पैसा फेंक, ग़रीबी देख

  • 29 सितंबर 2012
धारावी में पश्चिमी प्रयटक
Image caption झुग्गी टूरिज़्म में शामिल होने वाले विदेशी प्रयटकों की संख्या बढती जा रही है

सुबह का समय है. आसमान में बादल छाए हैं. हमारे साथ धारावी की सैर करने के लिए चार विदेशी और दो भारतीय तैयार हैं. टूरिस्ट गाइड सूरज हत्तार्काल जोश में हैं.

धारावी की पदयात्रा शुरू होने से पहले सूरज उन्हें दस लाख की आबादी वाली इस बस्ती के बारे में बताते हैं, "धारावी के लोग मिट्टी के बर्तन से लेकर बेल्ट, बटुए और प्लास्टिक के सामान बनाते हैं. यहां मुंबई के रेस्त्रां के लिए कई तरह के खाने तैयार किए जाते हैं."

सैर

मुंबई में एशिया की सबसे बड़ी झोपड़पट्टियों में से एक धारावी के लोग ग़रीब तो हैं लेकिन एक रिपोर्ट के मुताबिक इस बस्ती के छोटे-छोटे कारखाने लगभग एक अरब डॉलर के मूल्य का सामान बनाते हैं जिनमें से अधिकतर सामान निर्यात किया जाता है.

ब्राज़ील के शहर रिओ डे जेनेरिओ और दक्षिण अफ्रीका के जोहानिसबर्ग की झुग्गियों को भी पर्यटक देखने भी जाते हैं. मुंबई में ये काम रियलिटी टूर एंड ट्रैवल नाम की कंपनी कराती है.

कंपनी के दो मालिक हैं. लंदन से आकर मुंबई में रहने वाले क्रिस वे और मुंबई के कृष्ण पुजारी.

कृष्ण पुजारी कहते हैं, "धारावी के बारे में लोगों को सही जानकारी नहीं है. "मैंने इस बस्ती की ज़िंदगी को करीब से देखा है. यहां रह कर समझ में आता है कि लोगों को धारावी के बारे में कितनी ग़लतफहमियां हैं. यहां कई तरह की चीज़ें बनती हैं. कई कारखाने हैं. लोग मेहनती और हुनरमंद हैं."

वो कहते हैं कि धारावी और शहर की दूसरी झुग्गियों में मुंबई पुलिस के 40 फीसदी कर्मचारी रहते है. वो कहते हैं: "यहां ग़रीब लोग ज़रूर रहते हैं लेकिन मध्यम वर्ग के पढ़े लिखे लोग भी रहते हैं. मुंबई पुलिस के 40 फ़ीसदी लोग झोपड़पट्टियों में ही रहते हैं."

नैतिकता का सवाल

Image caption टूरिस्ट गाईड सूरज हत्तार्काल इस काम में पिछले छह सालों से लगे हैं.

ख़ुद दो साल तक धारावी मे रह चुके कृष्ण कहते हैं कि पर्यटन के मामले पर नैतिकता का कोई सवाल नहीं पैदा होता.

उनके मुताबिक, "हम अपनी कमाई का 80 प्रतिशत हिस्सा धारावी के ग़रीबों की मदद पर खर्च करते हैं."

अमरीकी पर्यटक रईसा और उनकी बेटी रेबेका कहती हैं कि धारावी आकर उन्हें समझ में आया कि ये लोग कितने मेहनती हैं और यहां कई तरह के काम किए जाते हैं. उनका कहना है, "यहां अधिक ग़रीबी भी नहीं दिखी. इनके घर साफ़ हैं. अगर घर के बाहर भी सफाई हो तो यहां के लोगों को राहत मिलेगी."

गाइड सूरज ने सैलानियों को कई कारखानों में सामान बनते दिखाया. एक कारखाने में प्लास्टिक को रिसाइकल करने का काम किया जा रहा था. लंदन से आए जोश दोब्बिंस इस काम से काफी प्रभावित हुए. वो कहते हैं, "ये लोग प्लास्टिक को रिसाइकल करके प्रदूषण को कम करने में मदद कर रहे हैं."

ग़रीबी का मजाक

Image caption धारावी निवासी कहते हैं कि इस पर्यटकों के आने का उन्हें कोई फ़ायदा नहीं होता है.

लेकिन भारतीय पर्यटक इस टूर के बारे में अलग राय रखते हैं. गुजरात से आईं केवाना देसाई कहती हैं कि इस टूर से यहां के लोगों की ग़रीबी का मजाक़ उड़ाया जाता है. उनके शब्दों में "बाहर के लोगों को हमारी ग़रीबी में ही दिलचस्पी होती है."

केवाना की तरह दूसरे भी इस तरह के पर्यटन की नैतिकता पर सवाल उठा रहे हैं.

धारावी में दिलचस्पी बढ़ने का एक कारण 2009 की फिल्म 'स्लमडॉग मिल्लिएनर' की सफलता है जिसके बाद मुंबई आए विदेशी पर्यटक धारावी जाने की इच्छा प्रकट करते हैं. लेकिन रियलिटी टूर एंड ट्रैवेल ने 'स्लमडॉग मिल्लिएनर' आने से पहले ही 2006 में धारावी टूर शुरू किया था.

गाइड सूरज कहते हैं: "हमने धारावी टूर का काम पहले शुरू किया था लेकिन ये सही है की फिल्म के बाद धारावी में लोगों की रुचि बढ़ी है."

धारावी में रहने वाले नासिर शेख़ कहते हैं, "धारावी टूर से हमें कोई फायदा नहीं होता. लेकिन अगर विदेशी हमारी बस्ती में आते हैं तो उनका स्वागत है. ये हमारी भारतीय परंपरा है जो इस बस्ती में हर जगह देखने को मिलेगी."

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