किसको फ़र्क पड़ेगा नए आर्थिक सुधारों से

  • 4 अक्तूबर 2012

रीटेल में विदेशी निवेश को अनुमति देने के बाद केंद्र की यूपीए सरकार नए सिरे से विवादित बीमा और वायदा कानून में सुधार लागू करने के इशारे दे रही है. क्या अर्थ इसका आपके लिए.

बीमा क्षेत्र में विदेशी निवेश की सीमा को बढ़ाना और वायदा कारोबार कानून में संशोधन:

सरकार के लिए क्यों महत्वपूर्ण:

इसकी वजह से सरकार भारतीय जनता पार्टी सहित सभी विपक्षी दलों को इस विवादित मुद्दे पर स्टैंड लेने के लिए मजबूर करेगी. उन्हें सड़क पर उतर कर साफ़ साफ़ शब्दों में अपनी नीति इस विषय पर स्पष्ट करनी होगी.

भारतीय जनता पार्टी सहित कई अन्य विपक्षी दलों के लिए सरकार का इस मुद्दे पर समर्थन करना मुश्किल होगा.

अगर भारतीय जनता पार्टी और अन्य दल फिर इस मुद्दे पर सरकार का विरोध करते हैं और कहते हैं कि हम यह फ़ैसले पलटेंगे तो सरकार आम जनता, और खास तौर पर माध्यम वर्ग, के बीच यह साबित करने की कोशिश करेगी कि भाजपा आर्थिक सुधार विरोधी है.

बीमा कंपनियों के लिए क्यों महत्वपूर्ण:

भारत में मौजूद बीमा कंपनियां लंबे समय से इस क्षेत्र में विदेशी निवेश की सीमा को बढ़ाने का आग्रह कर रही हैं. बीमा कंपनियों का कहना है कि बीमा के धंधे में बहुत बड़ी पूँजी की आवश्यकता होती है जिसके लिए विदेशी निवेश की सीमा को बढ़ाना ही होगा.

बीमा कंपनियां कहती हैं कि बीमा क्षेत्र की दो बहुत बड़ी कंपनी न्यूयॉर्क लाइफ और एआईजी केवल इन्ही कारणों से भारत छोड़ कर चले गए क्योंकि कम पूँजी के साथ यह धंधा केवल नुकसान ही देता है.

ग्राहकों के लिए क्यों महत्वपूर्ण:

बीमा के ग्राहकों के लिए अधिक चयन उपलब्ध होगा. भारत के एक बहुत बड़ा वर्ग निजी क्षेत्र में काम करता है. निजी क्षेत्र में काम करने वाली ज़्यादातर कंपनियों को पेंशन की कोई सुविधा उपलब्ध नहीं होती.

हालाँकि कुछ कंपनियां यह करती हैं लेकिन यह कतई पर्याप्त नहीं है. अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के इस क्षेत्र में आने से वो अंतरराष्ट्रीय कुशलता भी लाएगी. अभी निजी क्षेत्र में काम करने वाले अपने आने वाले कल के लिए पैसे बचने के लिए ज़्यादातर पीपीएफ़ या बैंक बचत का सहारा ही लेते हैं.

विरोधियों के तर्क:

विदेशी कंपनियां लोगों को निवेश पर रिटर्न की गारंटी नहीं देंगी. वो इस तरह की नीतियाँ लाएँगी कि वो भारत की तमाम बचत को अपनी तरफ़ खींच लेंगी जिसकी वजह से भारत के बैंको और वित्तीय संस्थानों के लिए पूँजी की कमी हो जाएगी और आम निवेशक के लिए कोई सुरक्षित ठिकाना नहीं बचेगा.

फॉरवर्ड कॉन्ट्रेक्ट (रेग्यूलेशन) ऐक्ट 1952:

इस बात की भी प्रबल संभावना है कि केंद्रीय कैबीनेट इस कानून में सुधारों को मंज़ूरी दे दे . वर्तमान कानून 1952 के लागू है जिसको को बदलने का समय आ गया है.

इस प्रस्ताव के विरोधियों का कहना है कि क़ानून में संशोधन से वायदा कारोबार को और बल मिलेगा और महंगाई दुगनी रफ़्तार से भागने लगेगी.

यह कानून उपभोक्ता जिंसों के भविष्य के दामों पर वायदे के कारोबार को संचालित करता है. यह क़ानून बहुत ही पुराना हो गया है और नए संदर्भो में इसमें संशोधन करने की ज़रूरत है.

कानून के विरोधी कहते हैं कि सरकार व्यापारियों पर लगाम नहीं लगा पाएगी इसलिए इसमें संशोधन नहीं करना चाहिए और इन्हें अधिक व्यवसाय की अनुमति नहीं देनी चाहिए. लेकिन सुधार रोकने की जगह सरकार को नियामक संस्थाओं को मज़बूत करने पर बल देना चाहिए.

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