दुर्गा के लिए खुले लक्ष्मी के दरवाज़े

 शनिवार, 6 अक्तूबर, 2012 को 19:20 IST तक के समाचार
दुर्गा पूजा

दुर्गा पूजा बंगाल का सबसे बड़ा त्यौहार है.

भारत में त्यौहारों का मौसम शुरु हो गया है. पश्चिम भारत और ख़ासकर महाराष्ट्र का सबसे बड़ा त्यौहार गणेश चतुर्थी कुछ ही दिनों पहले ख़त्म हुआ है.

और अब बारी है दुर्गा पूजा की जो कि पूर्वी भारत में और ख़ासकर पश्चिम बंगाल में सबसे बड़े त्यौहार के रुप में मनाया जाता है.

वैसे तो ये त्यौहार पूरे 10 दिनों का होता है लेकिन इसमें सबसे महत्वपूर्ण अंतिम चार दिन यानि सप्तमी से लेकर दशमी तक होते है.

पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में दुर्गा पूजा का ख़ासा महत्व है. कोलकाता में हर साल की तरह इस साल भी मां दुर्गा के स्वागत के लिए प्रायोजकों की प्रतिस्पर्धा चरम पर है.

अगर इस समय कोलकाता शहर पर नज़र डाला जाए तो आपको हर तरफ़ पंडाल निर्माण का कार्य नज़र आएगा.

अब जबकि दुर्गा पूजा शुरु होने में सिर्फ़ गिनती के दिन बाक़ी रह गए हैं तब शहर में हर तरफ़ पंडाल बनने का काम अपने अंतिम चरण में पहुंच गया है.

आकर्षक पर महंगे

साल दर साल ये पंडाल ना सिर्फ़ पहले से ज्य़ादा आकर्षक बल्कि महंगे भी होते जा रहे हैं.

इन पंडालों में ज्य़ादा से ज़्यादा श्रद्धालुओं को आकर्षित करने की होड़ मची रहती है. ऐसा माना जाता है कि पूजा के शुभ मुहुर्त के दौरान एक घंटे की अवधि में 60 हज़ार तक श्रद्धालु इन पंडालों में मां दुर्गा के दर्शन के लिए आते हैं.

"इन पंडालों में ज्य़ादा से ज़्यादा श्रद्धालुओं को आकर्षित कपने की होड़ मची रहती है. ऐसा माना जाता है कि पूजा के शुभ मुहुर्त के दौरान एक घंटे की अवधि में 60 हज़ार तक श्रद्धालु में इन पंडालों में मां दुर्गा के दर्शन के लिए आते हैं."

ऐसे ही एक आयोजक राजदीप दास कहते हैं, ''हालांकि मैं अपने पंडाल के लिए चंदा इकट्ठा करने में लगा हूं लेकिन बढ़ती महंगाई में पूजा का पूरा ख़र्च सिर्फ 'कॉरपोरेट स्पॉन्सरशिप' के ज़रिए ही उठाया जा सकता है.''

राजदीप दास आगे कहते हैं, ''पूजा का बजट साल दर साल बढ़ता जा रहा है और इसके साथ ही लोगों की उम्मीदें भी बढ़ती जा रही हैं. लोग यहां कुछ नया देखने की उम्मीद से आते हैं, उनकी उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए हमें अपना बजट बढ़ाना पड़ता है और वो इन व्यावसायिक कंपनियों के स्पॉन्सरशिप के ज़रिए आता है.''

लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जो पूजा के इन कार्यों में देसी-विदेशी व्यवसायिक कंपनियों के हस्तक्षेप से खुश नहीं है. उनके मुताबिक़ अब पूजा का बाज़ारीकरण हो गया है.

लेखक अशोक दासगुप्ता उन्हीं लोगों में से एक हैं. वे कहते हैं, ''उन लोगों के लिए ये उत्सव कम, मनोरंजन और तमाशे की चीज़ ज्य़ादा है. उनके लिए ये कुछ और नहीं बस अपनी ताकत और पैसा दिखाने का तरीक़ा है.''

इनमें से कुछ पंडालों के बनाने में तो दो लाख डॉलर यानि कि लगभग एक करोड़ रूपए तक खर्च कर दिए जाते हैं.

लेकिन सबसे हैरानी की बात ये है कि भारत की ख़स्ताहाल अर्थव्यवस्था के बावजूद दुर्गा पूजा के दौरान पश्चिम बंगाल में आयोजकों को स्पॉन्सर्स ढूंढने में कोई दिक़्क़त नहीं हो रही है.

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