जम्मू-कश्मीर का 'सलवा जुडूम'

 शुक्रवार, 28 सितंबर, 2012 को 07:58 IST तक के समाचार
जम्मू में वीडीसी

वीडीसी पर जबरन पैसा वसूलने और मनमानी करने के भी आरोप लग रहे हैं.

जैसे-जैसे भारतीय राज्य जम्मू-कश्मीर में चरमपंथी हिंसा कम हो रही है, वैसे-वैसे यहाँ गाँव सुरक्षा समिति (वीडीसी) द्वारा हथियारों और अधिकारों के दुरूपयोग की ख़बरें सामने आ रही हैं.

वीडीसी का गठन वर्ष 1995 में हुआ था.

इसकी वजह दूर-दराज़ के पहाड़ी इलाकों में चरमपंथी हमलों के बढ़ने और सुरक्षा बलों के उनसे निपटने में नाकामी रही है.

इन हालात में चरमपंथियों के साथ मुक़ाबला करने के लिए राज्य सरकार ने इन क्षेत्रों में कुछ स्वयंसेवकों को इकट्ठा करके उन्हें हथियार दिए और हथियारों को चलाने का प्रशिक्षण भी दिया.

उन स्वयंसेवकों को गाँव सुरक्षा समिति या वीडीसी का नाम दिया गया.

वीडीसी

राज्य के भूतपूर्व पुलिस महानिदेशक कुलदीप खोडा ने इसकी शुरूआत की थी, जो 1995 में डोडा ज़िले के पुलिस उपमहानिरीक्षक थे.

जम्मू क्षेत्र में क़रीब पांच हज़ार वीडीसी हैं, जिनमें क़रीब 29,000 सदस्य हैं जो अधिकतर अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय के हैं.

इन सदस्यों को सरकार की ओर से हथियार और उन्हें चलाने का प्रशिक्षण दिया गया हैं.

चरमपंथियों के साथ लड़ते हुए अब तक लगभग 150 वीडीसी कार्यकर्ता मारे भी जा चुके हैं.

"हमारे सामने अगर रिपोर्ट आए तो हम उस पर अवश्य कारवाई करेंगे. इन रिपोर्टों के उपरांत हमने वीडीसी का दोबारा अवलोकन करना शुरू कर दिया है. हम इसकी भी जांच कर रहे हैं कि जिनको हथियार दिया गया है उनकी मानसिक स्थिति कैसी है."

पुलिस महानिरीक्षक दिलबाग सिंह

लेकिन चरमपंथी हिंसा के घटने के बाद भी, वीडीसी सदस्यों द्वारा अपने हथियारों और अधिकारों के दुरूपयोग की ख़बरें सामने आती रही हैं.

डोडा के सैद-उल्लाह माग्रे का कहना है, "वीडीसी के गठन के कुछ ही समय बाद इनके सदस्यों द्वारा हथियार और अधिकार के दुरूपयोग की रिपोर्टें आने लगी थीं."

ख़ौफ़

लोगों पर वीडीसी का इतना ख़ौफ़ है कि उन्होंने अपना नाम गुप्त रखने की शर्त पर ही कोई बात की.

डोडा ज़िला के भेला गाँव के एक बुज़ुर्ग ने बताया, "मै जंगल से गुज़र रहा था. मेरे सामने हमारे गाँव के दो वीडीसी सदस्य वहां पर डेरा लगाए बकरेवालों के पास गए और अपनी बंदूक़ दिखाकर उनसे एक बकरा ले गए. वो बेचारे मजबूर थे और कुछ न कर सके."

किश्तवाड़ ज़िला के एक पत्रकार ने बताया कि ऐसी कई घटनाएं इस ज़िला के दूर दराज़ इलाक़ों में होती रहती हैं, "परंतु किसी में पुलिस को रिपोर्ट करने कि हिम्मत नहीं होती क्योंकि वो वीडीसी वालों से डरते हैं."

वीडीसी, जम्मू

आम आदमी वीडीसी से दहशत में रहते हैं.

इस मसले पर बात करते हुए जम्मू पुलिस के महानिरीक्षक दिलबाग सिंह का कहना था, "हमारे सामने अगर रिपोर्ट आए तो हम उस पर अवश्य कार्रवाई करेंगे. इन रिपोर्टों के उपरांत हमने वीडीसी का दोबारा अवलोकन करना शुरू कर दिया है. हम इसकी भी जांच कर रहे हैं कि जिनको हथियार दिया गया है उनकी मानसिक स्थिति कैसी है."

पुलिस महानिरीक्षक ने बताया कि कुछ ऐसी भी जानकारी मिली है कि जिनको हथियार दिया गया था उनकी मृत्यु हो गई है और बंदूक़ें उनके परिवार में किसी और के पास है.

चरमपंथी हिंसा में कमी आने के बाद अब पुलिस इस पर भी विचार कर रही है कि हर जगह वीडीसी की ज़रुरत है या नहीं? दिलबाग सिंह के अनुसार हर वीडीसी सदस्य को 100 राउंड गोलियाँ दी जाती हैं और उन्हें हर गोली का हिसाब देना होता है.

लेकिन इस बारे में पुंछ के एक भूतपूर्व पुलिस अधिकारी का कहना था, "वीडीसी वाले इस पर पुलिस को चकमा दे सकते हैं. गोलियों का हिसाब देते हुए उन्हें सिर्फ़ इतना कहना होता है कि हमने संदिग्ध हरकत देखी और गोली चला दी."

जो किसी भी तरह से एक संतोषप्रद जवाब नही है.

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