अस्सी में कितने 'फिट' मनमोहन

 बुधवार, 26 सितंबर, 2012 को 07:40 IST तक के समाचार

राम चंद्र गुहा

मनमोहन सिंह आठ सालों से भारत के प्रधानमंत्री हैं

अप्रैल 1958 में जवाहरलाल नेहरू पहाड़ों पर छुट्टी मनाने गए ताकि वह इस बात पर विचार कर सकें कि आने वाले दिनों में वे क्या करने वाले हैं.

प्रधानमंत्री के रूप में दस सालों तक काम करने के बाद वे चाहते थे कि वह अब कुछ समय बिना किसी जिम्मेदारी के एक आम नागरिक के तौर पर बिताएं.

उनके ज़हन में ख़्याल आया कि क्या ही अच्छा हो कि वह अपने पद से इस्तीफ़ा दे दें, पुराने दोस्तों के बीच फिर से उठे-बैठें, किताबों को भी अपना वक्त दे पाएं और देश के अलग-अलग हिस्सों में हौले-हौले यात्राएं करें.

लेकिन अंतत: नेहरू को अपने फैसले पर दोबारा विचार करने और अपने पद पर बने रहने के लिए मना लिया गया.

अगर नेहरू ने 1958 में इस्तीफ़ा दे दिया होता तो उन्हें न सिर्फ़ भारत के सर्वश्रेष्ठ प्रधानमंत्री के तौर पर याद किया जाता बल्कि उनकी गिनती आधुनिक विश्व के महान राजनेताओं में भी होती.

तमाम विरोध और संशयों के बावजूद भारत में बहुदलीय प्रजातंत्र के फलने फूलने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. प्रगतिशील और स्वतंत्र आर्थिक और विदेश नीतियाँ उन्हीं की देन थी. उन्होंने ही यह सुनिश्चित किया कि भारत 'हिंदू पाकिस्तान' नहीं होगा.

समस्याओं का अंबार

लेकिन 1958 के बाद से ही नेहरू की समस्याएं शुरू हुई. उनकी आंखों के सामने ही पहला बड़ा भ्रष्टाचार( मूंदड़ा मामला) सामने आया और फिर केरल की चुनी हुई सरकार की चौंकाने वाली बर्ख़ास्तगी को भी उनकी मौन स्वीकृति मिली.

चीन के साथ सीमा पर झड़पें शुरू हुईं जिसकी परिणति 1962 में चीन के हाथों भारत की शर्मनाक हार के साथ हुई. जब नेहरू का मई 1964 में देहावसान हुआ तो उनकी प्रतिष्ठा काफी हद तक तार-तार हो चुकी थी.

मनमोहन सिंह नेहरू नहीं हैं फिर भी उनके और नेहरू के कार्यकाल में कुछ समानताएं ज़रूर दिखाई देती हैं. उनके शुभचिंतक उम्मीद कर रहे थे कि वह 2009 में अवकाश ले लेंगे और शायद यह ख़्याल उनके ज़हन में भी आया होगा.

गुजरात दंगों और ‘इंडिया शाइनिंग’ की भद्दी मुहिम के बाद देशवासियों को एक सुरक्षित, स्थिर और एक शालीन हाथ की ज़रूरत थी. मनमोहन सिंह और उनकी सरकार इस कसौटी पर खरी उतरी.

उनके कार्यकाल के दौरान धार्मिक उन्माद शांत हुआ, सरकार का कामकाज पारदर्शी हुआ ( सूचना का अधिकार कानून के जरिए) और ग्रामीण गरीबों के लिए कई कल्याणकारी योजनाएं (राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना) शुरू की गईं.

सत्ता का लालच

उन्होंने अपना काम कर दिया था और अब समय आ पहुँचा था कि किसी युवा व्यक्ति (या महिला) के लिए जगह छोड़ी जाए.

अगर मनमोहन सिंह 2009 में रिटायर हो गए होते तो इतिहास उन्हें भारत के आर्थिक उदारीकरण के दो निर्माताओं (दूसरे नरसिम्हा राव) और एक औसत दर्जे के सफल प्रधानमंत्री के तौर पर तो जरूर याद करता.

लेकिन वह सत्ता के लालच पर काबू नहीं कर पाए और अपने पद पर बने रहे. अपने दूसरे कार्यकाल में वे निर्विवाद रूप से भारत के इतिहास की अब तक की सबसे भ़ष्ट सरकार के मुखिया बने रहे.

(भारत के पूर्व विदेश मंत्री शशि थरूर मानते हैं कि मनमोहन सिंह के कार्यकाल में कुछ कमियाँ हैं लेकिन वो ऐसी नहीं हैं जिन्हें सुधारा नहीं जा सकता. वो मानते हैं कि मनमोहन सिंह का कार्यकाल उलब्धियों से भरा हुआ है. शशि थरुर का लेख पढ़ने के लिए इसी पन्ने के ऊपरी हिस्से में दूसरा टैब दबाएँ या या क्लिक करें यहाँ क्लिक करें.)

घोटालों की एक लंबी कड़ी. चाहे वो राष्ट्रमंडल खेल हों, 2 जी स्पेक्ट्रम हो या फिर कोयला घोटाला हो, वह न तो पहचान पाए और न ही उसे रोक पाए. इनके सामने आते ही तुरंत कार्रवाई न कर उन्होंने न सिर्फ अपनी पार्टी बल्कि स्वयं अपनी छवि को भी इतना नुकसान पहुँचा दिया जिसकी भरपाई नहीं की जा सकती.

मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल में सरकारी खजाने की बड़े पैमाने पर लूट हुई है. 90 के दशक में, उदारीकरण के पहले दौर में उन्होंने रचनात्मक सोच वाले उद्यमियों की मदद की थी लेकिन उनके प्रधानमंत्री रहते सिर्फ संपर्कों वाले यार दोस्त ही फल फूल सके हैं.

'सबसे भ्रष्ट सरकार के मुखिया'

भ्रष्टाचार के अलावा यूपीए के दूसरे कार्यकाल में उदासीनता और अक्षमता का भी बोलबाला रहा है. आरटीआई और रोज़गार गारंटी योजना जैसे कल्पनाशील कदमों का अभाव साफ दिखाई देता है.

2004 में जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने तो यह उम्मीद लगाई गई थी कि वह प्रशासन को आधुनिक बनाएंगे, योग्य पेशेवर लोगों को सार्वजनिक जीवन में लाएंगे और नौकरशाही और पुलिस अधिकारियों को राजनीतिक हस्तक्षेप से बचाएंगे.

लेकिन उन्होंने इनमें से कुछ भी नहीं किया. बल्कि उन्होंने संरक्षण की राजनीति को छेड़ने तक की इच्छा नहीं दिखाई, जिसकी वजह से भारतीय राज्य की अपने नागरिकों को संतोषजनक शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं और सार्वजनिक सुरक्षा देने की क्षमता बुरी तरह से प्रभावित हुई है.

धीमे, कमजोर, लकीर के फ़कीर और सबसे बढ़कर भ्रष्ट- यह शब्द हैं जिनकी वजह से मनमोहन सिंह और उनकी सरकार को याद किया जाएगा. ऐसा संभव था कि यह शब्द उनके लिए नहीं कहे जाते.

लेकिन भारत का यह उदाहरण पूरी दुनिया में होने वाली इस तरह की घटनाओं की एक बानगी पेश करता है जिसमें कई मामले ऐसे हैं जहां एक समय में समर्थ समझे जाने वाले राजनीतिज्ञ जब अपने पद पर लंबे समय तक बने रहते हैं तो उनकी प्रतिष्ठा धीरे धीरे समाप्त होती चली जाती है.

शायद यही वजह है कि अमरीका ने अपने राष्ट्रपति को दो से अधिक कार्यकाल देने पर पाबंदी लगाई हुई है. ब्रिटेन में भी मारग्रेट थैचर और टोनी ब्लेयर के दूसरे कार्यकाल के दौरान जब उनकी पार्टी की लोकप्रियता घटने लगी तो उनकी जगह दूसरे लोगों को उनके पद पर बैठाया गया.

जाने का समय

अगस्त 2011 में 2जी के बाद, लेकिन कोयला घोटाले से पहले मैंने हिंदुस्तान टाइम्स में एक लेख लिख कर प्रधानमंत्री से इस्तीफ़ा देने की अपील की थी. उनकी उदासीनता, आयु और स्वतंत्र राजनीतिक निर्णय न लेने की क्षमता साफ देखी जा सकती थी.

मैंने लिखा था, ''अब समय आ पहुँचा है कि मनमोहन सिंह एक युवा व्यक्ति या महिला के लिए जगह बनाएं, जिसके पास ज्यादा राजनीतिक हिम्मत हो और वह राज्य सभा का सदस्य न होकर लोक सभा का सदस्य हो. जैसे जैसे दिन गुजर रहे हैं उनकी इज़्जत कम होती चली जा रही है और सबसे चिंताजनक बात है कि खुद संवैधानिक प्रजातंत्र की विश्वसनीयता भी कम होती जा रही है.''

जब मैंने यह लिखा था तो मुझे पता था कि भारत ब्रिटेन नहीं है. थैचर और ब्लेयर की तरह इस बात की कोई संभावना नहीं थी कि डरपोक और लकीर की फ़कीर कांग्रेस पार्टी, मनमोहन सिंह से त्यागपत्र देने के लिए कहेगी.

इसलिए मेरी अपील प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के विवेक और बुद्धि को संबोधित थी क्योंकि वह स्वयं पढ़े लिखे बुद्धिजीती हैं और उन्हें पता है कि जाने का समय आ गया है.

महान क्रिकेट खिलाड़ी विजय मर्चेंट से जब पूछा गया कि अपनी आखिरी पारी में शतक लगाने के बाद भी उन्होंने रिटायर होने का फैसला क्यों किया तो उन्होंने जवाब दिया, ‘मैं उस समय जाना चाहता था जब लोग पूछें 'क्यों' न कि 'क्यों नहीं' ?’

यह सबक बहुत कम क्रिकेट खिलाड़ियों ने सीखा है और राजनीतिज्ञों ने तो इससे भी कम.

लंबे समय तक अपने कार्यालय मे बने रहकर- जिसकी कीमत उनकी पार्टी, उनकी सरकार, उनके देश और खुद उन्होंने चुकाई है, मनमोहन सिंह उन नेताओं की कतार में शामिल हो गए हैं जिसमें विंस्टन चर्चिल, चार्ल्स डि गॉल, मारग्रेट थैचर और जवाहर लाल नेहरु का नाम लिया जा सकता है.

(रामचंद्र गुहा ने इंडिया आफ़्टर गाँधी और मेकर्स ऑफ़ मॉर्डर्न इंडिया जैसी पुस्तकें लिखी हैं. वह बंगलौर में रहते हैं)

(अगर आप रामचंद्र गुहा का ये लेख अंग्रेज़ी में पढ़ना चाहते हैं तो क्लिक करें यहाँ क्लिक करें.)


शशि थरुर

बीस साल पहले भारत के सौम्य वित्त मंत्री ने आश्चर्यजनक रुप से राष्ट्र को एक दिलेर बजट सौपते हुए यादगार शब्दों में कहा था “दुनिया में कोई भी ताकत उस विचार को नही रोक सकती जिसका समय आ चुका हो.”

जिस विचार को मनमोहन सिंह आगे बढ़ा रहे थे वो भारतीय अर्थव्यवस्था में उदारीकरण का था और जो सुधार उन्होंने किए उसके नतीजे लगभग क्रांतिकारी थे.

इन सुधारों ने लाइसेंस-परमिट-कोटा राज पर नियंत्रण खत्म कर दिया और भारत की बेतुकी “हिंदू विकास दर” ( धीमी विकास दर) जो तीन फीसदी से नीचे थी, उसे आठ फीसदी से ज्यादा उपर ले गए और ये वृद्धि डेढ़ दशक तक जारी रही.

बीस साल बाद, वो वित्त मंत्री आज प्रधानमंत्री हैं और अपने राजनीतिक करियर के शिखर पर हैं. जहां सभी जानकार उन पर एक ऐसा नेता होने का आरोप लगा रहे हैं, जिसकी सरकार फैसले न ले पाने वाली, कठोर फैसले लेने से डरने वाली और नीतिगत अपंगता की शिकार है और जिसके भ्रष्ट सहयोगी देश के संसाधनों को लूटने में लगे हुए हैं.

शांत स्वभाव

उनकी सहजता को कायरता, उनकी निश्छलता और शांत स्वभाव को अप्रभावी समझा जा रहा है और कहा जा रहा है कि भारत की चमक उन्होंने फीकी कर दी है. यहाँ तक कि एक मशहूर अंतरराष्ट्रीय समाचार पत्रिका ने तो उन्हें ‘अंडर अचीवर’तक कह डाला.

इसलिए 80 साल के हो चुके मनमोहन सिंह क्या उस रुपरेखा से भटक गए हैं या फिर उनके आलोचक उनकी उपलब्धियों को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं.

"ये ही वो व्यक्ति हैं जिन्होंने अपने देश को विश्वस्तर पर उभरती हुई सफल अर्थव्यवस्था के रुप में प्रतिष्ठा दिलाने के लिए किसी भी व्यक्ति की तुलना में कहीं ज्यादा काम किया है. मनमोहन सिंह इससे बेहतर सम्मान के हकदार हैं. "

ये ही वो व्यक्ति हैं जिन्होंने अपने देश को विश्वस्तर पर उभरती हुई सफल अर्थव्यवस्था के रुप में प्रतिष्ठा दिलाने के लिए किसी भी व्यक्ति की तुलना में कहीं ज्यादा काम किया है. मनमोहन सिंह इससे बेहतर सम्मान के हकदार हैं.

हाँ, ये ज़रुरी है कि कुछ खराब हुआ है. कुछ संभावित निवेशक इसलिए वापस चले गए क्योंकि सरकार ने एक नई कर व्यवस्था लागू करने का फैसला किया था, जिसे विशेष मामलों में पहले की अवधि से लागू किया जाना था.

प्रत्यक्ष विदेशी निवेश

बढ़ती मुद्रा स्फीति और खाद्य व तेल की कीमतों ने उनकी साझा सरकार के लिए समस्याएं पैदा की हैं, जिसकी वजह से मल्टी ब्रांड खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति देने में देरी हुई.

इस नीति को लागू करने की घोषणा को स्थानीय राजनीतिक विपक्ष के विरोध के कारण साल भर के लिए टालना पड़ा

लेकिन ये विश्वास करने का कोई भी कारण नहीं कि ये समस्याएं लंबे समय तक रहने वाली हैं.

(सुपरिचित लेखक और इतिहासकार रामचंद्र गुहा मानते हैं कि बेहतर होता कि मनमोहन सिंह ने 2009 में अपना पद छोड़ दिया होता. उनका कहना है कि ऐसा न करके उन्होंने अपनी, अपनी पार्टी की और सरकार की छवि को ऐसा नुक़सान पहुँचाया है, जिसकी भरपाई नहीं की जा सकती. रामचंद्र गुहा का लेख पढ़ने के लिए इसी पन्ने के ऊपर दूसरे टैब को दबाएँ या क्लिक करें यहाँ क्लिक करें.)

ये लंबी अवधि की सफलता के ग्राफ में छोटा सा झटका मात्र है. अधिकांश आलोचनाओं में निराशा को उसी तरह बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया जाता है जैसे पहले भारत की तेज विकास की कहानी को बढ़ा-चढ़ा कर बयाँ किया जाता था.

असाधारण उपलब्धियां

मनमोहन सिंह की उपलब्धियाँ असाधारण हैं. 1991 में जिस भारत को उन्होंने संकट से उबारा, वो अक्षम और केंद्रीय नियोजन वाली ऐसा अर्थव्यवस्था थी, जिसके शिखर पर पिछले 45 सालों से नौकरशाही थी न कि उद्यमी और उद्योगपति.

नियमों, विनियमों और लाइसेंस राज के कठोर ढांचे के कारण उद्यमशीलता के मार्ग में कई संरक्षणवादी रुकावटें थी.

आत्मनिर्भरता के नाम पर व्यापार, विदेशी निवेश पर रोक थी. गैर उत्पादक और सार्वजनिक क्षेत्र सरकारी सब्सीडी पर जिंदा थे और देश अमीरी गरीबी की खाई को पाटने के लिए संघर्ष कर रहा था.

आज भारत को अपनी उद्यमशीलता और वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़ने पर गर्व है. देश में गतिशील सकारात्मक व्यापार संस्कृति फल-फूल रही है. भारत अपनी शर्तों पर दुनिया के साथ कारोबार कर रहा है और हर वर्ष एक करोड़ से ज्यादा लोगों को गरीबी की रेखा से बाहर लाना लक्ष्य है.

ये विरोधाभास अद्भुत है. इस बदलाव का श्रेय सबसे अधिक अगर किसी को जाता है तो वो निश्चित ही मनमोहन सिंह हैं.

संकट का दौर

"ये मनमोहन सिंह के प्रबंधन का कमाल था. जब जी-20 देशों के नेता विश्व की अर्थव्यवस्था पर चर्चा करने के लिए इकट्ठा हुए तो उनकी बातों को काफी सम्मान के साथ सुना गया. राष्ट्रपति ओबामा ने उन्हें अपने पसंदीदा विश्व के तीन शीर्ष नेताओं की सूची में पहले स्थान पर रखा है."

यहाँ तक कि पूरे संसार ने एक अभूतपूर्व आर्थिक संकट और मंदी के दौर का सामना किया है, लेकिन भारत इस विश्वव्यापी संकट के बावजूद डिगा नहीं है और संसार में चीन के बाद दूसरे स्थान पर सबसे तेज अर्थव्यवस्था वाला देश बना रहा.

खास कर उस वक्त जब अधिकांश देशों की आर्थिक वृद्धि दर पिछले चार सालों के दौरान किसी न किसी तिमाही में नकारात्मक थी. ये मनमोहन सिंह के प्रबंधन का कमाल था. जब जी-20 देशों के नेता विश्व की अर्थव्यवस्था पर चर्चा करने के लिए इकट्ठा हुए तो उनकी बातों को काफी सम्मान के साथ सुना गया. राष्ट्रपति ओबामा ने उन्हें अपने पसंदीदा विश्व के तीन शीर्ष नेताओं की सूची में पहले स्थान पर रखा है.

वर्ष 2011-12 में भारत में 7 प्रतिशत की विकास दर दर्ज की गई, सेवा क्षेत्र करीब 9 फीसदी की दर से बढ़ा और देश के सकल घरेलू उत्पाद में इसका योगदान 58 फीसदी रहा. मंदी की मार झेल रही दुनिया जहाँ विनिर्मित वस्तुओं की माँग न हो वहाँ ये आंकड़ा सुकून देने वाला है.

भारत की सफलता

पिछले साल की जनगणना के मुताबिक देश के 24 करोड़ 70 लाख परिवारों की साक्षरता दर 2001 के मुकाबले 65 फीसदी से बढ़कर 74 प्रतिशत हो गई. केवल दो सालों में ही 51 हजार नए स्कूल खुले और 6 लाख 80 हजार नए शिक्षकों की नियुक्ति की गई है.

आज देश के 63 फीसदी लोगों को पास फोन हैं, जबकि एक दशक पहले सिर्फ नौ फीसदी भारतीय ही फोन इस्तेमाल कर पाते थे. पिछले साल ही दस करोड़ फोन लगाए गए. इसमें चार करोड़ ग्रामीण इलाकों में थे. आज भारत में कुल 94 करोड़ 35 लाख टेलीफोन कनेक्शन हैं.

करीब साठ फीसदी भारतीयों के बैंक खाते हैं. इसका श्रेय मनमोहन सिंह की नीतियों को ही जाता है. (पिछले तीन सालों में ही पांच करोड़ से अधिक लोगों के बैंक खाते खोले गए और इनमें ज्यादातर खाते गाँव में खोले गए).

पिछले वर्ष करीब 20 हजार मेगावाट अतिरिक्त बिजली का उत्पादन हुआ और ग्रामीण इलाकों में 35 लाख बिजली के नए कनेक्शन लगाए गए. आठ हजार नए गांवों को पहली बार बिजली नसीब हुई.

आज देश के कस्बों और शहरों में 93 फीसदी लोगों के पास बिजली पहुंच गई है.ये आंकडें भारत की भविष्य की अर्थव्यवस्था की पूर्वसूचना देने के लिए काफी हैं.

मनमोहन सिंह सरकार का लक्ष्य अगले पाँच सालों में ढांचागत सुविधाओं के विकास में एक खऱब डॉलर निवेश करने का है और इनमें से अधिकांश सार्वजनिक व निजी क्षेत्रों की साझीदारी में होगा.

ये निवेशकों के लिए काफी आकर्षक मौका है. बजट के विवादास्पद प्रावधानों की समीक्षा की जी रही है.

विपक्ष का प्रहार

विरोध पर डटे सहयोगी दल की सरकार से हटने की कीमत पर मल्टीब्रांड और उड्यन क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का फैसला किया गया.

विपक्ष के हो हल्ले के बावजूद डीजल और रसोई गैस पर दी जा रही रियायत को कम किया गया. अभी कई क्षेत्रों में और सुधार होने हैं ताकि बिना किसी लाग लपेट के ये संदेश जा सके कि भारत की अनदेखी नहीं की जा सकती.

भारत में भ्रष्टाचार एक सच्चाई है, लेकिन ये पूरे भारत की समस्या है न कि विशेष रुप से मनमोहन सिंह सरकार की. उनके प्रधानमंत्री बनने से पहले भी भ्रष्टाचार रहा है और उनके बाद भी रहेगा.

हालांकि इस संबध में कई अखबारों की सुर्खियां बढ़ा-चढ़ा कर पेश की गई हैं, लेकिन इसके बावजूद जो सच्चाई सामने आई है उससे भारतीय लोकतंत्र (विशेष रुप से कैग, न्यायपालिका, मीडिया, सिविल सोसाइटी) की सक्रियता के ही प्रमाण मिलते हैं.

सरकार की तथाकथित विफलताओं का तुलना में विपक्ष का गैर जिम्मेदाराना और विघटनकारी रवैया इस छवि के लिए ज्यादा जिम्मेदार है कि भारत 21 वीं सदी में मिलने वाले मौंकों का पूरी तरह से फायदा उठाने के लिए तैयार नही है.

सच्ची तस्वीर

इन चुनौंतियों के बीच मनमोहन सिंह सरकार और भारत की प्रगति की सच्ची तस्वीर उन आरोंपों से बिलकुल उलट है जिसमें सरकार पर निष्क्रिय होने और नीतिगत अपंगता का दोष मढ़ा जाता है.

जैसा कि प्रधानमंत्री खुद ही कहते हैं, “ये स्वीकार करने वाला मैं वो पहला व्यक्ति हूं जो ये कहता है कि हमें बेहतर करने की ज़रुरत है. लेकिन इसमें किसी को इस बात पर कोई संदेह नही होना चाहिए कि हमने कहीं ज्यादा हासिल किया है.”

प्रधानमंत्री महोदय, आपने जो कुछ हासिल किया है, उसके आप प्रशंसा के हकदार हैं , लेकिन जो कुछ अभी आपको हासिल करना है उसके लिए आप पर सवालिया निशान लगाना अनुचित है.

प्रधानमंत्री जी,

आपको जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं. हमें विश्वास है कि आने वाले वर्षो में देश और शानदार प्रगति करेगा.

(शशि थरूर भारत के पूर्व विदेश राज्य मंत्री हैं)

(अगर आप शशि थरूर का ये लेख अंग्रेज़ी में पढ़ना चाहते हैं तो क्लिक करें यहाँ क्लिक करें.)


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