जंगल, ज़मीन और धोखा...

 सोमवार, 8 अक्तूबर, 2012 को 08:48 IST तक के समाचार

तेज़ गर्मी और चिलचिलाती धूप में करीब एक हफ्ते से पैदल चल रहे हज़ारों लोग, जो दिन में एक बार खाना खाते हैं और रात को सड़क किनारे ही सो जाते हैं.

आदिवासी, दलित और गरीब तबके की ये महिलाएं, पुरुष और बच्चे, तीन अक्तूबर को ग्वालियर से 350 किलोमीटर पैदल चलकर दिल्ली पहुंचने के निश्चय के साथ पदयात्रा पर निकले हैं.

भारत के अलग-अलग प्रांतों से एकत्र हुए इन विभिन्न लोगों की एक ही मांग है - ज़मीन के एक टुकड़े को अपना कह पाने की आज़ादी और उसपर अपना आशियाना बनाने का अधिकार.

एक सामाजिक संगठन ‘एकता परिषद’ के सहयोग से जुड़े इन लोगों की इस मांग के साथ चार प्रतिनिधि आज भारत सरकार से मिलेंगे.

केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश से सोमवार शाम होने वाली इस मुलाकात में भोजन के अधिकार (राइट टू फूड) की तर्ज़ पर, शरण के संवैधानिक अधिकार (राइट टू शेल्टर) की मांग रखी जाएगी.

घर बनाने के लिए ज़मीन के एक टुकड़े का अधिकार इन लोगों के लिए इतना ज़रूरी क्यों है? किस हक से ये ज़मीन मांग रहे हैं? और अपनी बात रखने के लिए इतनी मुश्किल यात्रा क्यों? राजस्थान के धौलपुर से गुज़र रही इस यात्रा में शामिल लोगों से मिलकर मैंने यही जानने की कोशिश की.

फुइशी बाई, हिंडोरी, मध्य प्रदेश

मैं बैगा आदिवासी समुदाय में मध्य प्रदेश के टिकरिया गांव के जंगलों में पैदा हुई.

हम अपने रहने, खाने-पीने और जीविका चलाने के लिए हमेशा जंगल पर ही निर्भर रहे. हम इसे अपनी ज़मीन मानते हैं.

लेकिन पिछले साल वन अधिकारियों ने हमें कहा कि ये अवैध कब्ज़ा है और वहां से हटा दिया. कई लोगों के घर जला भी दिए.

अब हम किसी और की ज़मीन पर रहते हैं. जहां हर समय पुलिस और वन अधिकारियों द्वारा भगाए जाने का डर लगा रहता है.

जंगल से नाता टूटा नहीं है, क्योंकि वहां से काटी लकड़ी बेचकर ही हम अपना घर चलाते हैं. हमें इसे छोड़कर नहीं जाना चाहते.

हमें सरकार से एक पट्टा चाहिए ताकि जंगल वासी होने के नाते हमें वहां की भूमि पर घर बसाने का अधिकार मिल जाए और हम बिना किसी डर के जी सकें.

कुमार कोइजोर, सुंदरगढ़, उड़ीसा

उड़ीसा के सुंदरगढ़ ज़िले के बीरमित्रपुर में एशिया की सबसे बड़ी चूना-पत्थर कंपनी है, मैं वहीं बसे ओराम आदिवासी समुदाय से हूं.

बिस्रा स्टोन एंड लाइम कंपनी वर्ष 1908 में शुरू हुई थी. लेकिन 30-35 साल पहले उसने खनन के लिए कई आदिवासियों की ज़मीन पर गैरकानूनी तरीके से जबरन कब्ज़ा कर लिया.

मैंने ऐसे लोगों का संगठन बनाया. इसमें 82 परिवार हैं जिनकी कुल मिलाकर 175 एकड़ ज़मीन पर ये कंपनी जबरन खनन कर रही है.

हमें ना कोई मुआवज़ा मिला, ना ही कोई अन्य ज़मीन. हमारी खेती की करीब साढ़े तीन एकड़ ज़मीन छीन ली गई.

हम भाग्यशाली थे कि हमारे पास सात एकड़ ज़मीन और है जिसपर हम चावल उपजाकर अपना घर चला रहे हैं.

लेकिन कई परिवार ऐसे हैं जिनके पास कुछ नहीं बचा, वो सब छोड़कर जाने को मजबूर हो गए और अब उनके बच्चे दिल्ली जैसे बड़े शहरों में बरतन-कपड़ा धोने और मज़दूरी का काम कर रहे हैं.

मुन्ना लाल, बुंदेलखंड, उत्तर प्रदेश

हम सहरीया समुदाय के दलित हैं. एक गांव से दूसरे गांव जाकर कभी मज़दूरी, पत्थर तोड़ने या इमारत बनाने का काम करते हैं.

किसी भी जगह पर हम दो से चार महीने से ज्य़ादा नहीं रह पाते. जिसकी ज़मीन पर काम करते हैं वही रहने की जगह दे देता है. जब वो काम खत्म हो जाता है तो हमें भगा दिया जाता है.

हमें रहने के लिए ज़मीन मिल जाए तो बार-बार भटकना ना पड़े, अपने बच्चों को स्कूल में डाल सकें, वो पढ़ लिख जाएंगे तो उनका भविष्य बनेगा.

मेरे तीन बेटे हैं लेकिन अपना कोई घर नहीं है.

एक मेरे साथ रहकर मज़दूरी करता है. एक झांसी में एक ठेकेदार के यहां काम कर रहा है और उन्ही की ज़मीन पर रहता है. एक पलायन कर गया, वो ऐंबुलेंस की गाड़ी चलाता है और किराए पर रहता है.

लाडौन, खुशीनगर, उत्तर प्रदेश

हम नहर के पास झोंपड़ी डाल कर रहते हैं. ये सरकारी ज़मीन है तो पुलिस का डर रहता है. नहर के पास जिसका खेत है वो भी रोज़ धमकाते हैं और वहां से जाने को कहते हैं.

नट जाति के हम लोग ऐसे ही सड़क या नहर किनारे रहते हैं. मेरे सास-ससुर भी यहां रहते थे. हम पचासों साल एक जगह रहते हैं लेकिन फिर भी उसे अवैध कब्ज़ा ही कहा जाता है.

पेट पालने के लिए हमारे बेटे दिहाड़ी मज़दूरी करते हैं. पति घास काटकर भैंसों को चारा खिलाते हैं और मैं शरीर गोदने का काम करती हूं.

हम पिछड़ी जाति के हैं कोई पढ़ा-लिखा नहीं है लेकिन हम जानते हैं कि सरकार इंदिरा आवास योजना के तहत गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों को घर बनाने का पैसा देती है. पर हमारे पास ज़मीन ही नहीं है तो ऐसी योजना का हम क्या करें?

इसे भी पढ़ें

टॉपिक

BBC © 2014 बाहरी वेबसाइटों की विषय सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है.

यदि आप अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करते हुए इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरूप कर लें तो आप इस पेज को ठीक तरह से देख सकेंगे. अपने मौजूदा ब्राउज़र की मदद से यदि आप इस पेज की सामग्री देख भी पा रहे हैं तो भी इस पेज को पूरा नहीं देख सकेंगे. कृपया अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करने या फिर संभव हो तो इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरुप बनाने पर विचार करें.