार किया था और एनआईए अदालत के फैसले को चुनौती देने की तैयारी में है.

एक राजनीतिक बंदी को जेल के अंदर कुर्सी, मेज, लोहे की चारपाई, गद्दा, तकिया, मच्छरदानी, कंबल, शीशा, कंघी, टूथब्रश, टूथपेस्ट, पंखा, टेबल-लैंप, साबुन, नारियल का तेल, खाना बनाने के बर्तन, अखबार, किताबें और लिखने का सामान दिया जाता है.

इसके अलावा राजनीतिक बंदियों को दोस्तों और रिश्तेदारों के घरों से खाना मंगाने की भी इजाज़त होती है.

उच्च-न्यायालय ने अपने आदेश में इन सुविधाओं को मानवाधिकारों का हिस्सा बताया था.

माओवादी गतिविधियों में शामिल होने या फिर विचारधारा के नजदीक होने के आरोप में कई लोग जेल में हैं.

इससे पहले बिनायक सेन, सोनी सोरी और सीमा आजाद जैसे लोगों को पकड़े जाने पर भी सवाल उठे थे कि क्या एक अलग राजनीतिक विचारधारा रखना आपको मुजरिम बना देता है? और अगर आपकी राजनीतिक सोच अलग है तो आपको राजनीतिक बंदी क्यों ना माना जाए?

लेकिन ऐसे लोगों का क्या जिन्होंने अलग राजनीतिक विचारधारा की अभिव्यक्ति के लिए हिंसा का सहारा लिया? इस सवाल का जवाब आसान नहीं है खासकर उस वक्त जब एक हलके में प्रशासन को भी बेहद निर्दयी माना जाता है.

माओवादियों से संबंध रखने पर ढाई साल जेल में रहीं सीमा आजाद कहती हैं कि अदालत का फैसला माओवादियों को राजनीतिक विरोधियों के तौर पर स्थापित करता है.

वो कहती हैं, “कोई भी व्यक्ति राज्य की राजनीतिक सोच का विरोधी हो सकता है और इस सूची में माओवादियों को ही नहीं, अलगाववादियों को भी शामिल करना चाहिए.”

कोलकाता में कथित नक्सल नेताओं के वकील शुभाशीष रॉय के मुताबिक अदालत के फैसले से ये बात स्थापित हो गई है कि प्रतिबंधित संगठन सीपीआई (माओवादी) या किसी दूसरे संगठन से संबंध रखने वाले हर व्यक्ति को राजनीतिक कैदी माना जाएगा.

लक्ष्मण-रेखा

लेकिन सवाल ये है कि इस मामले में लक्ष्मण रेखा कहाँ खींची जाए? क्या अपने राजनीतिक मकसद के लिए हथियार उठाना जायज़ है? क्या नक्सली अपनी बात अहिंसात्मक तरीके से नहीं रख सकते?

शुभाशीष रॉय कहते हैं कि आज के माहौल में अगर नक्सली हथियार उठाते हैं तो ये जायज़ है और “इसमें कोई समस्या नहीं है.”

ये पूछे जाने पर कि क्या सुरक्षा बलों को मार देना भी राजनीतिक मक़सद के दायरे में आता है, रॉय कहते हैं, “कभी-कभी मृत्यु हो जाती है और उसे हत्या नहीं कहना चाहिए.”

Image caption नक्सली हमलों में कई सुरक्षाबल मारे जा चुके हैं

वो कहते हैं, “मैं हिंसा के खिलाफ हूँ लेकिन पुलिस वालों की गोलीबारी में भी लोग मरते हैं. इसी तरह लोगों की हिंसा में सुरक्षा बल मरते हैं. ये खेदजनक है, लेकिन कोई भी इस बारे में सीमा रेखा नहीं खींच सकता.”

उधर नक्सल मामलों के जानकार और उत्तर प्रदेश पुलिस के पूर्व प्रमुख प्रकाश सिंह कहते हैं कि माओवादियों में फर्क करने की जरूरत है.

प्रकाश सिंह के अनुसार, “अगर घर पर बैठा कोई व्यक्ति माओवादी विचारधारा का अनुयायी है और उसका समर्थन करता है, तो उसे राजनीतिक बंदी माना जा सकता है लेकिन अगर कोई नक्सली हिंसा करता है तो उसे राजनीतिक बंदी बताना गलत है और ऐसे आदेश को बड़ी अदालत में चुनौती दी जानी चाहिए.”

लेकिन सीमा आजाद के अनुसार ये जानना जरूरी है कि हिंसा की शुरुआत किसने की.

वो कहती हैं, “किसी आदिवासी इलाके को उजाड़ने के लिए अगर आप ताकत का इस्तेमाल कर रहे हैं, तो क्या वहाँ का आदिवासी तीर-धनुष भी नहीं उठा सकता? अगर आप माओवादी हिंसा को गलत ठहराएँगे तो जो पुलिस कर रही है वो क्या है?

सीमा के अनुसार, “कई लोगों को माओवादी समर्थक बताकर जेलों में बंद किया जा रहा है. ये फैसला माओवादियों को राजनीतिक विरोधियों के तौर पर स्थापित करता है. इस मामले में कई ऐसे लोगों को फंसाया जा रहा है जो दोषी नहीं हैं. अदालत के फैसले से ऐसी गिरफ्तारियों को लेकर बहस बढ़ेगी.”

ऐसे भी कई लोग हैं जो सीमा आजाद के तर्कों से सहमत नहीं हैं. उनका कहना है कि ये कैसे निर्धारित हो कि हिंसा के इस्तेमाल का कारण राजनीतिक ही था. क्या हिंसा में शामिल किसी व्यक्ति को उसके कहने मात्र से राजनीतिक बंदी मान लिया जाना सही है?

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