यूपी: दिमाग़ी बुख़ार से सात बच्चों की मौत

 सोमवार, 8 अक्तूबर, 2012 को 02:59 IST तक के समाचार
गोरखपूर में इंसेफ़ेलाइटिस

इंसेफ़ेलाइटिस इस इलाक़े के लिए कोई नई बीमारी नहीं

इन्सेफ़ेलाइटिस या दिमाग़ी बुख़ार कही जाने वाली बीमारी पूर्वी उत्तर प्रदेश के लिए कोई नया नाम नहीं हैं. इस बीमारी ने पिछले 34 वर्षों मे 12 हज़ार से ज़्यादा मासूमों की जान ली है.

वर्ष 2012 के जनवरी से अब तक इस मर्ज़ का शिकार होकर यहाँ पहुंचे 1916 रोगियों मे से 371 की मृत्यु हो चुकी है और दो सौ से ज़्यादा बच्चे और उनके परिजन इस रोग के हमले से जूझ रहे हैं.

1978 से हर साल जुलाई से लेकर नवंबर तक मौत का तांडव रचने वाली जापानी इन्सेफेलाइटिस (जेई ) नामक ये बीमारी एक मादा मच्छर 'क्यूलेक्स ट्राइटिनीओरिंकस' के काटने से होती है जिसमे दिमाग़ के बाहरी आवरण यानि इन्सेफेलान मे सूजन हो जाती है.

रोगी को तेज़ बुख़ार, झटके, कुछ भी निगलने मे कठिनाई जैसे लक्षण आने लगते हैं और यदि समुचित इलाज न हो सके तो तीन से सात दिन मे उसकी मौत हो जाती है.

"टेस्ट किट उपलब्ध होने के चलते जेई की पहचान अब मुश्किल नहीं रही लेकिन इन एंटेरो विषाणुओ की प्रकृति और प्रभाव की पहचान करने की टेस्ट किट अभी विकसित नहीं हो सकी है."

डॉक्टर केपी कुशवाहा, इंसेफ़ेलाइटिस विशेषज्ञ

2005 तक इस बारे मे सरकार या स्वास्थ्य संगठनो का रवैया ख़ासी लापरवाही भरा था लेकिन उस साल मौतों का आंकड़ा एक हज़ार से भी ज़्यादा हो जाने और राष्ट्रीय एंव अंतरराष्ट्रीय मीडिया मे आई ख़बरों के चलते सरकार को सक्रियता प्रदर्शित करनी पड़ी थी.

2006 मे पहली बार टीकाकरण कार्यक्रम शुरू हुआ और 2009 मे पुणे स्थित नेश्नल वायरोलॉजी लैब की एक इकाई गोरखपुर मे स्थापित हुई ताकि रोग के ज़िम्मेदार कारणो की सही पहचान की जा सके.

2006 तक तो इस रोग से हुई मौतों का ज़िम्मेदार अकेले मच्छरों को ही माना जाता था लेकिन बाद मे हुए परीक्षणों से पता चला की सभी मामले जेई के ही नहीं थे.

एईएस

कई मामलों मे वहाँ जल जनित एंटेरो वाइरस की मौजूदगी पाई गई थी. वैज्ञानिको ने इसे एईएस यानि एक्यूट इन्सेफेलाइटिस सिंड्रोम का नाम दिया.

बीते कुछ सालों मे जहां जेई के मामलो मे कमी आई है वही ए ई एस के मामले तेज़ी से बढ़े हैं.

डॉक्टर केपी कुशवाहा

डॉक्टर केपी कुशवाहा दो दशकों से इस बीमारी पर नज़र रखे हुए हैं.

दो दशकों से ज़्यादा समय से इस बीमारी पर नज़दीकी नज़र रखने वाले चिकित्सक और इन दिनो बाबा राघव दास मेडिकल कालेज के प्रधानाचार्य प्रो केपी कुशवाहा के मुताबिकट ''टेस्ट किट उपलब्ध होने के चलते जेई की पहचान अब मुश्किल नहीं रही लेकिन इन एंटेरो विषाणुओ की प्रकृति और प्रभाव की पहचान करने की टेस्ट किट अभी विकसित नहीं हो सकी है.''

अमरीका मे अटलांटा स्थित नए जीवाणुओ और विषाणुओ की खोज करने वाले विश्वप्रसिद्ध संगठन सी डी सी (सेंट्रल डिज़ीज़ कंट्रोल) के वैज्ञानिक भी इन विषाणुओ का पता लगाने के लिए 2007,2009 तथा 2012 मे मेडिकल कालेज का दौरा कर चुके हैं.

अरसे से विशेषज्ञ इस बीमारी के प्रभाव वाले इलाक़ों मे व्यापक टीकाकरण, हवाई फागिंग, सूअर बाड़ों को आबादी से दूर करने और स्वच्छ पेय जलापूर्ति जैसे उपायों की ज़रूरत बताते रहे हैं.

इन्सेफ़ेलाइटिस पर अनेक शोध कर चुके ग़ैर-सरकारी संगठन एपीपीएल के डॉ संजय श्रीवास्तव और नरेंद्र मिश्र की मानें तो असली समस्या ‘समन्वय न होने’ से है.

"ज़रूरत इस बात की है कि इस बीमारी के समूचे चक्र को ध्यान मे रखते हुये चिकत्सक, पशु वैज्ञानिकों, पेय जलापूर्ति तंत्र से जुड़े अफ़सरों और बीमारी के ज़्यादा तीव्रता वाले गांवो मे ग्राम प्रधान से लेकर वहाँ के स्वास्थ्य केन्द्रों तक को उनकी भूमिकाएँ समझनी होंगी.अगर ऐसा हो सका तो नतीजे बेहतर होंगें."

एपीपीएल के डॉक्टर संजय श्रीवास्तव

वे कहते हैं, ''ज़रूरत इस बात की है कि इस बीमारी के समूचे चक्र को ध्यान मे रखते हुये चिकत्सक, पशु वैज्ञानिकों, पेय जलापूर्ति तंत्र से जुड़े अफ़सरों और बीमारी के ज़्यादा तीव्रता वाले गांवो मे ग्राम प्रधान से लेकर वहाँ के स्वास्थ्य केन्द्रों तक को उनकी भूमिकाएँ समझनी होंगी.अगर ऐसा हो सका तो नतीजे बेहतर होंगें.''

हालांकि बीते कुछ समय से शासन और प्रशासन दोनों स्तरों पर सक्रियता मे इज़ाफ़ा हुआ है मगर अभी भी ये नाकाफ़ी है.

बाल स्वास्थ्य गारंटी योजना के तहत शासन से आए 91 लाख रुपयों के आज तक इस्तेमाल न होने की ख़बरों के बीच ढाई साल के अन्नु,10 साल की काजल,12 साल की प्रियंका,10 साल के राशिद, 4 साल की स्नेहा, 14 साल के सागर और महज़ नौ महीने पहले इस दुनिया मे आए अंकित की मौत की ख़बरों को सहन कर लेना बेईमानी भरा लगता है.

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