भारतीय अरबपति भी मंदी की चपेट में

 गुरुवार, 11 अक्तूबर, 2012 को 11:17 IST तक के समाचार
भारतीय कारखाने

पिछले दो वर्षों में भारत में आर्थिक विकास की दर घटी है

भारत के अरबपतियों को भी अब आर्थिक मंदी का स्वाद चखना पड़ रहा है.

इसके संकेत इस बात से मिलते हैं कि पिछले साल यानी 2011 में भारत के कुल सकल घरेलू उत्पाद में भारतीय अरबपतियों का योगदान 12 प्रतिशत से कुछ ज़्यादा था.

पर इस साल ये आँकड़ा घटकर 9.9 प्रतिशत ही रह गया है.

क्या फोर्ब्स पत्रिका में प्रकाशित ये आँकड़े बताते हैं कि अमीरों की अमीरी भी बहुत सुरक्षित नहीं है?

गंभीर मुद्दे उठाने वाली पत्रिका इकॉनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली में अदिति गाँधी और माइकल वॉल्टन ने भारतीय अरबपतियों की दशा दिशा पर एक लेख प्रकाशित किया है.

इस लेख में भारत की आर्थिक प्रगति के साथ अरबपतियों की दौलत की तुलना की गई है.

योगदान

भारतीय रुपया

आर्थिक मंदी के कारण अरबपतियों की दौलत पर भी असर पड़ा है.

दिलचस्प बात ये है कि भारत में उदारवादी आर्थिक नीतियाँ लागू होने के पाँच साल बाद तक यानी 1996 में भारत के सकल घरेलू उत्पाद में अरबपतियों की दौलत का योगदान एक प्रतिशत से कम था.

पर 2008 में अरबपतियों की दौलत इतनी बेतहाशा बढ़ी कि जीडीपी में उनकी दौलत का योगदान 22 प्रतिशत को पार कर गया.

पर फिर आया विश्व आर्थिक मंदी का दौर और अगले ही साल ये योगदान 22 प्रतिशत से घटकर लगभग सात प्रतिशत रह गया.

अदिति गाँधी और माइकल वॉल्ट ने भारतीय अरबपतियों की दौलत के स्रोतों का विश्लेषण किया है.

उन्होंने कहा है कि भारत के कुल 46 अरबपतियों (अमरीकी डॉलर में) में से 20 ने अपनी दौलत मकान, ज़मीन, निर्माण, मीडिया, सीमेंट और खनन आदि से इकट्ठा की है.

बाकी के 26 अरबपतियों ने आइटी, सॉफ्टवेयर, वित्तीय सेवाओं और शराब आदि के धंधे से कमाई है.

कई सवाल

लेख में दौलत के स्रोतों पर सवाल उठाए गए हैं.

इसमें कहा गया है कि “रियल एस्टेट (मकान, दुकान, जमीन आदि) के बारे में माना जाता है कि उसमें बड़े पैमाने पर ‘काले’ पैसे का लेन-देन किया जाता है.”

दूसरी तरफ खनन और स्पेक्ट्रम लाइसेंस जैसे क्षेत्रों में सरकार लाइसेंस जारी करती है, जिन्हें लेकर काफी विवाद पैदा हुए हैं. इसी तरह सीमेंट बनाने वाली कंपनियाँ भी गड़बड़झाले में उलझी रहती हैं और इसके लिए 2012 में उन पर जुर्माना भी लगाया गया.

दिलचस्प बात ये है कि भारतीय संदर्भ में जाति भी दौलतमंदों की सूची में अहम भूमिका अदा करती रही है.

लेखकों ने 2008 के एक अध्ययन के आधार पर कहा है कि दौलत की मंज़िल तक पहुँचने के लिए जाति एक महत्वपूर्ण वाहन रहा है.

भारत के 46 अरबपतियों में से 28 परंपरागत बनिया, पारसी और सिंधी जातियों के हैं, जबकि कुछ ऊँची जातियों से हैं. लेकिन इनमें सिर्फ एक मुसलमान है और दलित अरबपति कोई भी नहीं है.

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