गांधी से नाराज़ क्यों हैं दलित?

  • 1 अक्तूबर 2012
Image caption 1931 में राउंड टेबल कांफ्रेंस के लिए लंदन में गांधी.

मोहनदास करमचंद गांधी को भारत में राष्ट्रपिता का दर्जा दिया गया है. ऐसे में अगर कहीं उनकी तीखी आलोचना होती है, तो इस पर एक सकारात्मक बहस शुरू होगी या इसे बर्दाश्त के बाहर समझा जाएगा?

हाल ही में दलितों और गांधी के संदर्भ को दर्शाती मलयालम भाषा में बनी एक फिल्म 'पैपिलॉन बुद्ध' को सेंसर से मंजूरी नहीं मिल पाई.

सेंसर बोर्ड का कहना है, “इस फिल्म में गांधी का अपमान किया गया है. उनके पुतले को जूतों की माला पहनाई गई है और फिर पुतले को जलाया गया है. इस चित्रण को स्वीकृति नहीं दी जा सकती.”

वहीं फिल्म के निर्देशक जयन चेरियन का कहना है, “गांधी के विचारों और दलितों के लिए काम कर रहे कार्यकर्ताओं के बीच लंबे समय से मतभेद रहा है और हमने इसी बात को उभरा है.”

सवाल ये उठता है कि ये विरोधाभास क्यों? दलितों को ‘हरिजन’ यानी भगवान के बच्चे कहने वाले गांधी से वही समुदाय नाराज़ क्यों है? क्यों दलितों को लगता है कि उनके समुदाय के लिए किए गए गांधी के प्रयास दरअसल ऐतिहासिक गलतियां थीं?

'राजनीति में आरक्षण का तरीका गलत'

सबसे पहले ये जानना ज़रूरी है कि भारत की राजनीति में दलितों के लिए आरक्षित सीटों की मौजूदा प्रणाली के पीछे, वर्ष 1932 में महात्मा गांधी द्वारा किया गया एक अनशन है. लेकिन आधुनिक दौर में दलित कार्यकर्ता इसे एक ‘ऐतिहासिक भूल’ बताते हैं.

मौजूदा व्यवस्था में ‘एक व्यक्ति-एक वोट’ के तहत सभी नागरिकों को अपना प्रतिनिधि चुनने का अधिकार है. आरक्षित सीटों पर भी सभी जाति, धर्म और विचारधाराओं को मानने वाले अपना वोट देते हैं.

लेकिन दलित सरोकारों पर किताबें छापने वाले ‘नवयन प्रकाशन’ के एस आनंद के मुताबिक “सीटों में आरक्षण से दलितों को चुनाव जीतने का मौका तो मिलता है, लेकिन मतदाताओं में दलितों की संख्या कम होने की वजह से वो ही दलित नेता चुने जाते हैं जो बहुसंख्यकों की पसंद हैं.”

दरअसल राजनीति में दलितों का प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए वर्ष 1932 में दलित नेता डॉ. बीआर अंबेडकर ने एक अलग प्रस्ताव रखा था. इसके तहत सीटों में आरक्षण के बजाय दलितों को अपना प्रतिनिधि ‘अलग से’ चुनकर (सेपरेट इलेक्टोरेट) भेजने की व्यवस्था सुझाई गई थी जिसे हरी झंडी भी मिल गई थी.

लेकिन महात्मा गांधी ने इसका विरोध कर अनशन किया और आखिर उनकी बात मान ली गई. एस आनंद कहते हैं, “गांधी अगर विरोध ना करते और अम्बेडकर के प्रस्तावित रास्ते को अपना लिया जाता तो दो दशकों में एक मज़बूत और सच्चा दलित नेतृत्व उभरता जो दलित सरोकारों को आगे ले जाने में रुचि रखता. लेकिन आज की स्थिति में आरक्षित सीटों पर वही लोग चुने जा रहे हैं जिनके पास पर्याप्त संख्या है, अपने समुदाय को लेकर वचनबद्धता नहीं.”

हरिजन कहलाना ‘गाली’ समान

उसी दौर में दलित समुदाय के लोगों को ‘अस्पृश्य या अछूत’ कहकर संबोधित करने को महात्मा गांधी ने गलत बताते हुए उन्हें ‘हरिजन’ यानी ‘भगवान के बच्चे’ की संज्ञा दी. ‘हरिजन’ नाम से उन्होंने तीन पत्रिकाएं भी निकालीं.

लेकिन दलित नेता बाबा साहेब अंबेडकर की पोती रमा के पति और दलित कार्यकर्ता आनंद तेलतुम्बड़े के मुताबिक दलितों को ‘हरिजन’ कहलाना बर्दाश्त नहीं है और वे उसे ‘गाली’ के समान मानते हैं, इसीलिए ‘हरिजन’ अब आम शब्दावली में इस्तेमाल नहीं किया जाता.

तेलतुम्बड़े कहते हैं, “सिर्फ नाम बदलने से कुछ नहीं होता, गांधी के मुताबिक ‘हरिजन’ यानी ‘भगवान के बच्चे’ का सांकेतिक अर्थ था कि सभी समान हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और थी, इसलिए अंबेडकर और उनके समर्थकों ने भी इसका विरोध किया.”

Image caption 'पैपिलोन बुद्ध' फिल्म में दलितों की ओर से गांधी की आलोचना की गई है.

महात्मा गांधी के जीवन पर शोध कर किताबें लिख चुके लॉर्ड भीखू पारेख अलग सोच रखते हैं.

उनका मानना है कि उस दौर में गांधी का ये कदम बहुत मायने रखता था. पारेख कहते हैं, “हर वक्त का एक नज़रिया होता है, समकालीन सोच के तहत ‘हरिजन’ का संबोधन गलत लग रहा है, लेकिन हो सकता है कि आने वाले समय में ‘दलित’ शब्द भी गलत लगे और यही लोग अपने समुदाय को कुछ और मानवीय नाम देना चाहें.”

गांधी का मानना था कि कोई भी काम बुरा नहीं है फिर चाहे वो मैला ढोने का ही क्यों ना हो, इसीलिए उन्होंने खुद ये काम करने जैसे सांकेतिक कदम उठाए.

लेकिन आनंद तेलतुम्बड़े के मुताबिक दलितों का जीवन उनकी जाति से जुड़े ऐसे व्यवसाय के जाल से निकल नहीं पा रहा था, “दलितों के लिए उच्च जातियों की इस तरह की पहल का मतलब था मानो दुखती रग पर चोट करना क्योंकि पिछड़ी जातियों के जीवन में कोई मूलभूत बदलाव की बात नहीं की जा रही थी.”

वहीं लॉर्ड पारेख का मानना है कि अंबेडकर और गांधी के तरीके एक दूसरे के पूरक थे, “अंबेडकर ज़ोर-शोर से अपनी आवाज़ उठाते थे और गांधी सांकेतिक तरीकों से उन्हें अपना समर्थन जताते हुए उच्च जातियों पर बदलाव का दबाव बनाते थे.”

इतिहास में दलितों का नेता कौन?

दलित आंदोलन पर लंबे समय से भारत में काम कर रहीं अमरीकी मूल की गेल ओमवेड्ट के मुताबिक महात्मा गांधी का ‘हरिजन’ संबोधन और बाद में उनके द्वारा शुरू किया गया ‘हरिजन सेवक संघ’, दलितों को इसलिए नापसंद था क्योंकि, “वो एक शीर्ष जाति की मदद से दलितों के उत्थान की सोच दर्शाता था ना कि दलितों के जीवन पर उनके अपने नियंत्रण की.”

गेल कहती हैं, “महात्मा गांधी खुद को दलितों का नेता मानते रहे, इस समझ के साथ कि दलित हिन्दू समुदाय का हिस्सा हैं, लेकिन दलितों ने उन्हें अपना नेता नहीं समझा और हिंदुओं से अलग अपनी पहचान की बात करते रहे.”

एस आनंद भी इससे इत्तफाक रखते हैं. वो ध्यान दिलाते हैं कि इतिहास में जैसा दर्जा महात्मा गांधी को प्राप्त है, उसकी तुलना में दलित आंदोलन में अंबेडकर के योगदान का ज़िक्र बहुत कम है.

आनंद कहते हैं, “भारत का हर बच्चा गांधी जी की जन्म तिथि, जन्म स्थान और दलितों के लिए उनके काम के बारे में जानता है, लेकिन अंबेडकर के बारे में देश के स्कूलों की किताबें कितना बताती हैं? बल्कि उनके स्मारक भी पिछले दशकों में ही बने, वो भी सरकार की ओर से कम और दलितों द्वारा ज़्यादा.”

दरअसल आने वाले इतिहास की समझ मौजूदा पीढ़ी, पिछली पीढ़ी के बताए गए इतिहास को ही तथ्य मानकर बनाती है. इतिहास हमेशा से ही समय-सापेक्ष रहा है लेकिन उसकी समझ उस व्यक्ति से बनती है जो उसकी व्याख्या कर रहा है.

यानी ये आप पर निर्भर है कि वर्तमान की परिपक्व समझ के लिए आप इतिहास के कितने विभिन्न पाठों को समझने की कोशिश करते हैं.

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